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संदेश

गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन या Gurudwara reform movement

 पंजाब का गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन क्या था. कैसे गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतो के चंगुल से आजाद कराया गया. इसमे अकालियों का त्याग और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का गठन.  स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान राष्ट्रवाद और लोकतन्त्र के पक्ष में बह रही देश की हवा ने धीरे-धीरे देश के सामाजिक और धार्मिक मामलों को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया. गाँधी जी के दिखाए अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते समाज के कमजोर वर्गों के लिए एक मजबूत हथियार बनकर सामने आए. धीरे-धीरे ज़न चेतना के संचार एवं विस्तार के परिणामस्वरूप भारत के सामाजिक और धार्मिक सुधार आन्दोलन देश के स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ गए. दरअसल जैसे जैसे देश का राष्ट्रीय आन्दोलन आगे बढ़ रहा था वैसे- वैसे उपनिवेशवाद यानी Colonialism का आधार सिमट रहा था. ब्रिटिश अधिकारियों ने सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से प्रतिक्रियावादी शक्तियों का समर्थन हासिल करने का प्रयास करना शुरू कर दिया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है पंजाब का गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन या अकाली आन्दोलन. एक धार्मिक आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ अकाली आन्दोलन अन्त में भारत के स्वतंत्...

प्रोजेक्ट टाइगर

 भारत में चल रहे प्रोजेक्ट टाइगर ने 1973 में पहली बार देश के सामने टाइगर रिजर्व की अवधारणा को प्रस्तुत किया . कभी फॉरेस्ट अधिकारियों द्वारा  एक प्रशासनिक कदम से शुरुआत करने वाला टाइगर रिजर्व 2006 आते आते एक वैधानिक स्वरुप ले चुका था. आज भारत के बाघ संरक्षण योजना की पूरी दुनियाँ में सराहना हो रही है. बात करेंगे कि भारत में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत कब और कैसे हुई.1972 में देश के वन्यजीवों की सुरक्षा के मद्देनज़र एक नया कानून बनाया गया वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 यानी Wild Life Protection Act 1972 जिसके अंतर्गत Notified फॉरेस्ट एरिया में चिन्हित स्थानों पर नैशनल पार्क बनाए गए. यहाँ पर रह रहे वनवासियों के अधिकारों को समाप्त करके वे सारे अधिकार राज्य सरकारों को सौंप दिए गए. नए कानून के अंतर्गत कई वाइल्डलाइफ Sanctuaries भी बनाए गए जिसमें वनवासियों को कुछ सीमित अधिकारों का इस्तेमाल करने की इजाजत दी गयी. आज देश में बाघों की बढ़ती संख्या इस महान प्रयास का ही परिणाम है. इसी प्रयास का परिणाम है प्रोजेक्ट टाइगर. दोस्तों 1973 में करीब 1915 स्क्वेयर किलोमीटर एरिया में नौ टाइगर...

भारतीय न्याय संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023

  क्यों अंग्रेजों के जमाने के बनाए गए आपराधिक संहिता यानी क़ानूनों को संशोधित करने की जरूरत पडी . किन विषयों में परिवर्तन का लक्ष्य रखा गया है. सबसे मुख्य बात यह है कि किस तरह UAPA की आतंकवादी कार्यवाई की परिभाषा भारतीय न्याय संहिता 2023 की परिभाषा से अलग है.  केन्द्रीय गृहमंत्री ने   लोकसभा में तीन संशोधित बिलों को प्रस्तुत किया जो कि ब्रिटिश ज़माने के आपराधिक कानूनों यानी क्रिमिनल laws का स्थान लेंगे.दोनों सदनों से पारित होने के बाद इन बिलों को राष्ट्रपति की सहमति भी मिल गयी है इसी के साथ इन बिलों को अब कानून की हैसियत प्राप्त हो चुकी है. इसके पहले वाले version को जो अगस्त में प्रस्तुत हुआ था उसको वापस लेने के बाद य़ह संशोधित version प्रस्तुत किया गया है. अगस्त में प्रस्तुत बिल को 31 सदस्यों वाली संसद की स्टैंडिंग कमेटी को सौंपा गया था. तमाम विशेषज्ञों और दूसरे Stakeholders से सलाह मशविरे के बाद अंत में सात नवम्बर को इसे अंतिम रूप दिया गया. इंडियन पेनल कोड यानी IPC का स्थान लेगा भारतीय न्याय संहिता 2023. कोड ऑफ क्रिमिनल Procedures यानी CrPC का स्थान...

अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और इसका विश्लेषण

संविधान  के अनुच्छेद 370 को खत्म करने के सरकार के फैसले चुनौती दी गई थी सुप्रीम कोर्ट में इस 11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के 5 अगस्त 2019 के आदेश को सही ठहराया. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या असर भारतीय संघीय व्यवस्था पर पड़ेगा. फैसले के महत्तवपूर्ण पक्ष क्या हैं. केन्द्र राज्य संबंधों का इस पर क्या प्रभाव पड़ेगा. राष्ट्रपति शासन के दौरान राष्ट्रपति की क्या भूमिका होगी. जम्मू और कश्मीर को पूर्ण राज्य के दर्जे के संबंध में फैसले में क्या है.  दोस्तों केन्द्र सरकार ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू और कश्मीर से संबंधित संविधान की धारा 370 को समाप्त करने की घोषणा की थी. इस फैसले के खिलाफ 23 याचिकाएं दायर की गयी थीं. जिन पर सुप्रीम कोर्ट में 16 दिन तक सुनवाई चली और सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर 2023 को सुनवाई पूरी करने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था. इस संवैधानिक पीठ मे चीफ जस्टिस श्री DY Chandrachurn के अलावा चार और Judges थे Justice SK कौल, जस्टिस संजीव खन्ना  जस्टिस BR Gawai, जस्टिस सूर्यकांत. गृह मंत्री अमित शाह ने 5 अगस्त 2019 को राज्यसभा में जम्म...

क्या होता है Optical फाइबर, कैसे काम करता है य़ह

 ज़न संचार के क्षेत्र में विज्ञान की तरक्की ने आश्चर्यजनक रूप से से आम लोगों के जीवन में क्रान्ति पैदा कर दिया है.आज मोबाइल फोन आम लोंगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. इसके बगैर शायद एक कदम भी चलना मुश्किल है. Corona महामारी के दौरान हम सभी ने देखा कि वह एक चीज जिसने हम सभी को आपस में जोड़कर रखा था वह था इन्टरनेट. आज हाई स्पीड इन्टरनेट की वजह से वीडियो चैट कर सकते हैं, ऑनलाइन payment कर सकते हैं, Classes attend कर सकते हैं  और तो और मीटिंग्स कर सकते हैं. दोस्तों कभी सोचा है ये सब कैसे सम्भव हो पाता है. य़ह सबकुछ सम्भव हो पाता है Optical फाइबर से. य़ह Optical फाइबर वास्तव में है क्या. अखिरकार यह काम कैसे करता है. कैसे सम्भव हो पाता है य़ह सबकुछ.  Optical फाइबर वास्तव में बहुत ही महीन बेलनाकार काँच यानी ग्लास के धागे होते हैं. इनकी गोलाई हमारे आपके एक साधारण बाल के बराबर होती है. ये काँच के धागे आश्चर्यजनक रूप से शब्दों को, चित्रों को, वीडियो, टेलीफोन कॉल या कोई ऐसी चीज जिन्हें डिजिटल सूचना में Encode किया जा सकता है, को लंबी दूरी तक भेज सकते हैं वह भी...

एक राष्ट्र एक चुनाव-राष्ट्रपति शासन प्रणाली की ओर बढ़ते कदम

 यदि लोकसभा और देश के विभिन्न विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ कराएँ जाएं तो क्या य़ह सम्भव होगा. इसमें क्या दिक्कतें आयेंगी? फायदे क्या होंगे. दोनों के अलग अलग चुनाव कराने से जैसा कि अभी हो रहा है क्या नुकसान होगा. अगर राज्य विधानसभाओं के चुनाव में प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री और संसद सदस्य चुनाव प्रचार न करें तो क्या फायदा होगा.  एक बड़ा सवाल यह भी है कि लोकसभा और तमाम विधानसभाओं के साथ साथ चुनाव कराने के पीछे   इरादे  कुछ और ही है. दोस्तों एक सितंबर 2023 को केन्द्र सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद के नेतृत्व में एक छह सदस्यों का पैनल गठित किया है य़ह परीक्षण करने के लिए कि क्या लोकसभा, राज्य विधानसभाओं एवं स्थानीय निकायों के चुनाव साथ साथ कराएँ जा सकते हैं और यदि य़ह सम्भव हो तो इस सम्बन्ध में क्या जरूरी कदम हो सकते हैं. एक राष्ट्र-एक चुनाव या One Nation one election पर सुझाव देने के उद्देश्य से पैनल को जिम्मेदारी दी गई है कि वह परीक्षण करे कि क्या ज़रूरी संवैधानिक संशोधनों या दूसरे कानूनी कदम उठाने की आवश्यकता होगी . पैनल को य़ह भी देखना होगा...

क्यों मांग रहा है बिहार विशेष राज्य का दर्जा

22 नवंबर 2023 को बिहार सरकार के कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित करके बिहार के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग की. विशेष राज्य के दर्जे की मांग का आधार बनाया गया है बिहार जातीय गणना 2022 को जिसमें य़ह बात निकल कर सामने आयी है कि बिहार की करीब एक तिहाई जनता ग़रीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करने को मजबूर है.  दोस्तों आज जानने की कोशिश करेंगे कि क्या होता है विशेष राज्य का दर्जा और क्या होते हैं इसके फायदे ? क्यों बिहार मांग कर रहा है   विशेष राज्य का दर्जा  ? य़ह भी जानेंगे की इस पर Raghuram Rajan कमेटी की रिपोर्ट क्या है. विशेष राज्य का दर्जा होता क्या है. य़ह वर्गीकरण केन्द्र सरकार द्वारा किया जाता है उन राज्यों के विकास में मदद करने के लिए जो भौगोलिक या सामाजिक-आर्थिक कारणों से पिछड़ेपन का शिकार हैं. दोस्तों विशेष राज्य का दर्जा प्रदान की बात पहली बार पांचवे वित्त आयोग 1969 की सिफारिशों में की गयी. वित्त आयोग ने मुख्य रूप से पांच कारणों को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने का आधार बनाया, पहला पर्वती और दुर्गम क्षेत्र हो, दूसरा कम जनसंख्या ghanatv या आदिव...

क्या हैं राज्यपालों के विवेकाधिकार

 राज्य सरकारों और राज्यपालों के बीच चल रही तनातनी की जिसकी वजह से कई राज्य सरकारों के जनहित के कार्यक्रमों का क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है. राज्यपाल  राज्य विधायिका द्वारा पारित विधेयकों को स्वीकृति नहीं दे रहे हैं जिससे राज्य सरकारों के काम काज में गतिरोध पैदा हो रहा है. आज य़ह जानने की कोशिश करते हैं कि   यदि राज्य विधानसभा से पारित विधेयक को राज्यपाल की स्वीकृति के लिए सरकार द्वारा भेजा जाता है तो  राज्यपाल के पास क्या विकल्प हैं. क्या राज्यपाल के पास   विवेकाधीन शक्तियाँ हैं और किन परिस्थितियों में इसका प्रयोग किया जा सकता है. राज्यपाल की शक्तियों पर Sarakariya commission की सिफारिशें क्या हैं. पंछी आयोग की सिफारिशें क्या हैं. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले एक Request अगर आप ने मेरे चैनल को अभी तक Subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ कर Subscribe कर लें और बेल icon को प्रेस कर दें ताकि आप तक मेरा वीडियो पहुँचता रहे. आते हैं पॉइन्ट पर. तमिलनाडु के राज्यपाल RN रवि ने तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित कई सारे विधेयकों को या तो स्वीकृति देने से इंकार ...

कौन जाता है कोटा, कौन लोग हैं ये

यह एक दुर्भाग्य की बात है कि आज देश में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से कहीं अधिक कोचिंग सेण्टर हैं. भारत के कुछ शहर तो पहचानें ही जाते हैं कोचिंग सेंटर की वजह से,उदाहरण के तौर पर राजस्थान का कोटा शहर. यहाँ के कोचिंग  centers के बारे में आम धारणा है कि उनमें पढ़ाई करके  JEE/NEET जैसे कठिन परिक्षाओं को पास कर पाना आसान हो जाएगा. दोस्तों, कभी यहाँ की कोचिंग centers के शानदार प्रदर्शन के लिए जाना जाने वाला कोटा शहर आज कल कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को लेकर ज्यादा चर्चा में है. छात्रों की बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं ने अभिभावकों के साथ साथ पूरे देश को झकझोर दिया है. देस में एक नयी बहस खड़ी हो गई है और य़ह है महत्वाकांक्षाओं और उपलब्ध अवसरों के बीच की बढ़ती खाई. दोस्तों आज उन प्रश्नों पर प्रकाश डालने की कोशिश करूंगा कि क्यों देश के तमाम हिस्सों से छात्र यहाँ आने का फैसला लेते हैं.प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते समय उन्हें किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है. जानी-मानी सर्वे संस्था लोकनीति -CSDS ने october के पहले और दूसरे सप्ताह में 1000 से ज्यादा छात्रों से बात की, उनकी स...