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अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और इसका विश्लेषण

संविधान  के अनुच्छेद 370 को खत्म करने के सरकार के फैसले चुनौती दी गई थी सुप्रीम कोर्ट में इस 11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के 5 अगस्त 2019 के आदेश को सही ठहराया. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या असर भारतीय संघीय व्यवस्था पर पड़ेगा. फैसले के महत्तवपूर्ण पक्ष क्या हैं. केन्द्र राज्य संबंधों का इस पर क्या प्रभाव पड़ेगा. राष्ट्रपति शासन के दौरान राष्ट्रपति की क्या भूमिका होगी. जम्मू और कश्मीर को पूर्ण राज्य के दर्जे के संबंध में फैसले में क्या है.  दोस्तों केन्द्र सरकार ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू और कश्मीर से संबंधित संविधान की धारा 370 को समाप्त करने की घोषणा की थी. इस फैसले के खिलाफ 23 याचिकाएं दायर की गयी थीं. जिन पर सुप्रीम कोर्ट में 16 दिन तक सुनवाई चली और सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर 2023 को सुनवाई पूरी करने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था. इस संवैधानिक पीठ मे चीफ जस्टिस श्री DY Chandrachurn के अलावा चार और Judges थे Justice SK कौल, जस्टिस संजीव खन्ना  जस्टिस BR Gawai, जस्टिस सूर्यकांत. गृह मंत्री अमित शाह ने 5 अगस्त 2019 को राज्यसभा में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम विधेयक प्रस्तुत किया जिसमें जम्मू और कश्मीर को को दो केन्द्र शासित प्रदेशों में जम्मू और कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया गया था. 6 अगस्त को य़ह विधेयक लोकसभा में पेश हुआ और उसी दिन पारित हो गया .9 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई. अब सिर्फ अनुच्छेद 370 क्लॉज 1 बचा है जिसके परिणामस्वरूप जम्मू और कश्मीर में सिर्फ भारत का संविधान चलेगा. दोस्तों 11 दिसम्बर 2023 को अपने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मत से राष्ट्रपति के 5 अगस्त 2019 के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें जम्मू और कश्मीर राज्य के विशेष संवैधानिक दर्जे से   संबंधित संविधान की धारा 370 को समाप्त कर    देने की घोषणा की गयी थी ,जिसके परिणामस्वरूप जम्मू और कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा समाप्त हो गया था और इसी के साथ इसका पुनर्गठन करके जम्मू और कश्मीर दोनों को केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया गया था. फैसले में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि धारा 370 एक अस्थायी या Temporary प्रावधान था जिसका उद्देश्य था जम्मू  और कश्मीर जैसे रियासत का भारतीय संघ में विलय को आसान बनाना. दोस्तों  सुप्रीम कोर्ट ने धारा 370 को अस्थायी व्यवस्था करार देते य़ह स्पष्ट किया कि संघर्ष और युद्ध के हालात में जम्मू और कश्मीर रियासत के भारत में विलय को आसान बनाने के लिये धारा 370 का प्रावधान किया गया था. माननीय चीफ जस्टिस श्री DY Chandrachurn ने स्वयं और दो अन्य जजों Justice BR Gawai और Justice सूर्यकांत की तरफ से इस बात पर जोर दिया कि भारत संघ में विलय करते समय Instrument of accession पर दस्तखत करते ही जम्मू और कश्मीर रियासत की संप्रभुता यानी Sovereignty समाप्त हो गई. संवैधानिक पीठ के दो अन्य जजों Justice संजय किसन कौल और Justice संजीव खन्ना ने इस फैसले से सहमती व्यक्त की. विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का भारतीय संघीय व्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा. क्योंकि संघीय व्यवस्था संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है. दोस्तों, राष्ट्रपति के अगस्त 2019 के आदेश को चुनौती देने वालों ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि राष्ट्रपति शासन के दौरान राष्ट्रपति धारा 356 के अंतर्गत ऐसा कोई फैसला नहीं ले सकते जो Irreversible हो यानी ऐसा फैसला जिसका कोई स्थाई परिणाम हो या दूसरे शब्दों में राष्ट्रपति के आदेश से कोई ऐसी नयी व्यवस्था नहीं कायम की जा सकती जिसका कोई Permanent Character हो. यहाँ समझना होगा कि राष्ट्रपति शासन के दौरान कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए जैसे जम्मू और कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त करना, लद्दाख को इससे अलग करना, इसके अलावा जम्मू और कश्मीर राज्य को केन्द्र शासित प्रदेश में परिवर्तित करना जिसका सीधा अर्थ य़ह हुआ कि भारत की संघीय सरकार एक तरफ़ा फैसले लेकर बिना राज्य विधानसभा की सहमती के दीर्घकालीन परिवर्तनों को प्रभावी बना सकती है. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि राष्ट्रपति के फैसलों का स्थायित्व या Irreversibility के आधार पर विरोध किए जाने से एक रास्ता खुल जाएगा जिसके परिणामस्वरूप रोजमर्रा के प्रशासनिक कार्यों को भी अदालतों में चुनौती दिया जाने लगेगा और प्रदेश का  सम्पूर्ण प्रशासनिक तन्त्र चरमरा जाएगा. कोर्ट ने यह जरूर कहा कि राष्ट्रपति द्वारा शक्तियों का प्रयोग राष्ट्रपति शासन के उद्देश्यों से मेल खाना चाहिए. कोर्ट ने आगे और स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति राष्ट्रपति के फैसलों को चुनौती देता है य़ह उसकी जिम्मेदारी है कि वह सिद्ध करे कि राष्ट्रपति के फैसले व्यापक जनहित में नहीं हैं. SR Bommai v/s भारत सरकार के फैसले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने य़ह भी कहा कि इस मामले में राष्ट्रपति शासन के दौरान राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमाओं को बेहतर तरीके से परिभाषित किया गया है. दोस्तों प्रश्न ये है कि क्या एक पूर्ण राज्य को केन्द्र शासित प्रदेश बनाया जा सकता है. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की धारा तीन का हवाला देते हुए जम्मू और कश्मीर राज्य से लद्दाख को अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बनाने के मामले में भी जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 को सही ठहराया. चूंकि केन्द्र सरकार ने स्वयं जम्मू और कश्मीर को शीघ्र ही वापस राज्य का दर्जा दिए जाने का आश्वासन दिया था इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू और कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश बनाने के  मामले की वैधानिकता में जाने की जरूरत नहीं समझी . फैसले का  एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा य़ह है कि जम्मू और कश्मीर राज्य के पुनर्गठन को लेकर राज्य विधानसभा को सिर्फ सिफारिश का अधिकार था जिसको स्वीकार करने के लिए संसद बाध्य नहीं है या जम्मू और कश्मीर विधानसभा को सिर्फ सिफारिश करने का अधिकार था पर य़ह सिफारिश संसद पर बाध्यकारी नहीं था. चीफ जस्टिस ने आगाह किया कि यदि किसी राज्य को केन्द्र शासित प्रदेश में परिवर्तित किया जाता है तो उस राज्य की स्वायत्तता स्वयं समाप्त हो जाएगी इसलिए इस पर ध्यान देने की जरूरत है कि किस ऐतिहासिक सन्दर्भ में उस संघीय इकाई या राज्य का गठन किया गया था और इसका क्या प्रभाव संघीय सिद्धांतों और प्रतिनिधित्व लोकतन्त्र पर पड़ेगा.  इसी तरह की चिन्ता व्यक्त करते हुए जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि एक राज्य को केन्द्र शासित प्रदेश में परिवर्तित करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं, इससे राज्य की जनता का सरकार चुनने का अधिकार छिन जाता है जो संघीय व्यवस्था या Federal System के लिए अच्छा नहीं है. इसलिए किसी राज्य का केन्द्र शासित प्रदेश में परिवर्तन बहुत ही विशेष परिस्थितियों में ही होना चाहिए और वह भी तब जब ऐसा करने के लिए बहुत ही मजबूत और ठोस आधार हो. दोस्तों सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था देते हुए कहा कि संविधान की धारा 370(3) के अन्तर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति एक तरफा फैसला लेते हुए धारा 370 को रद्द करने का निर्णय ले सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि राष्ट्रपति राज्य सरकार की   सहमति लेने के लिए बाध्य नहीं हैं जैसा कि धारा 370(1)D के अन्तर्गत अनिवार्य माना जाता है. दोस्तों महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सलाह और सहयोग यानी Cooperation and Collaboration का सिद्धांत जो कि धारा 370(1)d का आधार है य़ह वहाँ लागू नहीं होगा जहां पर इस प्रावधान का प्रभाव भी वही है जो धारा 370(3) का है. चीफ जस्टिस ने तर्क दिया कि चूंकि धारा 370(1)D के अन्तर्गत शक्तियों का प्रयोग करते हुए संविधान के सभी प्रावधानों को लागू करने का प्रभाव वही है जो धारा 370(3) के अन्तर्गत अधिसूचना जारी करके धारा 370 के खत्म करने का है. इसलिए यहाँ सलाह एवं सहयोग के सिद्धांत की कोई आवश्यकता नहीं है. राष्ट्रपति और राज्य सरकार के बीच इस तरह के सहयोग और Collaboration की जरूरत तो तब पड़ती जब भारतीय संविधान के प्रावधानों को राज्य में लागू करने के लिए राज्य के संविधान में किसी तरह का संशोधन करने की जरूरत पड़ती लेकिन इस मामले में राष्ट्रपति ने अपने आदेश ( CO.272)  में य़ह सुनिश्चित किया कि जम्मू और कश्मीर राज्य पर भारतीय संविधान पूरी तरह से लागू हो जिसके परिणामस्वरूप राज्य का संविधान पूरी तरह से निष्प्रभावी हो जाय. दोस्तों आइए अब बात करेंगे कि सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति की शक्तियों को लेकर क्या कहा.जम्मू और कश्मीर से संबंधित संविधान की धारा 370 को समाप्त किए जाने का विरोध करते हुए याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया था कि धारा 370(3)के अन्तर्गत राष्ट्रपति द्वारा धारा 370 को समाप्त करने का फ़ैसला जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा की सिफारिशों पर निर्भर है. इसपर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 26 जनवरी 1957 को संविधान सभा भंग होने के बाद भी राष्ट्रपति की धारा 370(3) के अन्तर्गत 370 को समाप्त करने की शक्तियां बरकरार हैं और राष्ट्रपति इन शक्तियों का एक तरफ़ा प्रयोग कर सकते हैं. चीफ जस्टिस ने जोर दिया यदि हम इस बात पर अड़े रहे कि राज्य की संविधान सभा भंग हो जाने के बाद धारा 370(3)के तहत शक्तियों का प्रयोग नहीं हो सकता इससे जम्मू और कश्मीर राज्य के भारत में विलय की प्रक्रिया पर विराम लग जाएगा जो उस प्रावधान के ही खिलाफ़ है. इस दृष्टिकोण से सहमति जताते हुए जस्टिस संजय किसन कौल ने जोर दिया कि धारा 370 का मूल उद्देश्य था कि धीरे-धीरे जम्मू और कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों के बराबरी के स्तर पर लाना लेकिन यदि संविधान सभा की सिफारिशों की आवश्यकता पर ही ज्यादा ध्यान देंगे तो धारा के पीछे की मूल भावना या इरादे निरर्थक हो जाएंगे. दोस्तों अब बात करेंगे कि Asymmetric Federalism की. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ध्यान खींचा की जिस तरह से भारत के संविधान के साथ सम्प्रभुता जुड़ा हुआ है उस तरह जम्मू और कश्मीर के संविधान के साथ संप्रभुता जैसी कोई बात नहीं है. धारा 370 Asymmetric Federalism के दूसरे प्रावधानों जैसे 371A और 371 की तरह एक प्रावधान है. 371A और 371 में कुछ राज्यों के साथ विशेष व्यवस्था का उदाहरण है. यदि इस बात को स्वीकार किया जाएगा कि धारा 370 के अंतर्गत जम्मू और कश्मीर एक संप्रभु राष्ट्र है तो फिर वे सारे राज्य जिनके भारत के साथ कुछ विशेष सम्बन्ध हैं वे राज्य भी संप्रभु हो जाएंगे. यह तो बिल्कुल ही सम्भव नहीं है. चीफ जस्टिस ने जोर देकर कहा कि अलग अलग राज्य अलग अलग स्वायत्तता का लाभ ले सकते हैं अन्तर कुछ कम या ज्यादा हो सकता है पर किसी भी प्रकार विशेष नहीं हो सकता. 

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