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गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन या Gurudwara reform movement

 पंजाब का गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन क्या था. कैसे गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतो के चंगुल से आजाद कराया गया. इसमे अकालियों का त्याग और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का गठन.
 स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान राष्ट्रवाद और लोकतन्त्र के पक्ष में बह रही देश की हवा ने धीरे-धीरे देश के सामाजिक और धार्मिक मामलों को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया. गाँधी जी के दिखाए अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते समाज के कमजोर वर्गों के लिए एक मजबूत हथियार बनकर सामने आए. धीरे-धीरे ज़न चेतना के संचार एवं विस्तार के परिणामस्वरूप भारत के सामाजिक और धार्मिक सुधार आन्दोलन देश के स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ गए. दरअसल जैसे जैसे देश का राष्ट्रीय आन्दोलन आगे बढ़ रहा था वैसे- वैसे उपनिवेशवाद यानी Colonialism का आधार सिमट रहा था. ब्रिटिश अधिकारियों ने सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से प्रतिक्रियावादी शक्तियों का समर्थन हासिल करने का प्रयास करना शुरू कर दिया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है पंजाब का गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन या अकाली आन्दोलन. एक धार्मिक आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ अकाली आन्दोलन अन्त में भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन का एक बहुत ही शक्तिशाली मोड़ साबित हुआ. दोस्तों गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन के दौरान 1920 से 1925 के बीच तीस हजार से ज्यादा लोग अंग्रेजों द्वारा जेल में डाल दिए गए, चार सौ से ज्यादा लोग शहीद हो गए और दो हजार से ज्यादा लोग घायल हुए. दोस्तों गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन या अकाली आन्दोलन का उद्देश्य मूलरूप से गुरुद्वारों को अयोग्य एवं भ्रष्ट महंतो के चंगुल से बाहर निकालना था. बात असल में य़ह थी कि उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान  महाराजा रंजीत सिंह जी के शासनकाल में और उसके बाद तमाम सिख सरदारों और धर्मनिष्ठ सिक्खों ने खुले दिल और खुले हाथों से गुरुद्वारों को तमाम जमीनें और दौलत दान में दिए थे. आम तौर पर सभी गुरुद्वारे दौलत संपन्न थे. दोस्तों अठारहवीं शताब्दी के दौरान गुरुद्वारों का प्रबंधन उदासी सिख महंतो के हाथ में आ गया था. ये उदासी महंत सिख परम्परा के ही लोग थे पर मुगलों के अत्याचारों से बचने के लिये  वे लंबे बाल नहीं रखते थे. हुआ य़ह कि इन महंतो की नयी पीढ़ी गुरुद्वारों में आने वाले चढ़ावे  और अन्य सम्पत्तियों को निजी संपत्ति समझ कर इस्तेमाल करने लगे जिससे उनके बीच भ्रष्टाचार फैल गया और कई महंत तो अय्याशी का जीवन व्यतीत करने लगे और चारित्रिक गिरावट भी देखी जाने लगी. इसके अलावा 1849 में पंजाब पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया तो अंग्रेजों द्वारा नियुक्त प्रबंधकों और Custodians का भी गुरुद्वारों के कामकाज में काफी हद तक हस्तक्षेप होने लगा. भ्रष्ट महंतो और सरकारी प्रबंधकों के बीच सांठगांठ होने लगी .दोस्तों सिक्ख समाज सुधारक गुरुद्वारा प्रबंधन में पूरी तरह से बदलाव लाना चाहते थे ताकि गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतो और अंग्रेज़ी सरकार के एजेंटों के चंगुल से मुक्त किया जा सके. राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं में चिन्ता तब और बढ़ गयी जब स्वर्ण मंदिर के महंतो ने गदर क्रांतिकारियों को पाखण्डी करार दिया. इतना ही नहीं जलियांवाला बाग हत्याकांड के अपराधी जनरल Dayer को सरोपा भेंट करके सम्मानित किया यहाँ तक कि उसे सिक्ख घोषित किया. दोस्तों 1920 में गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन तेजी पकड़ने लगा. अकाली Volunteers यानी जत्था को संगठित किया जाने लगा ताकि महंतो और सरकारी एजेंटों को मजबूर करके गुरुद्वारों को उनके नियंत्रण से बाहर किया जा सके. दोस्तों सुधारवादियों को शुरुआती सफलता हासिल हुई और दस से ज्यादा गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतो और सरकारी एजेंटों के चंगुल से मुक्त करा लिया गया. सिक्ख आस्था के सर्वोच्च पीठ स्वर्ण मंदिर और अकाल तख्त को भी मुक्त करा लिया गया. सुधारवादियों ने सरकार से मांग की कि स्वर्ण मंदिर को सिक्खों के प्रतिनिधि सभा को सौंप दिया जाय. इस मांग के पक्ष में कई जनसभाएं आयोजित की गई. देश में बढ़ रही राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आन्दोलन के कारण पहले से ही चिन्तित अंग्रेज़ी हुकूमत अब सिक्ख समाज सुधारवादियों को नाराज नहीं करना थी खास तौर पर इस धार्मिक रूप से सम्वेदनशील मसले पर. अंततः अंग्रेज़ी हुकूमत ने झुकना स्वीकार किया और सरकारी एजेंटों को गुरुद्वारे से हटा लिया और स्वर्ण मंदिर का प्रबंधन अकालियों के हाथों में सौंप दिया. दोस्तों नवंबर 1920 में करीब दस हजार सुधारवादियों की एक सभा हुई और चुनाव के माध्यम से 175 सदस्यों की एक कमेटी बनाई गयी. इस कमेटी को नाम दिया गया शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी यानी SGPC. अब सभी गुरुद्वारों का नियंत्रण और प्रबंधन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के हाथों में आ गया. दोस्तों इस पूरे आन्दोलन को और संगठित रूप देने के लिए दिसंबर 1920 में शिरोमणि अकाली दल का गठन किया गया जिसका मुख्य कार्य था अकाली jatthon को और संगठित करके पूरे आन्दोलन को और सिस्टमैटिक बनाना. Jatthon के सदस्य मूलतः जाट किसान परिवारों से आते थे और आन्दोलन का नेतृत्व राष्ट्रवादियों और सुधारवादियों के हाथों में था.  अकाली दल और SGPC ने पूरी तरह अहिंसा को अपना हथियार बनाया. दोस्तों अहिंसा के शांतिपूर्ण रास्ते पर चल रहे अकाली आन्दोलन में एक खूनी अध्याय तब जुड़ गया जब फरवरी 1921 में महान गुरु श्री गुरु नानक जी के जन्म स्थली ननकाना साहिब गुरुद्वारे के महंत नारायन दास ने शांतिपूर्ण तरीके से गुरुद्वारे का नियंत्रण अकालियों को सौंपने से इन्कार कर दिया. महंत नारायन दास ने बंदूक, तलवार और अन्य खतरनाक हथियारों से लैस करीब पांच सौ लोंगों को इकट्ठा कर लिया. 20 फरवरी 1921 को अकालियों का एक जत्था गुरुद्वारे में प्रार्थना के उद्देश्य से प्रवेश किया. पहले से ही घात लगाए महंत के हथियारबंद लोंगों ने जत्थे पर हमला बोल दिया और इस हमले में सौ से अधिक लोग शहीद हो गए. इतनी बड़ी शहादत के बाद भी भारी संख्या में लोग सरदार करतार सिंह Jhabbar के नेतृत्व में आगे बढ़े और गुरुद्वारे को पूरी तरह अपनी नियंत्रण में ले लिया. महंत नारायन दास को गिरफ्तार कर लिया गया. अंग्रेज़ी हुकूमत अभी भी दुविधा में थी. एक तरफ तो वह गुरुद्वारों पर से नियंत्रण खोना नहीं चाहती थी दुसरी तरफ सिक्ख समुदाय को नाराज भी नहीं करना चाहती थी. दोस्तों ननकाना साहिब की शहादत ने न सिर्फ सिक्खों में बल्कि पूरे देश में राष्ट्रीय चेतना का संचार कर दिया. सिक्खों के प्रति एकता दर्शाने के लिए महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, मौलाना शौकत अली समेत तमाम राष्ट्रीय नेताओं ने ननकाना का दौरा किया. दोस्तों अकाली आन्दोलन और स्वतंत्रता आंदोलन को एक साथ आते देख अंग्रेज़ी हुकूमत ने नयी रणनीति अख्तियार की. एक तरफ अकाली नरमपंथियों को भरोसा दिया कि गुरुद्वारा सुधार के लिए नए कानून बनाए जाएंगे दुसरी तरफ कानून और व्यवस्था के नाम पर कट्टरपंथी अकालियों का दमन करना शुरू किया. दोस्तों स्वतंत्रता सेनानियों के दमदार समर्थन से अकालियों का हौसला इस कदर बढ़ा कि अब उन्होंने ठान लिया कि गुरुद्वारों से अंग्रेज़ी सरकार का हस्तक्षेप पूरी तरह से समाप्त हो जाना चाहिए. अब अकाली आन्दोलन देश के स्वतंत्रता आन्दोलन का हिस्सा बन चुका था. SGPC के अंदर भी कई असहयोग आंदोलनकारी आ चुके थे. दोस्तों मई 1921 में SGPC ने असहयोग आंदोलन के पक्ष में एक प्रस्ताव पारित करके विदेशी वस्तुओं के वहिष्कार के साथ-साथ अंग्रेज़ी अदालतों के स्थान पर पंचायतों को वापस लाने का आह्वान किया. दोस्तों October 1921 में गुरुद्वारा सुधारवादियों ने एक बड़ी जीत दर्ज की. हुआ य़ह कि अंग्रेज़ी सरकार ने तोषखाने की चाबियों पर अधिकार ज़माने की कोशिश की जिसका अकालियों ने बड़े पैमाने पर विरोध किया. विरोध सभा का आयोजन हुआ और तमाम जत्थे अमृतसर पहुंच गए. जिस दिन प्रिंस ऑफ वेल्स  को आना था उस दिन SGPC ने आम हड़ताल का आह्वान किया. प्रतिक्रिया में अंग्रेज़ी सरकार ने कट्टरपंथी नेताओं को बड़े पैमाने पर गिरफ्तार करना शुरू कर दिया जिसमें बाबा खड़क सिंह और मास्टर तारा सिंह प्रमुख थे. कम होने के बजाय अकाली आन्दोलन ने विस्तृत रूप लेना शुरू किया और शीघ्र ही दूर दराज के क्षेत्रों को भी अपने प्रभाव में ले लिया.
 चूंकि इस समय असहयोग आन्दोलन भी अपने चरम पर था, अंग्रेजों ने धर्म जैसे सम्वेदनशील मामले पर सिक्खों से न टकराने में ही भलाई समझी तोष खाना की चाबियों को SGPC के प्रमुख बाबा खड़क सिंह के हवाले कर दिया और साथ ही तमाम गिरफ्तार लोंगों को रिहा कर दिया. इतिहास में इस घटना को Keys Affairs  के नाम से जाना जाता है. महात्मा गांधी ने इस भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन की पहली जीत बताया. दोस्तों Keys Affairs यानी चाबियों वाले मामले पर बुरी हार से तिलमिलाए अंग्रेज़ी सर्कार  के हुक्मरानों को बदला लेने का मौका मिला गुरुद्वारा गुरु के बाग मामले पर. चूंकि अब असहयोग आन्दोलन खत्म हो चुका था तो अंग्रेजों को लगा कि अकालियों को सबक सिखाने का सही मौका है. दोस्तों अमृतसर से करीब बीस किलोमीटर दूर स्थित एक गाँव Ghokewala में गुरुद्वारा गुरु का बाग स्थित है. अगस्त 1921 में ही इसके महंत ने गुरुद्वारे को SGPC को सौंप दिया था लेकिन गुरुद्वारे की जमीनों पर वह अपना अधिकार जमा रहा था यानी उसे अपनी निजी सम्पत्ति समझ रहा था. एक गुरुद्वारे में प्रसाद तैयार करने के लिए बतौर ईंधन एक सूखे कीकर के पेड़ को काटा जा रहा था तभी महंत ने चोरी की रिपोर्ट दर्ज करा दी और अंग्रेजी हुक्मरानों को मौका मिल गया. 9 अगस्त 1922 को पांच अकालियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उनपर मुकदमा कायम कर दिया गया. सरकार के इस एक तरफ़ा कदम का चारों ओर विरोध होने लगा. तमाम अकाली जत्थे गुरुद्वारे पहुचने लगे और पेड़ों को काट कर अपना विरोध जताने लगे. अंग्रेजी हुकूमत ने सभी पर चोरी और दंगों का आरोप लगाकर बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां करनी शुरू कर दी. 28 अगस्त 1922 तक चार हजार से ज्यादा अकाली गिरफ्तार हो चुके थे. 
भारी विरोध को देखते हुए अंग्रेज़ी हुकूमत ने दमन का रास्ता अख्तियार कर लिया और अब गिरफ्तारी को छोड़कर अकाली वॉलंटियर की लाठियों से पिटाई की जाने लगी. Volunteers तब तक लाठी खाते रहे जब तक जमीन पर गिर नहीं गए. CF Andrews ने पुलिस ज्यादतियों को अमानवीय और बर्बर करार दिया और इसे अंग्रेज़ी हुकूमत की नैतिक हार बताया. पूरे देश में लोग रोष में थे. देश के तमाम हिस्सों से बड़े बड़े नेताओं का गुरुद्वारा गुरु का बाग में जमावड़ा लगने लगा और पूरे देश में विरोध सभाएं आयोजित की गयीं. कॉंग्रेस ने पुलिस कार्यवाही की जांच के लिए एक कमेटी बनाई. अंग्रेज़ी सरकार अंततः झुकने को मजबूर हुई. एक रिटायर्ड अँग्रेज अधिकारी ने उस जमीन को पट्टे पर लेकर अकालियों को पेड़ काटने की इजाजत दे दी साथ ही सारे Volunteers  को भी रिहा कर दिया गया. दोस्तों इस तरह पंजाब गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन का सफर पूरा हुआ. भ्रष्ट और नैतिक रूप से पतित महंतो के चंगुल से सिक्खों की आस्था के पीठ गुरुद्वारों को आजाद करा कर उसका कार्यभार पंजाब की जनता द्वारा चुनी हुई शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के हाथों में आ गया. 1925 में कानून द्वारा इस पर अंतिम मुहर लगा दी गई. गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन ने पंजाब की जनता में जागरुकता पैदा करने में महत्तवपूर्ण योगदान दिया. आन्दोलन ने शिक्षित मध्यम वर्गीय लोंगों को एक होने का अवसर प्रदान किया. हिन्दू मुस्लिम सिक्ख सभी एकसाथ आए और अकाली आन्दोलन का हिस्सा बने य़ह भी इस आन्दोलन की बड़ी उपलब्धि है. पंजाब का गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन आधुनिक भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली हिस्सा है. 

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