भारत में चल रहे प्रोजेक्ट टाइगर ने 1973 में पहली बार देश के सामने टाइगर रिजर्व की अवधारणा को प्रस्तुत किया . कभी फॉरेस्ट अधिकारियों द्वारा एक प्रशासनिक कदम से शुरुआत करने वाला टाइगर रिजर्व 2006 आते आते एक वैधानिक स्वरुप ले चुका था. आज भारत के बाघ संरक्षण योजना की पूरी दुनियाँ में सराहना हो रही है. बात करेंगे कि भारत में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत कब और कैसे हुई.1972 में देश के वन्यजीवों की सुरक्षा के मद्देनज़र एक नया कानून बनाया गया वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 यानी Wild Life Protection Act 1972 जिसके अंतर्गत Notified फॉरेस्ट एरिया में चिन्हित स्थानों पर नैशनल पार्क बनाए गए. यहाँ पर रह रहे वनवासियों के अधिकारों को समाप्त करके वे सारे अधिकार राज्य सरकारों को सौंप दिए गए. नए कानून के अंतर्गत कई वाइल्डलाइफ Sanctuaries भी बनाए गए जिसमें वनवासियों को कुछ सीमित अधिकारों का इस्तेमाल करने की इजाजत दी गयी. आज देश में बाघों की बढ़ती संख्या इस महान प्रयास का ही परिणाम है. इसी प्रयास का परिणाम है प्रोजेक्ट टाइगर. दोस्तों 1973 में करीब 1915 स्क्वेयर किलोमीटर एरिया में नौ टाइगर रिजर्व बनाए गए और आज देश के 18 राज्यों में करीब 78135.956 स्क्वेयर किलोमीटर एरिया में 54 टाइगर रिजर्व हैं. वाइल्ड लाइफ Sanctuaries और नैशनल पार्क का करीब 26% एरिया यानी 42,913.37 स्क्वेयर किलोमीटर एरिया पर क्रिटिकल टाइगर Habitat यानी CTH बनाए गए हैं. 2022 के अन्त तक कैमरा ट्रैप मेथड के अनुसार देश में कुल बाघों की संख्या 3167 से लेकर 3925 के बीच में है. देस के जंगलों का एक हिस्सा सिर्फ बाघों के लिए सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने क्रिटिकल टाइगर Habitat
यानी CTH बनाये. क्रिटिकल टाइगर Habitat के इर्द-गिर्द जंगलों और साधारण क्षेत्रों को मिलाकर एक बफर एरिया बनाया गया है. बफर एरिया का अर्थ है कि इसमें कोई आ जा नहीं सकता. हालाँकि इस किलेबन्दी को लेकर कई आपत्तियाँ भी हैं जैसे कि बाघों के अधिकारों को बचाने के लिए उन वनवासियों को भी जंगलों से हटा दिया गया जो पीढ़ियों से बाघों के साथ रहते आए हैं. दोस्तों काफी ज्यादा पैसा खर्च करने के बावज़ूद कम होती जा रही बाघों की संख्या के मद्देनज़र प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में एक पाँच सदस्यों वाले टाइगर टास्क फोर्स का गठन किया कि इसकी वजह क्या है. टाइगर टास्क फोर्स का मानना था कि बंदूक, वनरक्षक, और बाड़ टाइगरों की सुरक्षा करने में उतने प्रभावकारी नहीं हैं. इसके अलावा वन अधिकारियों एवं वनवासियों के बीच का संघर्ष टाइगर्स के लिए घातक साबित हो रहा है. टाइगर टास्क फोर्स ने इस बात पर जोर दिया कि समस्या य़ह है कि वनवासियों के जीवन यापन को वन संरक्षण से अलग नहीं किया जा सकता है और वन संरक्षण को टाइगर संरक्षण से अलग नहीं किया जा सकता है. दोस्तों इस समस्या से निपटने के लिए संसद ने सितंबर 2006 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 यानी Wild Life Protection Act को संशोधित करते हुए नैशनल टाइगर Conservation Authority का गठन किया और एक टाइगर Conservation योजना की शुरुआत की. Critical Tiger Habitat यानी CTH को पूरी तरह से सुरक्षित रखने के लिए संशोधित कानून में ज़रूरत के मुताबिक वनवासियों को विस्थापित करने की योजना बनाई गई. चार महीने बाद सरकार ने एक नया कानून बनाया Schedule Tribes and other traditional dwellers(Recognition of Forest rights ) Act 2006 जिसको FRA के नाम से भी जाना जाता है FRA के अन्तर्गत वनवासियों के प्रथागत एवं परंपरागत अधिकारों को न सिर्फ वन क्षेत्रों में बल्कि टाइगर रिजर्व में भी मान्यता दी गयी. इस कानून के अंतर्गत निवास के आधार पर चुनी गई वनवासियों की एक ग्रामसभा लोकतान्त्रिक तरीकों से वन अधिकारों यानी फॉरेस्ट राइट्स का निर्धारण और सीमांकन करेगी. इन ग्रामसभाओं को य़ह अधिकार होगा कि वे अपने प्रथाओं और परम्पराओं की सीमा में रहकर जंगलों, वन्यजीवों, जैव विविधता की सुरक्षा, संरक्षण, और प्रबंधन करें. इसके परिणामस्वरूप FRA ने 1.79 लाख गाँवों का जीवन यापन सुनिश्चित किया. महत्त्वपूर्ण बात यह है कि FRA ने क्रिटिकल टाइगर Habitat की तर्ज़ पर क्रिटिकल वाइल्ड लाइफ Habitat CWH का निर्माण किया. दोनों में सिर्फ एक अन्तर है कि यदि एक बार कोई Habitat क्रिटिकल वाइल्ड लाइफ Habitat घोषित कर दिया जाता है तो इसका प्रयोग Non-Forest Purposes के लिए नहीं किया जा सकता. दोस्तों सरकार ने FRA कानूनों को 1 जनवरी 2009 को लागू करने और क्रियान्वित करने की योजना बनाई. लेकिन इसके पहले 16 नवम्बर 2007 को नैशनल टाइगर Conservation अथॉरिटी ने चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डेन को 13 दिन के अन्दर ही करीब 800-1000 स्क्वेयर किलोमीटर के क्रिटिकल टाइगर Habitat यानी CTH के प्रस्ताव देने को कहा परिणाम स्वरूप सरकार ने वाइल्ड लाइफ Protection Act के सेक्शन 38(v) के अन्तर्गत 12 राज्यों में 26 टाइगर रिजर्व के लिए नोटिफिकेशन जारी किया. 25,548.54 स्क्वेयर किलोमीटर के Notified एरिया के 91.72% पर क्रिटिकल टाइगर Habitat यानी CTH है. ओडिशा के Similipal के अलावा किसी भी CTH के पास बफर Zone नहीं था. 2012 में सुप्रीम कोर्ट की NTCA को फटकार के बाद इन्हें जोड़ा गया. दोस्तों मूल रूप से टाइगर रिजर्व को Scientific और Objective Criteria के आधार पर लोकतांत्रिक तरीकों से बनाया जाना था. टाइगर संरक्षण योजना को फॉरेस्ट या टाइगर रिजर्व में रहने वाले लोगों के जीवन यापन, कृषि, उनके विकास, या उनके अन्य हितों को सुनिश्चित करना था. क्रिटिकल टाइगर Habitat बनाने का जो आधार है वह इस बात का प्रमाण है कि किस हद तक लोंगों की गतिविधियों ने वन्य जीवन यानी वाइल्ड लाइफ का नुकसान किया है. सारे बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह देखे कि क्या टाइगर और वनवासी एक साथ रह सकते हैं और यदि य़ह सम्भव नहीं है तो जरूरत के मुताबिक वनवासियों के अधिकारों में उपयुक्त परिवर्तन करे. तभी वनवासियों और Adivasiyon के अधिकारों के साथ बिना कोई छेड़छाड़ किए ही क्रिटिकल टाइगर Habitat यानी CTH को स्थापित किया जा सकता है. CTH के बाहर बफर एरिया मानव-पशु सह अस्तित्व यानी Human-Animal Coexistence बढ़ावा देते हुए स्थानीय जनता के जीवन यापन, उनके विकास, सामाजिक एवं साँस्कृतिक अधिकारों को मान्यता देनी होगी. विशेषज्ञों और ग्राम सभाओं की राय और Objective Criteria के आधार पर इसके भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण किया जाना चाहिए. समस्या य़ह है कि बिना इन मानदण्डों को पूरा किये ही सभी टाइगर रिजर्व को Notify किया गया है. सरकार ने वनवासियों, Adivasiyon, और अन्य परंपरागत निवासियों से कोई राय मशविरा नहीं किया. परिणाम य़ह हुआ कि टाइगर और वनवासी दोनों ही एक कठिन परिस्थिति में उलझ गए हैं. दोस्तों अब बात करेंगे विस्थापन और पुनर्वास की. वाइल्ड लाइफ Protection Act के अंतर्गत स्वेच्छापूर्वक आपसी सहमती से ही विस्थापन किया जा सकता है. यदि एक बार FRA के अन्तर्गत लोंगों के अधिकारों को मान्यता मिल जाती है तो सरकार उन अधिकारों का The right to fair compensation and transparency in Land aquisition,Rehabilitation and Resettlement (LARR) Act 2013 के अनुसार अधिग्रहण कर सकती है. प्रभावित लोंगों की सहमति के बगैर किसी को भी विस्थापित नहीं किया जा सकता. LARR के अंतर्गत पुनर्वास की व्यवस्था होनी चाहिए, साथ ही प्रभावित एवं विस्थापित लोंगों को आर्थिक सहायता के साथ साथ उनके जीवन यापन की भी व्यवस्था होनी चाहिए. दोस्तों LARR के अंतर्गत विस्थापित लोंगों को ज़मीन के बाजार भाव से दोगुना मुआवजा, उस पर लगे पेड़ या अन्य सम्पत्ति का बाजार भाव के अनुसार, एक साल के लिए निर्वहन भत्ता, एक मुश्त आर्थिक सहायता देय होगी. इसके अलावा घर बनाने के लिए बिल्डिंग मटेरियल सरकार को देना होगा, घर के जरूरी समान खरीदने के लिये और एक मुश्त पुनर्वास भत्ता भी देय होगा. हर प्रभावित परिवार को एक घर और जमीन पाने का अधिकार होगा. पुनर्वास योजना के अंतर्गत विस्थापित परिवारों को वैकल्पिक ईंधन, चारा, लकड़ी के अलावा कुछ वन्य उत्पाद, बिजली कनेक्शन, सडकें, Drainage, सेनिटेशन, पीने का साफ़ पानी, चारागाह, Ration की दुकान, पंचायत भवन, पोस्ट ऑफिस, बीज़ और खाद भंडार, सिंचाई के साधन, शवदाह गृह या कब्रिस्तान, आंगनबाड़ी स्कूल, स्वास्थ्य केन्द्र, पशु चिकित्सालय, सामुदायिक भवन, पूजास्थल, आदिवासी संस्थाओं के लिए अलग से जमीन देना होगा. लेकिन केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों ने अपने आपको 2008 के प्रोजेक्ट टाइगर के केन्द्र प्रायोजित योजनाओं के दिशानिर्देशों और बाद के कुछ दिशानिर्देशों तक ही सीमित रखा. पुनर्वास के लिए एक मुश्त आर्थिक सहायता के तौर पर 10 लाख जो कि April 2021 में बढ़ाकर 15 लाख कर दिया गया, देय है. पर य़ह पूरा मुआवजा, पुनर्वास, एवं विस्थापन के लिए उचित विकल्प नहीं है. 2018 तक क्रिटिकल टाइगर Habitat यानी CTH में कुल गाँवों की संख्या 2808 थी. 12 जुलाई 2019 को पर्यावरण मंत्रालय ने संसद में स्पष्ट किया कि CTH में अभी भी कुल 58,386 परिवार रह रहे हैं जिसमें 42,398 परिवार 50 टाइगर रिजर्व के अन्दर हैं. दोस्तों सच्चाई तो य़ह है कि वनवासियों के अधिकार टाइगर रिजर्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं. मार्च 2017 में नैशनल टाइगर Conservation अथॉरिटी ने पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी किए जाने वाले क्रिटिकल वाइल्डलाइफ Habitat
दिशानिर्देशों के अभाव में FRA के अन्तर्गत अधिकारों को मान्यता देने से इंकार कर दिया. वाइल्ड लाइफ Protection Act और FRA दोनों के अनुसार वनवासियों के अधिकारों को CTH के अन्दर ही मान्यता मिले. अंततः 2018 में पर्यावरण मंत्रालय ने जब दिशानिर्देशों को जारी किया तब जाकर NTCA ने दो महीने के बाद प्रतिबंध को वापस लिया. FRA मूल रूप से 13 सार्वजनिक सुविधाएं प्रदान करता है जिसके अंतर्गत एक Hectare से कम वन्य भूमि पर 75 पेड़ों को गिराने की इजाजत है. इस Diversion के लिए ग्रामसभा की सहमती जरूरी है. 28 October 2020 को पर्यावरण मंत्रालय ने जोर दिया कि नैशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ जो कि वाइल्ड लाइफ Protection Act के अंतर्गत एक कानूनी संस्था है उसको वाइल्ड लाइफ Clerence जारी करना चाहिए यदि Diversion नैशनल पार्क या वाइल्ड लाइफ Sanctuaries से हो. कानून के मुताबिक उन्हीं परियोजनाओं को Clearence की जरूरत होगी जिसके लिए पर्यावरण मंत्रालय की Clearence चाहिए पर इनमें से कोई भी सार्वजनिक सुविधाओं में से नहीं है. टाइगर्स और टाइगर रिजर्व की बढ़ती हुई संख्या और उनको जोड़ते टाइगर Corridores इस बात की संभावना को बल देते हैं कि आने वाले समय में टाइगर्स के इलाके वास्तव में संघर्ष क्षेत्र या Hotspot of Conflict होंगे.
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