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ओस्लो समझौता

कई दशकों से जारी इजराइल-फ़िलीस्तीन युद्ध में एक ऐसा भी वक़्त आया जब दोनों के बीच शांति की नयी उम्मीदें सामने आयीं. 
दोस्तों बात 1992 की है जब इजराइल के प्रधानमंत्री यीजाक राबिन ने फ़िलीस्तीन के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाया और फ़िलीस्तीनी नेता यासर अराफात ने भी आगे बढ़कर उस शानदार पहल का स्वागत किया. दोनों ही नेता अपने अपने मुद्दे सुलझाने के लिए सामने आए. इजराइली प्रधानमंत्री यीजाक राबिन ने माना कि  फ़िलीस्तीनी मुक्ति संगठन PLO कोई आतंकवादी संगठन नहीं है बल्कि वे अपना देश चाहते हैं और इसका सम्मान किया जाना चाहिए.  फ़िलीस्तीनी नेता यासर अराफात ने भी सकारात्मक रवैय्या अपनाते हुए इजराइल के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार भी किया और मान्यता भी दी. 
दोस्तों आज बात करेंगे 30 साल पहले हुए ओस्लो समझौते की जो फ़िलीस्तीनियों के लिए शान्ति की अन्तिम उम्मींद लेकर आया था पर य़ह फ़िलीस्तीनयों की आशाओं की अन्तिम किरण इजराइली आन्तरिक राजनीति का शिकार हो गयी. उसका परिणाम य़ह हुआ कि वह खूनी संघर्ष जो 1993 में ही खत्म हो जाना चाहिए था वह आज भी उसी निर्दयता के साथ जारी है.
 7 October 1923 को हमास द्वारा दागे गए रॉकेटों ने ऐसे हालात पैदा किए कि अब तक 1400 इजराइली और 10,000 से ज्यादा निर्दोष फ़िलीस्तीनी मारे जा चुके हैं जिसमे भारी संख्या में मासूम बच्चे हैं. कार्रवाई अभी भी जारी है, शान्ति के प्रयास भी हो रहे हैं. 
दोस्तों आज बात करेंगे कि ओस्लो समझौता क्या था, किन देशों के बीच हुआ और क्यों य़ह फेल हो गया.
आगे बढ़ने से पहले आइए जानते हैं कि ओस्लो समझौते की पृष्ठभूमि में संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा पारिषद के प्रस्ताव 242 और प्रस्ताव 338 की बड़ी भूमिका थी. क्या थे ये दोनों प्रस्ताव. 
अरब इजराइल Six day war 1967 जो एक तरफ इजराइल और दुसरी तरफ अरब राष्ट्रों Egypt, जॉर्डन और सीरिया के बीच हुआ था जिसमें इजराइल ने Egypt से सिनाई  Peninsula 
, सीरिया की golan heights ,और जॉर्डन से वेस्ट बैंक और ईस्ट Jerusalem 
छीन लिया था. 
इस क्षेत्र में स्थाई शान्ति स्थापित करने के लिए 22 नवम्बर 1967 को संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा पारिषद ने सर्वसम्मत से प्रस्ताव 242 पारित किया जिसका अरब राष्ट्रों के साथ साथ इजराइल ने भी समर्थन किया. 
प्रस्ताव 242 में अरब राष्ट्रों द्वारा इजराइल के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार करने की बात की गयी. इसके साथ ही मान्य (Recognized) सीमाओं के अन्दर सुरक्षा और शान्ति के साथ भय मुक्त जीवन जीने के इजराइल के स्वतन्त्र अधिकार को अरब राष्ट्र स्वीकार करें और अरब देशों ने स्वीकार किया. 
   प्रस्ताव 242 में इजराइल को उन इलाकों को वापस करने के लिए कहा गया जिसे उसने Six Day war में अरब राष्ट्रों से छीना था. 
      PLO ने 1988 तक इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया था क्योंकि इसमें सीधे तौर पर फ़िलीस्तीनियों के बारे में कुछ नहीं कहा गया था .हालाँकि प्रस्ताव 242 कभी भी पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया फिर भी कैम्प डेविड समझौते से पहले तक अरब इजराइल विवाद के समाधान के लिए किए जा रहे कूटनीतिक प्रयासों का आधार बना. य़ह प्रस्ताव आज भी महत्वपूर्ण है. 
       22 October 1973 को संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा पारिषद ने  प्रस्ताव 338 पारित करके 12 घंटे के अन्दर यम kippur युद्ध को समाप्त करने के लिए कहा गया. यम kippur युद्ध इजराइल और अरब देशों Egypt और सीरिया के बीच लड़ा जा रहा था. सुरक्षा पारिषद के 15 में से 14 सदस्यों ने प्रस्ताव का समर्थन किया जबकि चीन ने वोटिंग में भाग नहीं लिया. युद्ध फिर भी नहीं रुका तब प्रस्ताव 339 लाया गया तब युद्ध रोकने की घोषणा हुई. 
  बताता चलूँ  यम Kippur यहूदियों का बड़ा त्योहार होता है इसी दिन अरब राष्ट्रों Egypt और सीरिया ने एक साथ मिलकर इजराइल पर 
 हमला कर दिया. 6 october से 25 October 1973 के बीच लड़े जाने वाले इस युद्ध को रमजान वार, October वार, फोर्थ अरब इजराइल वार, और 1973 अरब इजराइल वार भी कहा जाता है. 
दोस्तों अब आते हैं ओस्लो  समझौते पर- ओस्लो समझौता दरअसल दो समझौतों का समूह है. ओस्लो प्रथम 13 September 1993 को और ओस्लो सेकंड  4 November 1995 को हस्ताक्षरित हुए. 
नोर्वे की राजधानी ओस्लो में फ़िलीस्तीनी नेताओं और इजराइली नेताओं के बीच एक लंबी बातचीत का नतीज़ा था ओस्लो समझौता. 
13 सितंबर 1993 को अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की मौजूदगी में हुए ओस्लो समझौते पर इजराइल के प्रधानमंत्री Yeejak राबिन और फ़िलीस्तीनी नेता महमूद अब्बास ने दस्तखत किए . समझौते का मुख्य उद्देश्य था इजराइल और फ़िलीस्तीन के बीच हिंसक संघर्ष समाप्त करना और वह भी 11 मई 1999 तक .
दोस्तों  ओस्लो समझौते के अनुसार PLO नेता Yasar अराफात ने पहली बार इजराइल के अस्तित्व को स्वीकार किया और जवाब में इजराइल ने PLO को फ़िलीस्तीनियों का अधिकृत प्रतिनिधि होना स्वीकार किया. पहली बार Two State Solution की बात फ़िलीस्तीनयो ने स्वीकार किया. 
दोस्तों, इजराइल के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार करने और इसके नागरिकों को शान्ति पूर्वक जीने के अधिकार को मान्यता देने के बदले में फ़िलीस्तीनियों को वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में एक स्वतंत्र शासन व्यवस्था(Palestinian Authority)स्थापित करने की प्रक्रिया पर ओस्लो शान्ति वार्ता में सैध्दांतिक सहमती बनी. 
दोस्तों, ओस्लो प्रथम समझौते कुछ प्रावधान किए गए जैसे 
1. गाजा पट्टी वेस्ट बैंक से इजराइली सुरक्षा बलों का हटाया जाना. 
2. पाँच साल का Transitional period होगा जिसमें फ़िलीस्तीनी स्व - शासन की स्थापना के अलावा बाकी अनसुलझे मामलों पर चर्चा की जाएगी मुख्य रूप से 
1.यरूशलम की क्या स्थिति होगी क्योंकि य़ह शहर इजराइल और फ़िलीस्तीन दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण है. 
2. फ़िलीस्तीनी शरणार्थियों की समस्या का माकूल समाधान 
3. यहूदी बस्तियों Israel settlements.पर कोई सर्वमान्य निर्णय 
4. आम लोंगों की सुरक्षा व्यवस्था 
5. सीमाओं का निर्धारण 
6. विदेश नीति 
इसके अलावा और भी खास मुद्दे हैं जिन पर चर्चा होनी थी. 
👉मजबूत फ़िलीस्तीनी पुलिस फोर्स का गठन 
👉 गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक में लोकतांत्रिक और निष्पक्ष चुनाव कराना 
# सुरक्षा और विकास जैसे मामलों पर इजराइल और फ़िलीस्तीन के बीच समन्वय की व्यवस्था करना. 
दोस्तों,  
4 मई 1994 को मिस्र की राजधानी काहिरा में हुए एक समझौते में इजराइली सुरक्षा बलों को चरण बद्ध तरीके से हटाने और Palestinian Authority को सत्ता हस्तांतरित करने पर सहमती बनी. एक सप्ताह के अंदर ही गाजा पट्टी और Zeriko जैसे शहरों से इजराइली सुरक्षा बलों को हटाने का कार्य पूरा किया गया साथ ही साथ Palestinian Authority ने ज़न कल्याण का कार्य प्रारंभ कर दिया. 
दोस्तों 
28 सितंबर 1995 को इजराइली प्रधानमंत्री Yeejak राबिन और फ़िलीस्तीनी नेता Yasar अराफात मिस्र के शहर ताबा में मिले और ओस्लो सेकंड या ओस्लो द्वितीय समझौते पर दस्तखत किए जिसमें वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी पर  अंतरिम सहमति को दोनों पक्षों की मंजूरी मिली. इस समझौते में फ़िलीस्तीनी स्व - शासन का विस्तार वेस्ट बैंक और Zeriko से बढ़ाकर दूसरे Population centers या जहां जहाँ फ़िलीस्तीनी आबादी हो वहाँ तक करने पर सहमती बनी. 
दोस्तों 
ओस्लो द्वितीय समझौता ओस्लो प्रथम से कहीं ज्यादा व्यापक और विस्तृत था जिसमें तमाम दूसरे प्रावधान किए गए. जैसे 
1. Palestinian Authority के निष्पक्ष चुनाव कराने के साथ साथ चुनावी प्रक्रिया में फ़िलीस्तीनियों की भागीदारी को सुनिश्चित करना. 
2. चुनाव के पहले ही Zenim,Nebulas,Tulkarm,Kalkilyah, Ramallah,और Bethlem जैसे शहरों के साथ साथ 440 गाँवों से इजराइली सुरक्षा बलों की Redeployment या हटाया जाना.
3. वेस्ट बैंक के जाने माने शहर Hebron से इजराइली सुरक्षा बलों को हटाने की रूपरेखा तैयार करना. 
4. अंतरिम समय में गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक को तीन क्षेत्रों A,B,C में बाँटना. 
एरिया A पर Palestinian Authority का नियंत्रण रहेगा और यहां की सुरक्षा भी इसी के पास होगी. 
एरिया B - Palestinian Authority के अधीन रहेगा लेकिन यहां की सुरक्षा संयुक्त रूप से इजराइल और Palestinian Authority के पास होगी. 
एक दूसरे के विरुद्ध आतंकवाद, अपराध एवं संघर्ष पर प्रभावी नियंत्रण. 
वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी के बीच में सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था करना. 
शेष मामलों जैसे यरूशलम, शरणार्थी बस्तियों और सीमाओं पर वार्तालाप जो किसी भी सूरत में 4 मई 1994 से आगे न हो. 
दोस्तों, सबसे महत्वपूर्ण है कि किसी भी परिस्थिति में 4 मई 1999 तक पूरे मामलों का स्थाई समाधान Permanent settlement हो जाना चाहिए. 
दोस्तों, अब बात करेंगे कि ओस्लो समझौता क्यों उतरा पटरी से 
ओस्लो द्वितीय समझौते के अनुसार इजराइली सुरक्षा बलों की redeployment हुई और Palestinian Authority के चुनाव भी हुए पर ओस्लो शान्ति समझौते पर पहली बड़ी रुकावट तब आयी जब एक इजराइली कट्टरपंथी ने इजराइल के प्रधानमंत्री Yeejak राबिन की तब गोली मारकर हत्या कर दी जब वे एक शान्ति सभा को संबोधित करके बाहर निकल रहे थे. इसके अलावा फ़िलीस्तीनी आबादी का एक बड़ा हिस्सा भी ओस्लो शान्ति प्रक्रिया के खिलाफ़ था.  बहुत से फ़िलीस्तीनी चरमपंथियों ने भी ओस्लो समझौते का विरोध किया. फ़िलीस्तीनी-अमेरिकन दार्शनिक adverd ने ओस्लो समझौते को Versaills ऑफ Palestine का नाम दिया. देखा जाय तो ओस्लो शान्ति समझौता एक मुक़ाममाल फ़िलीस्तीनी राष्ट्र का निर्माण करने में असफल रहा. 
          दोस्तों,  इसके बाद 1996 के आम चुनावों में कट्टरपंथी नेता बेंजामिन Netnyahu की पार्टी चुनाव जीत गयी. Netnyahu ओस्लो समझौते के कटु आलोचक थे. कहा जाता है कि य़ह चुनाव परिणाम असल में राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर इजराइली जनता की चिंताओं का दर्पण थी. मतलब साफ़ है इजराइल के लोग अपनी सुरक्षा से कोई भी समझौता करने के पक्ष में नहीं थे. 
इजराइली कट्टरपंथी नेता बेंजामिन Netnyahu ने शुरुआती दौर में तो फ़िलीस्तीनी नेता Yasar अराफात से मिलने से मिलने से भी इन्कार कर दिया. इसके अलावा फ़िलीस्तीनी शहर Hebron से इजराइली सुरक्षा बलों को हटाने से इन्कार कर दिया हालांकि बाद में वे 1997 में इसके लिए तैयार हो गए. 
1998 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के हस्तक्षेप से Wye River मेमोरेंडम पर सहमति  बनी जिसके परिणामस्वरूप Palestinian Authority द्वारा हिंसा पर प्रभावी नियंत्रण की शर्त पर ओस्लो शान्ति प्रक्रिया को दोबारा प्रारंभ किया गया लेकिन इस सकारात्मक शुरुआत ने Netnyahu की गठबंधन सरकार में दरार पैदा कर दिया और एक सप्ताह के अंदर ही य़ह समझौता निलंबित हो गया. इजराइल में नए चुनाव की घोषणा हो गयी. 
दोस्तों, Ihud बराक इजराइल के नए प्रधानमंत्री बने और ओस्लो शान्ति प्रक्रिया फिर से शुरू तो हुई पर इजराइली और फ़िलीस्तीनियों के बीच तनाव और अविश्वास बढ़ता ही जा रहा था. 
फ़िलीस्तीनी जनता जिन्हें पांच साल के अन्दर स्व शासन का वादा किया गया था वास्तव में इजराइली पालिटिक्स का शिकार हो गयी. वहीँ दुसरी तरफ इजराइलियोन को PLO की क्षमता पर शक था कि य़ह यहूदियों पर हो रहे हमलों को रोक पाएगी या नहीं. 
             दोस्तों साल 2000 के मध्य तक यरूशलम इजराइल और फ़िलीस्तीन के बीच टकराव का मुख्य मुद्दा बन चुका था. शान्ति वार्ता  टूटने के बाद इजराइली कट्टरपंथी नेता एरियल Shairon के टेंपल माउंट  जहाँ पर बहु चर्चित अल - अक्सा मस्जिद स्थित है, के भड़काऊ दौरे ने आग में ghee का काम किया जिसके परिणामस्वरूप फ़िलीस्तीनियों में गुस्सा भड़क गया और इसी के साथ दूसरे Intifada जिसे अल -  अक्सा Intifada भी कहा जाता है, कि शुरूआत हो गयी. परिणाम य़ह हुआ कि सारी ओस्लो शान्ति प्रक्रिया पटरी से उतर गयी. 
            हालाँकि कुछ वर्षों बाद ओस्लो शान्ति प्रक्रिया को दोबारा प्रारंभ करने की कोशिश हुई परन्तु इजराइली और फ़िलीस्तीनी नेता न तो कभी सहमत हो पाए  न ही ओस्लो शान्ति प्रक्रिया फिर से पटरी पर लौट पायी. 
             ऊपर इस सात october 1923 को हमास द्वारा किए गए राकेट हमलों 1400 इजराइली नागरिकों के मारे जाने के बाद इजराइल की जवाबी कार्रवाई में अब तक 10,000 से भी ज्यादा फ़िलीस्तीनियों की मौत ने शान्ति की सारी उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया. 

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