दोस्तों इस तरह का प्रभाव पानी के fauwaaron में रंगीन प्रकाश किरणों को अठखेलियाँ करते हुए आप ने देखा होगा. महान वैज्ञानिक माइकल Farade की सलाह पर Tindaal ने Colladon के रंगीन प्रकाशीय fowaron की अवधारणा को आगे बढ़ाया और 1854 में लंदन के रॉयल सोसाइटी में इसका प्रदर्शन किया. अब इस प्रभाव को प्लास्टिक फाइबर क्रिसमस ट्री में देखा जा सकता है. दोस्तों अब पूर्ण आन्तरिक परावर्तन या Total Internal Reflection का प्रयोग करते हुए किसी ऐसे पदार्थ के माध्यम से प्रकाश पुंज को एक निश्चित दिशा दे सकते हैं जिसका apvartan सूचकांक या Refrective index बहुत अधिक हो. Bebinet को पानी की जगह एक बेहतर विकल्प मिला ग्लास की पाइपों या ग्लास रॉड के रूप में जो कि ज्यादा उपलब्ध है, साथ ही सुविधाजनक और टिकाऊ है. ग्लास के इन बेलनों या पाइपों का ईस्तेमाल शुरुआती दौर में दवा और रक्षा क्षेत्र में हुआ. 1920 के शुरुआत में Clerence Hansal और जॉन logi Beired ने चित्रों या इमेजेज को ग्लास फाइबर के माध्यम से भेजने या प्रेषित करने का रास्ता दिखाया. 1930 के दशक में डॉक्टरों ने मरीजों के आन्तरिक अंगों की जाँच करने के लिए ग्लास फाइबर बंडल का ईस्तेमाल करना शुरू किया . ऑपरेशन के दौरान दातों के अन्दर रोशनी करने में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाने लगा. दोस्तों शुरुआती दिनों में Optical फाइबर जल्दी खराब हो जाते थे और बहुत लंबी दूरी तक प्रकाश तरंगों को भेजने या Propagation के लिए उपयुक्त नहीं थे. 1954 आते आते दुनियाँ ने ग्लास फाइबर के विकास में नयी ऊँचाइयाँ हासिल की. Imperial कॉलेज लंदन के हेराल्ड Hopkins और नरिंदर सिंह Kapani ने 75 सेंटीमीटर लंबे 10,000 से ज्यादा Optical फाइबर के बंडल का ईस्तेमाल करके चित्रों यानी Images को भेजने में सफलता हासिल की. Kapani भारतीय अमेरिकी भौतिक विज्ञानी थे और इस क्षेत्र में अपनी विशेष उपलब्धियों के लिए जाने जाते थे. दो साल बाद मिशिगन विश्वविद्यालय के लॉरेंस Curtis ने ग्लास clad फाइबर बनाने में सफलता अर्जित की. Clad का मतलब हुआ कि फाइबर के ऊपर एक Coating या Layer जो फाइबर को और सुरक्षा देगा. लॉरेंस के इस विचार ने कि फाइबर ग्लास को किसी कम Apvartan सूचकांक या Low Refrective index वाले पदार्थ से Cladding करने से लंबी दूरी तक सूचनाओं को भेजा जा सकता है. उसी वर्ष Kapani ने "फाइबर Optics" शब्द का प्रयोग किया. दोस्तों 1960 में Theodor Maiman ने पहला Laser बनाया जो कि एक बेहतरीन प्रकाशीय श्रोत या Optical source साबित हुआ है जिसने Optical संचार के क्षेत्र में अनुसंधान को आगे बढ़ाने में महत्तवपूर्ण भूमिका अदा की. समान्य तापमान पर काम करने में सक्षम Laser तकनीक विकसित होने के बाद य़ह सम्भव हो पाया कि किसी भी सूचना को डिजिटल तरीके से Optical सिग्नल में Encode या परिवर्तित किया जा सकता है. दोस्तों इतना सबकुछ हासिल होने के बाद भी इन प्रकाश संकेतों या लाइट सिग्नल को लंबी दूरी तक भेजना अभी भी बहुत बड़ी चुनौती थी. उस समय के बेहतरीन गुणवत्ता वाले उपलब्ध Optical फाइबर कुछ ही मीटर के बाद करीब 99% अपना पावर खो देते थे यानी इनका पावर नष्ट हो जाता था. 1966 में Kaw और उनके सहयोगी शोध के दौरान य़ह समझने में सफल रहे कि Optical सिग्नल अपनी क्षमता glass की गुणवत्ता अच्छी न होने के कारण खो देते थे न की प्रकाश के vikharao या Scattering के कारण. Kaw साहब ने तब सलाह दिया कि बहुत ही अच्छी क्वालिटी के fused सिलिका को हाई Temperature पर पिघला कर बहुत ही पतले पतले Optical फाइबर को तैयार किया जाय. इस तरह से ग्लास फाइबर के अन्दर लाइट सिग्नल या प्रकाश संकेतों का नष्ट होना बहुत हद तक कम किया जा सका जैसे 20 डेसीबल से भी कम. इसका अर्थ य़ह है कि एक किलोमीटर के बाद भी कम से कम 1% सिग्नल काम कर रहा होगा. 1971 में अमेरिका की एक glass बनाने वाली कंपनी Carnis glass वर्क्स ने इस मापदण्ड के अनुसार केबल बनाने में कामयाब हासिल की. दोस्तों आजकल फाइबर Drawing तकनीक के इस्तेमाल से ग्लास फाइबर का उत्पादन हो रहा है. सर्वप्रथम एक ऐसे मोटे glass रॉड का निर्माण किया जाता है जिसके अन्दर पहले से ही ज़रूरत के मुताबिक़ Refrective index यानी apavartan सूचकांक बना होता है . इस प्रक्रिया में केमिकल Vapour Deposition तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है . इसके लिए पहले से बने glass रॉड को करीब 1600 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है और जब ये पिघलने लगता है तब इसे खींचकर बहुत ही बारीक पतले Optical फाइबर तैयार किए जाते हैं. खींचने की प्रक्रिया के कारण फाइबर की मोटाई यानी व्यास कम हो जाता जा है जिससे मनचाही लंबाई मिल जाती है. इसके बाद इस खींचे हुए फाइबर को मजबूत और टिकाऊ बनाने के लिये इसके ऊपर एक सुरक्षा कवच की Coating की जाती है मतलब उसके ऊपर एक Layer चढ़ाते हैं. दोस्तों हमारे भारत में भी कोलकाता स्थित सेंट्रल ग्लास एवं Ceramic रिसर्च इंस्टिट्यूट में हाई क्वालिटी सिलिका आधारित Optical फाइबर बनाने की सुविधा है. अनुसंधान की तरक्की से Optical फाइबर की क्षमता के कम होने का प्रतिशत बहुत ही कम हो गया है .दोस्तों आज फाइबर Optics टेक्नोलॉजी का ईस्तेमाल जनसंचार, मेडिकल साइंस, Laser टेक्नोलॉजी, Sensing इत्यादि में बड़े पैमाने पर हो रहा है. देश में एक बेहतरीन संचार प्रणाली को स्थापित करने और Quantum साइंस को और बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने अपने 2020 के बजट में एक राष्ट्रीय मिशन की घोषणा की है जिसके लिए 8000 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया है. इस राशि को अगले पाँच वर्षों में उपयोग करना है. आज फाइबर Optics का नेटवर्क बहुत तेजी से हमारे देश में फैल रहा है और घर घर पहुंच रहा है. फाइबर Optics और Quantum Optics संचार प्रणाली इस ज़माने की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है.
कई दशकों से जारी इजराइल-फ़िलीस्तीन युद्ध में एक ऐसा भी वक़्त आया जब दोनों के बीच शांति की नयी उम्मीदें सामने आयीं. दोस्तों बात 1992 की है जब इजराइल के प्रधानमंत्री यीजाक राबिन ने फ़िलीस्तीन के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाया और फ़िलीस्तीनी नेता यासर अराफात ने भी आगे बढ़कर उस शानदार पहल का स्वागत किया. दोनों ही नेता अपने अपने मुद्दे सुलझाने के लिए सामने आए. इजराइली प्रधानमंत्री यीजाक राबिन ने माना कि फ़िलीस्तीनी मुक्ति संगठन PLO कोई आतंकवादी संगठन नहीं है बल्कि वे अपना देश चाहते हैं और इसका सम्मान किया जाना चाहिए. फ़िलीस्तीनी नेता यासर अराफात ने भी सकारात्मक रवैय्या अपनाते हुए इजराइल के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार भी किया और मान्यता भी दी. दोस्तों आज बात करेंगे 30 साल पहले हुए ओस्लो समझौते की जो फ़िलीस्तीनियों के लिए शान्ति की अन्तिम उम्मींद लेकर आया था पर य़ह फ़िलीस्तीनयों की आशाओं की अन्तिम किरण इजराइली आन्तरिक राजनीति का शिकार हो गयी. उसका परिणाम य़ह हुआ कि वह खूनी संघर्ष जो 1993 में ही खत्म हो जाना चाहिए था वह आज भी उसी निर्दयता के साथ जारी है. ...
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