राज्य सरकारों और राज्यपालों के बीच चल रही तनातनी की जिसकी वजह से कई राज्य सरकारों के जनहित के कार्यक्रमों का क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है. राज्यपाल राज्य विधायिका द्वारा पारित विधेयकों को स्वीकृति नहीं दे रहे हैं जिससे राज्य सरकारों के काम काज में गतिरोध पैदा हो रहा है. आज य़ह जानने की कोशिश करते हैं कि यदि राज्य विधानसभा से पारित विधेयक को राज्यपाल की स्वीकृति के लिए सरकार द्वारा भेजा जाता है तो राज्यपाल के पास क्या विकल्प हैं. क्या राज्यपाल के पास
विवेकाधीन शक्तियाँ हैं और किन परिस्थितियों में इसका प्रयोग किया जा सकता है. राज्यपाल की शक्तियों पर Sarakariya commission की सिफारिशें क्या हैं. पंछी आयोग की सिफारिशें क्या हैं. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले एक Request अगर आप ने मेरे चैनल को अभी तक Subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ कर Subscribe कर लें और बेल icon को प्रेस कर दें ताकि आप तक मेरा वीडियो पहुँचता रहे. आते हैं पॉइन्ट पर. तमिलनाडु के राज्यपाल RN रवि ने तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित कई सारे विधेयकों को या तो स्वीकृति देने से इंकार कर दिया या उन्हें लम्बित रखा है, किसी विधेयक को छह महीने से, किसी को आठ महीने से और किसी किसी को तो साल भर से ज्यादा समय से . लंबा समय बीत जाने के बाद तमिलनाडु की राज्य सरकार ने राज्यपाल द्वारा कई विधेयकों को अनावश्यक रोके रखने को लेकर
honourable Supreme Court का दरवाजा खटखटाया है . Honourable Supreme Court ने राज्यपालों द्वारा कई विधेयकों को रोके जाने की प्रवृति पर गंभीर चिंता जाहिर की. पंजाब, केरल के राज्यपालों द्वारा भी राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को अनावश्यक रोके रखने की प्रवृत्तियों पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की. अब बात करेंगे कि क्या कहता है हमारा संविधान. संविधान की धारा 200 के अनुसार जब कोई विधेयक राज्य विधायिका द्वारा पारित होकर राज्यपाल की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाता है तब राज्यपाल के पास चार विकल्प हैं. पहला विधेयक को स्वीकृति प्रदान करें जिससे वह कानून बन जाता है. दूसरा Withhold कर सकते हैं या दूसरे शब्दों में रोक सकते हैं जिसके परिणामस्वरूप वह विधेयक कानून नहीं बन सकता. तीसरा विकल्प है राज्यपाल विधेयक को विधायिका को वापस भेज सकते हैं पुनर्विचार या Reconsideration के लिए पर य़ह मनी बिल नहीं होना चाहिए. मनी बिल को राज्यपाल नहीं रोक सकते हैं. यदि राज्य विधानसभा उसी विधेयक को कुछ संशोधनों के साथ या बिना किसी संशोधन के दोबारा राज्यपाल की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत करती है तो राज्यपाल स्वीकृति देने के लिए बाध्य हैं, उनके पास कोई विकल्प नहीं होगा. चौथा राज्यपाल विधेयक को राष्ट्रपति के विचार हेतु रिजर्व कर सकते हैं.
दोस्तों शमशेर सिंह केस और तमाम दूसरे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य विधायिका द्वारा पारित विधेयकों को रोकने या पुनर्विचार के लिए वापस भेजने के मामले में राज्यपाल कोई विवेकाधिकार या Discretionary Powers का ईस्तेमाल नहीं कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि राज्यपाल बाध्य हैं मंत्रिमण्डल की सलाह पर ही कोई निर्णय लेने के लिए. विधेयक पर रोक लगाने की स्थिति तब बनेगी जब राज्य विधायिका द्वारा पारित विधेयक एक प्राइवेट मेंबर बिल हो और जिस पर राज्य मंत्रिमण्डल ने स्वीकृति न देने की सलाह राज्यपाल को दी हो ताकि उक्त विधेयक कानून न बन सके. हालाँकि य़ह एक मुश्किल situation है वह इसलिए कि चूंकि मंत्रिमण्डल का राज्य विधानसभा में बहुमत होगा तभी उनकी सरकार है और बिना मंत्रिमण्डल के सहयोग के कोई भी विधेयक चाहे वह प्राइवेट मेंबर बिल ही क्यों न हो राज्य विधायिका से पारित नहीं हो सकता. इस तरह की स्थिति की संभावना न के बराबर है. दूसरी स्थिति य़ह हो सकती है कि मान लीजिए कि राज्य सरकार ने कोई विधेयक पारित कराया और उसे राज्यपाल की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत कर दिया इसी बीच स्वीकृति मिलने से पहले ही सरकार गिर जाती है या मंत्रिमण्डल इस्तीफा दे देता है. नयी सरकार गठित होती है और वह राज्यपाल से अनुरोध करती है कि उक्त विधेयक को स्वीकृति न दी जाय या रोक दिया जाय यानी Withhold कर दिया जाय. वास्तव में य़ह हुआ Power to Withhold any bill. या किसी विधेयक को रोकने के मामले में राज्यपाल का विवेकाधिकार या Discretionary Powers.
जहाँ तक बात है राज्यपाल द्वारा किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस करने के अधिकार का तो इस मामले में संविधान में कुछ भी स्पष्ट नहीं था. बताता चलूँ कि 1976 से पहले संविधान में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था कि राष्ट्रपति मंत्रिमण्डल की सलाह पर ही कार्य करने के लिए बाध्य हैं. हालाँकि इस पर सुप्रीम कोर्ट का मत स्पष्ट था कि राष्ट्रपति सिर्फ संवैधानिक प्रमुख हैं और वास्तविक शक्तियाँ चुनी हुई सरकार के पास होंगी, इसलिए राष्ट्रपति मंत्रिमण्डल की सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं बशर्ते मंत्रिमण्डल के पास लोकसभा में पर्याप्त बहुमत है. 42वे संशोधन के माध्यम से तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने इस स्थिति को और स्पष्ट करने की कोशिश की और संविधान की धारा 74(1) को संशोधित किया. इसमें जोड़ा गया कि There shall be a council of ministers with Prime Minister at the head to aid and advise the President who shall in the exercise of his functions act in accordance with such advice. इसका हिंदी अनुवाद होगा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रिमण्डल होगा जो राष्ट्रपति को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में सहायता और सलाह देगा और राष्ट्रपति उसी सलाह के अनुसार ही अपने कर्तव्यों का कार्य संपादन करेंगे. ध्यान देने वाली बात यह है कि इसमें अँग्रेजी का शब्द shall प्रयोग किया गया है जिसका मतलब साफ़ है कि राष्ट्रपति को मंत्रिमण्डल के सलाह पर ही कार्य करना होगा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. 44वें संविधान संशोधन के माध्यम से 1978 में जनता पार्टी सरकार ने संविधान की धारा 74(1) को ज्यों का त्यों रहने दिया लेकिन उसमें एक प्रावधान और जोड़ दिया कि ' बशर्ते राष्ट्रपति मंत्रिमण्डल को उसके सलाह पर पुनर्विचार या Reconsideration का संदेश दे सकते हैं लेकिन मंत्रिमण्डल यदि पुनर्विचार के बाद किसी संशोधन के साथ या बिना किसी संशोधन के फिर से सलाह देता है तो राष्ट्रपति उसे मानने के लिए बाध्य हैं. गौरतलब है कि जो संवैधानिक सम्बन्ध केन्द्र सरकार और राष्ट्रपति के बीच है उसी तर्ज़ पर राज्य सरकार और राज्यपाल के संबंधों की व्याख्या होती है. इस हिसाब से यदि राज्य मंत्रिमण्डल पुनर्विचार के बाद फिर से कुछ संशोधनों के साथ या बिना किसी संशोधन के दोबारा उस विधेयक को राज्यपाल के पास स्वीकृति के लिए प्रस्तुत करती है तो राज्यपाल को स्वीकृति देनी होगी, उनके पास कोई और विकल्प नहीं है. इस स्थिति में स्वीकृति देना राज्यपाल की बाध्यता है. कुछ विधेयक ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें राष्ट्रपति के विचार हेतु या For the consideration of the President रिज़र्व करना राज्यपाल की बाध्यता है जैसे यदि राज्य विधायिका ऐसा कोई विधेयक पारित करती है जिसका उद्देश्य हाई कोर्ट के अधिकारों में किसी तरह की छेड़छाड़ करना हो या उसमें कटौती करना हो तो उस विधेयक को राज्यपाल रिजर्व कर सकते हैं राष्ट्रपति के विचार हेतु. एक स्थिति और है यदि राज्य विधायिका समवर्ती सूची के किसी विषय पर कानून बनाती है और वह पहले से मौजूद किसी केन्द्रीय कानून का उल्लंघन करती हो तो ऐसी अवस्था में उस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए रिजर्व रखना राज्यपाल की बाध्यता है. बहुत ही रेयर केस में राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार हेतु रिजर्व कर सकते हैं यदि वह महसूस करते हैं कि विधेयक के कुछ प्रावधान संविधान का उल्लंघन करते हैं या संविधान की भावनाओं के बिपरीत हैं, इस विधेयक पर राष्ट्रपति द्वारा विचार देश हित में जरूरी है. यहाँ पर यह स्पष्ट करना जरूरी है कि संविधान में कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है जिसके अन्दर राष्ट्रपति या राज्यपाल को किसी भी विधेयक पर अपना निर्णय ले लेना चाहिए. यहां पर संविधान silent है इसी फायदा उठाते हैं राज्यपाल और विधेयकों को बस पड़े रहने देते हैं बिना कोई निर्णय लिए.
दोस्तों अब आते हैं Sarakariya commission की सिफारिशों पर, उसका क्या कहना है इस विवाद पर. 1987 में Sarakariya commission ने अपनी तमाम सिफारिशों में इस बात पर जोर दिया कि सिर्फ राष्ट्रपति के विचार हेतु किसी बिल को रिजर्व रखना वह भी बहुत ही विशेष परिस्थितियों में ही राज्यपाल के विवेकाधीन या Discretionary Powers में आता है. मतलब यह है कि यदि राज्य विधायिका द्वारा पारित कोई विधेयक कहीं से भी संविधान का उल्लंघन करता दिख रहा है उस अवस्था में ही राज्यपाल उक्त विधेयक को राष्ट्रपति के विचार हेतु रिजर्व कर सकते हैं. इन विशेष परिस्थितियों के अलावा राज्यपाल को हर हाल में संविधान की धारा 200 के अन्तर्गत राज्य मंत्रिमण्डल की सलाह पर ही अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ेगा. The Governor has to discharge his functions according to the advice of council of ministers. Sarakariya commission ने आगे कहा कि जो भी विधेयक राष्ट्रपति के विचार हेतु प्रस्तुत किए गए हैं उस पर राष्ट्रपति को अपना निर्णय अधिक से अधिक छह महीने के अंदर ले लेना चाहिए. यदि राष्ट्रपति किसी बिल को रोकते हैं या Withhold करते हैं तो प्रयास होना चाहिए कि विधेयक को रोकने के क्या कारण हैं इसकी पूरी जानकारी राज्य सरकार को दी जाय जहाँ तक सम्भव हो. 2010 में पंछी आयोग ने भी इस बात पर जोर दिया कि राज्य विधायिका द्वारा पारित विधेयकों पर अधिक से अधिक छह महीनों में
राज्यपाल अपना निर्णय लें. दोस्तों सवाल है कि य़ह गतिरोध कैसे दूर हो. राज्यपाल के पदों का राजनीतिकरण ही वह सबसे बड़ी बीमारी है जो देश के संघीय ढांचे को खोखला कर रही है. विगत कई वर्षों से विभिन्न राजनैतिक गलियारों से राज्यपाल का पद पूर्णतया समाप्त कर देने की मांग उठी है. लेकिन संविधान में जिस तरह हेड ऑफ the Govt के तौर पर या सरकार के मुखिया के तौर पर राष्ट्रपति पद की व्यवस्था है उसी तर्ज़ पर राज्यों में भी प्रतीकात्मक Head of the Govt की जरूरत समझी गयी. इसके अलावा केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल देश की एकता और अखण्डता बनाए रखने में एक बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं खास तौर पर किसी नाजुक दौर में. इसके अलावा संघवाद या Federalism हमारे संविधान के मूल ढांचे यानी Basic structure का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है इसलिए राज्यपालों का य़ह प्रयास होना चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में चुनी हुई सरकारों के शक्तियों या उनके कार्य संचालन में कोई बाधा उत्पन्न न हो. उल्टे राज्यपालों को एक विश्वास का वातावरण पैदा करना चाहिए जिससे कि केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सके और दोनों सरकारें मिलकर जन- आकांक्षाओं को पूरा करने में एक दूसरे की मदद करें. राज्यपालों का अनावश्यक हस्तक्षेप और राज्य सरकारों के लिए गतिरोध पैदा करने की प्रवृति को लेकर अनेक मामले सुप्रीम कोर्ट में लम्बित हैं. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने सख्त टिप्पणी में कहा कि राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों को आत्ममंथन करना चाहिए. संविधान में जरूरी संशोधन करके ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है कि राज्यपालों की नियुक्ति में मुख्यमंत्री की सहमती जरूरी हो. पंछी आयोग की य़ह सिफारिश विचारणीय है कि राष्ट्रपति के तर्ज़ पर राज्यपालों को भी महाभियोग Impeachment के जरिए हटाने की व्यवस्था हो. यदि ऐसी व्यवस्था बनती है तो राज्य सरकारों के पास जरूरी अधिकार होगा कि अनावश्यक गतिरोध पैदा करने वाले राज्यपालों को महाभियोग के जरिए हटाया जा सके. य़ह व्यवस्था निश्चित रूप से राज्यपालों के मनमाने तरीकों से काम करने की प्रवृति पर अंकुश का कार्य करेगी. ऐसी व्यवस्था का केन्द्र और राज्य सरकारों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और परिणाम य़ह होगा कि दोनों सरकारें केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच एक जिम्मेदारी भरा सहयोग होगा और जनहित में चलायी जा रही योजनाओं का लाभ आम जनता को सुचारू रूप से मिल पाने में मदद मिलेगी. दोस्तों आशा है वीडियो पसन्द आया होगा.
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