22 नवंबर 2023 को बिहार सरकार के कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित करके बिहार के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग की. विशेष राज्य के दर्जे की मांग का आधार बनाया गया है बिहार जातीय गणना 2022 को जिसमें य़ह बात निकल कर सामने आयी है कि बिहार की करीब एक तिहाई जनता ग़रीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करने को मजबूर है.
दोस्तों आज जानने की कोशिश करेंगे कि क्या होता है विशेष राज्य का दर्जा और क्या होते हैं इसके फायदे ? क्यों बिहार मांग कर रहा है विशेष राज्य का दर्जा ? य़ह भी जानेंगे की इस पर Raghuram Rajan कमेटी की रिपोर्ट क्या है. विशेष राज्य का दर्जा होता क्या है. य़ह वर्गीकरण केन्द्र सरकार द्वारा किया जाता है उन राज्यों के विकास में मदद करने के लिए जो भौगोलिक या सामाजिक-आर्थिक कारणों से पिछड़ेपन का शिकार हैं. दोस्तों विशेष राज्य का दर्जा प्रदान की बात पहली बार पांचवे वित्त आयोग 1969 की सिफारिशों में की गयी. वित्त आयोग ने मुख्य रूप से पांच कारणों को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने का आधार बनाया, पहला पर्वती और दुर्गम क्षेत्र हो, दूसरा कम जनसंख्या ghanatv या आदिवासी बहुल क्षेत्र हो, तीसरा सीमावर्ती क्षेत्र हो और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो, चौथा आर्थिक एवं आधारभूत संरचना का पिछड़ापन यानी कोई इलाक़ा आर्थिक रूप से कमजोर हो और इन्फ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी हो, पाँचवा राज्य की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल हो. इस तरह पाँच मापदंडों यानी Criteria पर विचार किया जाता है किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने से पहले. दोस्तों, 1969 में तीन राज्यों जम्मू और कश्मीर, असम और नागालैंड को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान किया गया. उसके बाद आठ अन्य राज्यों को भी विशेष राज्य का दर्जा प्रदान किया गया जिसमें अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, सिक्किम ,त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं. इन राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा तत्कालीन राष्ट्रीय विकास पारिषद ने प्रदान किया था.
दोस्तों अब बात करेंगे कि विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त करने से राज्यों को क्या क्या फायदे होते हैं. गाडगिल-मुखर्जी फॉर्मूले के अनुसार राज्यों को मिलने वाली केंद्रीय सहायता यानी Central Assistance का 30% सिर्फ विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों के लिए आवंटित किया गया था. योजना आयोग की समाप्ति के बाद 14वें और 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार अब विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त राज्यों को मिलने वाली केंद्रीय सहायता को Divisible pool funds में समाहित कर दिया गया है इसके साथ ही 15वें वित्त आयोग की द्वारा 32%से 41%कर दिया गया. इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजनाओं में Centre-State funding यानी केन्द्र-राज्य फंडिंग का अनुपात समान्य राज्यों को मिलने वाले 60:40 या 80:20 से बढ़ाकर 90:10 कर दिया गया है. इसके अलावा बहुत से दूसरे प्रोत्साहन Incentives भी विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को मिलते हैं जैसे कस्टम, सेंट्रल एक्साइज और दूसरे टैक्स में छूट. दोस्तों सवाल उठता है कि बिहार क्यों मांग रहा है विशेष राज्य का दर्जा. समय समय पर विभिन्न राजनैतिक दल बिहार को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने की मांग करते रहे हैं. प्राकृतिक संसाधनों की कमी, सिंचाई के लिए लगातार जलापूर्ति, प्रदेश के उत्तरी क्षेत्रों में अक्सर बाढ़ की स्थिति, दक्षिण बिहार में लगातार सूखे की स्थिति जैसे समस्याओं की वजह से बिहार की गरीबी और पिछड़ापन दूर नहीं हो रहा है. इसके अलावा बिहार के विभाजन के बाद बहुत सारे उद्योग झारखंड में चले गए जिसकी वजह से राज्य में रोजगार और निवेश Investment दोनों के अवसर कम हो गए. 54000 रुपये के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद यानी per capiya GDP के साथ बिहार सबसे गरीब राज्यों में से एक है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि राज्य में 94 लाख से भी ज्यादा परिवार गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं. यदि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान किया जाता है तो करीब 2.5 लाख करोड़ का फंड मिल सकता है जिससे अगले पांच वर्षों में तमाम ज़न कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया जा सकता है.
दोस्तों आइए जानते हैं क्या ऐसे दूसरे राज्य भी हैं जो विशेष राज्य का दर्जा प्रदान किए जाने की मांग कर रहे हैं. 2014 में विभाजन के बाद से ही आन्ध्र प्रदेश विशेष राज्य के दर्जे की मांग करता आया है. उसका दावा है कि हैदराबाद के तेलंगाना में जाने के आन्ध्र प्रदेश को राजस्व यानी Revenue का बहुत नुकसान हुआ है. उड़ीसा भी समय-समय पर विशेष राज्य के दर्जे की मांग करता रहा है. उड़ीसा का कहना है कि राज्य आदिवासी बहुल क्षेत्र है. इसके साथ ही राज्य प्राकृतिक आपदाओं जैसे चक्रवात की मार लगातार झेलता रहता है. केन्द्र 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर विशेष राज्य के दर्जे की मांग को ठुकराता रहा है. उल्लेखनीय है कि 14वें वित्त आयोग ने किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के खिलाफ सिफारिश किया है.
दोस्तों, अब बात करेंगे कि क्या बिहार के विशेष राज्य के दर्जे की मांग जायज है. विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त करने के लिए निर्धारित अधिकांश मानदंडों या Criteria को बिहार पूरा करता है परन्तु पहाड़ी क्षेत्र और भौगोलिक रूप से दुर्गम क्षेत्र होने के कारण राज्य की आधारभूत संरचना का विकास न हो पाना जैसे महत्वपूर्ण मानदंड को पूरा नहीं करता है. यही बिहार को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट है. केन्द्र द्वारा नियुक्त Raghuram Rajan कमेटी ने 2013 में ही बिहार को सबसे कम विकसित राज्य की श्रेणी में रखा था. इसके साथ ही विशेष राज्य के दर्जे के स्थान पर बहु-आयामी index या Multi-Dimensional Index के आधार पर फंड का आवंटन करने के लिए एक नयी कार्यप्रणाली Methodology का सुझाव दिया जिससे कि राज्य के पिछड़ेपन की समस्या को दूर किया जा सके. दोस्तों अब बात करते हैं कि क्यों बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना ही चाहिए. बिहार भारत का दूसरा सबसे बड़ी आबादी वाला गरीब राज्य है जहाँ अधिकांश आबादी समुचित सिंचाई के अभाव में मॉनसून, बाढ़, सूखे के बीच बहुत ही निम्न उत्पादकता वाली कृषि पर जीवन यापन के लिए मज़बूर है. करीब 96% कृषि छोटे और मंझोले किसानों के पास है. करीब 32% परिवारों के पास या तो कोई जमीन नहीं है और यदि थोड़ी बहुत है भी तो वह नहीं के बराबर है. 15 जिले तो बाढ़ क्षेत्र में आते हैं जहां हर साल कोसी, कमला, गंडक, Mahananda,Punpun,सोन, गंगा आदि नदियों की बाढ़ से करोडों की संपत्ति, जानमाल, आधारभूत संरचना और फसलों का नुकसान होता है. कोसी नदी के बाढ़ के पानी से बिहार के कई जिलों में तबाही मचती रहती है. विकास के बुनियादी ढांचे सड़क, बिजली, सिंचाई,स्कूल, अस्पताल, संचार आदि का वहाँ नितांत अभाव तो है ही हर साल बाढ़ के बाद इनके पुनर्निर्माण के लिए अतिरिक्त धनराशि की व्यवस्था स्वयं में बहुत बड़ी चुनौती होती है. पिछले सात आठ सालों में बिहार की सालाना विकास दर कई अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर रही है. सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब विकास दर लगातार बेहतर हो रही है तो विशेष राज्य का दर्जा क्यों. बिहार में विकास दर उन क्षेत्रों में ज्यादा हो रहा है जहां पर रोजगार के अवसर अपेक्षाकृत कम होते हैं जैसे यातायात, संचार, होटल, रेस्तरां,रियल एस्टेट, वित्तीय सेवाओं इत्यादी.बिहार में विकास दर उन क्षेत्रों में ज्यादा नहीं है जो रोजगार की सम्भावनायें पैदा करते हैं जैसे खेती-बाड़ी, उद्योग और तमाम दूसरे असंगठित क्षेत्र. स्वास्थ्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सारे सार्थक प्रयास हुए हैं जिसकी वजह से खर्चों में महत्तवपूर्ण बढ़ोतरी हुई है पर य़ह सबकुछ अन्य राज्यों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से कम है. छोटी अर्थव्यवस्था होने के कारण बिहार में रोज़गार के अवसरों में वह वृद्धि नहीं दिखाई दे रही है. गरीबी उन्मूलन के तमाम कार्यक्रमों के बावजूद भी धरातल पर कुछ बड़ा परिवर्तन नहीं दिखाई दे रहा है. सार्वजनिक क्षेत्र में पर्याप्त वित्तीय निवेश का न हो पाना भी बिहार के पिछड़ेपन का एक बहुत बड़ा कारण है. बिहार को पैसा मुख्य रूप से केन्द्रीय वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर, सेंट्रल टैक्स में हिस्सा ,केन्द्रीय अनुदान, केंद्र सरकार के प्रायोजित योजनाओं के साथ साथ बिहार सरकार द्वारा लगाए टैक्स के माध्यम से होता है. केन्द्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजनाओं में राज्यों की भागीदारी 30% से 55% तक होती है. समस्या य़ह है कि गरीब राज्यों में जनता गरीब होती है, टैक्स कहाँ से देगी. परिणामस्वरूप राज्य के हिस्से का योगदान आएगा कहाँ से. होता य़ह है कि अपने हिस्से का योगदान न दे पाने के कारण गरीब राज्य केन्द्रीय योजनाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पाते. यदि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान किया जाता है तो न सिर्फ़ 90% अनुदान मिलेगा बल्कि तमाम तरह के टैक्स में छुट भी मिलेगी जिसका सीधा लाभ निवेशकों को मिलेगा. इससे राज्य में निवेश का अनुकूल वातावरण बन पाएगा साथ ही साथ तमाम विकास योजनाएं भी लाभान्वित होंगी. दोस्तों अगर बात की जाय प्रति व्यक्ति योजना व्यय की तो पंजाब जैसे राज्य से एक तिहाई से भी कम धनराशि बिहार जैसे गरीब राज्य को मिल पाती है जाहिर है इसका सीधा प्रभाव गरीबी उन्मूलन और विकास कार्यक्रमों पर पड़ता है. आज जरूरत इस बात की है कि केन्द्रीय संसाधनो में गरीब राज्यों की हिस्सेदारी कैसे बढ़ाया जाय जिससे गरीबी उन्मूलन के लिए आवश्यक विकास दर का लक्ष्य हासिल किया जा सके. बिहार राज्य के विभाजन के कारण ज्यादातर खनिज सम्पदा झारखण्ड के हिस्से में चले गए जिससे बिहार को खनिज सम्पदा से मिलने वाली Royalty का भारी नुकसान उठाना पड़ा है जिससे राज्य के विकास कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है.
दोस्तों, देश तब तक विकास नहीं कर सकता जब तक राज्यों से गरीबी दूर नहीं होगी. गरीब राज्यों का समुचित विकास ही देश को विकसित राष्ट्र की ओर ले जा सकता है. जब तक गरीब राज्य विकसित नहीं होंगे, क्षेत्रीय विषमता दूर नहीं होगी. छोटे मोटे संशोधनों को प्रभावी बनाकर बिहार जैसे पिछले राज्य को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान किया जाता है तो य़ह कदम राज्य के समग्र विकास की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा.
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