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एक राष्ट्र एक चुनाव-राष्ट्रपति शासन प्रणाली की ओर बढ़ते कदम

 यदि लोकसभा और देश के विभिन्न विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ कराएँ जाएं तो क्या य़ह सम्भव होगा. इसमें क्या दिक्कतें आयेंगी? फायदे क्या होंगे. दोनों के अलग अलग चुनाव कराने से जैसा कि अभी हो रहा है क्या नुकसान होगा. अगर राज्य विधानसभाओं के चुनाव में प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री और संसद सदस्य चुनाव प्रचार न करें तो क्या फायदा होगा. 
एक बड़ा सवाल यह भी है कि लोकसभा और तमाम विधानसभाओं के साथ साथ चुनाव कराने के पीछे   इरादे  कुछ और ही है. दोस्तों एक सितंबर 2023 को केन्द्र सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद के नेतृत्व में एक छह सदस्यों का पैनल गठित किया है य़ह परीक्षण करने के लिए कि क्या लोकसभा, राज्य विधानसभाओं एवं स्थानीय निकायों के चुनाव साथ साथ कराएँ जा सकते हैं और यदि य़ह सम्भव हो तो इस सम्बन्ध में क्या जरूरी कदम हो सकते हैं. एक राष्ट्र-एक चुनाव या One Nation one election पर सुझाव देने के उद्देश्य से पैनल को जिम्मेदारी दी गई है कि वह परीक्षण करे कि क्या ज़रूरी संवैधानिक संशोधनों या दूसरे कानूनी कदम उठाने की आवश्यकता होगी . पैनल को य़ह भी देखना होगा कि क्या प्रस्तावित संशोधनों के लिए देश के आधे विधानसभाओं की सहमति की आवश्यकता होगी जैसा कि संविधान की धारा 368 में उल्लेख है. पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद के अलावा गृह मंत्री अमित शाह, गुलाम नबी आजाद, NK singh,सुभाष कश्यप, हरीश साल्वे, संजय कोठारी. Congress के अधीर रंजन चौधरी भी इस हाई level कमेटी के सदस्य बनाए गए थे पर उन्होंने असहमति जताते हुए इस्तीफा दे दिया.
 2029 के चुनाव तक एक राष्ट्र एक चुनाव को कैसे लागू किया जाय इसका सम्पूर्ण खाका तैयार करने के लिए  पैनल ने भारतीय विधि आयोग यानी Law Commission of India के साथ 25 october को मन्त्रणा की है और व्यापक विचार-विमर्श के लिए छह राष्ट्रीय पार्टियों और 33 राज्य स्तरीय पार्टियों को पत्र लिखकर उनके सुझाव आमंत्रित किया है. अब पैनल का नाम बदलकर हाई लेवल कमेटी कर दिया गया है. 
   दोस्तों आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और पहले चार चुनाव 1952,1957,1962 और 1967 के लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ हुए थे. उस समय कॉंग्रेस पार्टी सत्ता में थी केन्द्र में और अधिकांश राज्यों में. 1969 में कॉंग्रेस पार्टी का विभाजन हो गया और राजनैतिक कारणों से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा का कार्यकाल एक साल के लिए आगे बढ़ा दिया जिसके परिणामस्वरूप लोकसभा और और राज्य विधानसभाओं के चुनाव अलग अलग हो गए. देखा जाय तो आज भी लोकसभा और चार राज्यों आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के चुनाव साथ साथ होते हैं. 2014 में सत्ता में आने के बाद बीजेपी ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ कराने का मुद्दा जोर शोर से उठाया. इसके बाद 2017 में नीति आयोग ने भी इस मुद्दे को पूरी मज़बूती के साथ समर्थन दिया. अगले साल राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद ने संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ कराने की आवश्यकता पर बल दिया. उन्होंने सभी राजनैतिक दलों से इस प्रस्ताव पर व्यापक चर्चा करने का आह्वान किया.
 दोस्तों 30 अगस्त 2018 को Law Commission ने इस प्रस्ताव के तमाम संवैधानिक और कानूनी पक्षों पर गौर करने के बाद एक रिपोर्ट प्रस्तुत किया. 15 अगस्त 2019 को स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने भी लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ कराने के प्रस्ताव को दोहराया. अभी हाल ही में भारतीय विधि आयोग ने एक रिपोर्ट प्रकाशित करके एक मतदाता सूची तैयार करने की सम्भावनाओं पर जोर दिया. दोस्तों  क्या फायदे होंगे यदि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ कराएँ जाएं. आइए देखते हैं.  पहला तर्क य़ह दिया जा रहा है कि लोकसभा और तमाम राज्य विधानसभाओं के चुनाव अलग अलग कराने पर बहुत बड़ा खर्च आता है तो एक साथ चुनाव कराने पर बहुत सारे अनावश्यक खर्चों से बचा जा सकता है और पैसा देश और राज्य के विकास कार्यों में लगाया जा सकता है. दूसरा तर्क यह है कि साथ साथ  चुनाव कराने पर पूरे देश के लिए एक ही मतदाता सूची  की आवश्यकता होगी इसके साथ ही सुरक्षा बलों और सरकारी कर्मचारियों की सेवाएं एक ही बार लेनी पड़ेंगी. अलग अलग चुनाव कराने से सुरक्षा बलों को एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाना पड़ता है जिससे अतिरिक्त खर्चों के अलावा तमाम असुविधाओं का सामना करना पड़ता है. लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ कराने से तमाम अनावश्यक खर्चों से बचा जा सकता है और मानव संसाधन का जनहित में बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है. 
तीसरा पक्ष य़ह है कि हर दो चार महीने पर किसी न किसी राज्य का चुनाव होता ही रहता है ऐसे में सुरक्षा बलों की काफी लंबे समय तक तैनाती चुनाव में होती रहती है जिससे कानून और व्यवस्था की  समस्या तो आती है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिन्ता का विषय है. भारी संख्या में सरकारी कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी पर तैनात करने के लिए इधर से उधर भेजा जाता है. कभी तो सरकारें अपने अनुकूल अधिकारियों को मनमाफिक जगह तैनात करती हैं तो कभी चुनाव आयोग के निर्देश पर सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों को या तो कोई नयी जिम्मेदारी दी जाती है या तो उन्हें जिम्मेदारी से हटाया जाता है जिससे समान्य प्रशासन बुरी तरह प्रभावित होता है. बड़ी रैंक के अधिकारियों को तो कभी कभी दूसरे राज्यों से बुलाया जाता है पर्यवेक्षक के तौर पर. चुनाव के दौरान एक राजनैतिक अस्थिरता का    वातावरण  होता है और अधिकारी लगातार चुनाव प्रक्रिया में ही लगे रहते हैं. अलग अलग चुनाव के कारण लंबे समय तक माडल अचार संहिता लागू रहती है जिससे बहुत से विकास कार्य रोक दिए जाते हैं या प्रभावित होते हैं. 
अचार संहिता के दौरान नयी परियोजनाओं की घोषणा नहीं की जा सकती और कई बार तो पहले से चल रही परियोजनाओं पर भी विराम लग जाता है. इसके अलावा चुनावी फायदे के लिए राजनैतिक दल लोक लुभावने योजनाओं की घोषणा में लग जाते हैं जिससे व्यापक एवं दीर्घकालीन योजनाओं की उपेक्षा होती है  .  इससे राज्यों के राजकोष पर प्रतिकूल दबाव पड़ता है. पाँचवाँ,  एक राष्ट्र एक चुनाव की व्यवस्था राजनैतिक दलों द्वारा चुनावी फायदे के लिए बढ़ते अलगाववादी राजनीति जैसे क्षेत्रवाद  जातिवाद, सम्प्रदायवाद, पर प्रभावी अंकुश लगाएगा. एक ही चुनाव की प्रक्रिया के कारण राष्ट्रीय महत्व के मामलों को चुनावी मुद्दा बनाने में मदद मिलेगी. अन्त में य़ह भी कहा जा सकता है कि बहुत सारे चुनाव जनता के लिए उबाऊ हो जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप मतदान प्रतिशत या तो स्थिर रहता है या पिछले चुनाव से कम हो जाता है.  दोस्तों  अब आते हैं दूसरे पक्ष पर की क्यों लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ नहीं होने चाहिए. पहली बात केन्द्र सरकार की इस पहल को देश की संघीय ढांचे के विरुद्ध बताया जा रहा है. कहा जा रहा है कि सरकार ने पैनल गठित करने से पहले राज्य सरकारों खास तौर पर गैर भाजपा मुख्यमंत्रियों से कोई विस्तृत सलाह मशविरा नहीं किया. दूसरा परन्तु महत्तवपूर्ण पक्ष य़ह है कि लोकसभा और तमाम राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ कराने पर सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दे ही छाए रहेंगे और इसमे स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दे कहीं खो जाएंगे. इसके अलावा आशंकाएं य़ह भी हैं  कि पूरा देश मात्र एक चुनाव क्षेत्र में तब्दील हो जाएगा और उसका लाभ सिर्फ राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों को ही मिलेगा जिनके मुद्दे होंगे राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय सुरक्षा, या राष्ट्रीय एकता. वहीँ क्षेत्रीय दल किनारे कर दिए जाएंगे इस आधार पर की उनका सारा ध्यान संकीर्ण और छोटे मोटे मुद्दों पर केंद्रित है. इसका एक अँधेरा पक्ष य़ह भी है कि साथ साथ चुनाव कराने से कहीं न कहीं क्षेत्रीय असंतोष को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि स्थानीय मुद्दों और क्षेत्रीय नेतृत्व को वह तव्वजो नहीं मिलेगी. 
तीसरा पक्ष य़ह है कि जहाँ तक अनावश्यक खर्चों से बचने की बात है तो य़ह समझना चाहिए कि साथ साथ चुनाव कराने के लिए भारी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग machines EVMs और VVPAT machines को0 खरीदना पड़ेगा. इसके अलावा द्विवार्षिक चुनाव विधान पारिषद/राज्यसभा के साथ साथ उपचुनाव तो कराने ही पड़ेंगे और उसके खर्च भी आयेंगे. चौथा परन्तु बहुत ही महत्त्वपूर्ण.
 भारत में राजनैतिक चेतना अभी भी बहुत कम है. लोग अपने वोट या मताधिकार का महत्व और भी बेहतर समझ सकें इसलिए बार बार चुनाव होने का अपना शैक्षणिक मूल्य है यानी Educative value है. चुनाव असल में मतदाताओं को और अधिक जागरूक होने का अवसर प्रदान करते है. मतदाता जितना ज्यादा अपने वोट का महत्व समझेगा उतना ही ज्यादा देश का लोकतन्त्र मजबूत होगा. धन बचाने के और भी दूसरे कारगर तरीके निकाले जा सकते हैं पर लोकतन्त्र का मजबूत होना ज्यादा जरूरी है. हमारा लोकतन्त्र मजबूत होगा तो राष्ट्र मजबूत होगा. इसके साथ ही यदि देश में कहीं भी चुनाव होने वाले हैं तो इसका डर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों पर अंकुश का कार्य करेगा और सरकारों के मनमाने तरीकों पर नियंत्रण लगेगा. सरकारों को जवाबदेही के लिए तैयार रहना पड़ेगा. रही बात कड़े फैसले लेने की तो यदि सरकार के फैसले कड़े होने के बाद भी जनता के व्यापक और दीर्घकालीन हित में हैं और सरकार इस सम्बन्ध में उचित संवाद कर पा रही है तो जनता वोट देगी इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए. अलग अलग चुनाव कराने के कुछ और फायदे हैं जैसे स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दे अलग होंगे और राष्ट्रीय मुद्दे अलग होंगे जिससे मतदाताओं को निर्णय लेने में सुविधा होगी. साथ साथ चुनाव कराने से बेहतर होगा कि चुनाव में प्रयुक्त धनबल और बाहुबल पर प्रभावी नियंत्रण के प्रयास किए जाएं. चुनाव अभियान की लंबी समय सीमा कम की जाय. इन सबके अलावा और भी गंभीर आशंकाएँ हैं जैसे कि यदि एक बार चुनाव हो गया और सरकारें बन गयीं. अगला वोट डालने का मौका पाँच साल बाद ही आएगा, इस दौरान सरकार की जनता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं होगी. यदि सरकारें मनमाना करने लगें तो उनपर जनता का कोई अंकुश नहीं रहेगा. जब पाँच साल बाद चुनाव आयेगा तब हो सकता है कुछ ऐसे भावनात्मक मुद्दे उछाल दिए जाएं और जनता का वोट बटोर लिया जाय. जनता भावुक होती है और उसकी भावनाओं को भड़काना आसान होता है. इस तरह पाँच साल कुछ न कर पाने के बाद भी भावनाओं को भड़का कर वोट हासिल करके सत्ता पर अगले पाँच साल के लिए काबिज़ आ जा सकता है. एक पक्ष और भी है कि जहां तक बात है आचार संहिता लागू होने के बाद नयी  नीतियों की घोषणा नहीं हो सकती या बहुत से विकास कार्य रुक जाते हैं. ऐसे में य़ह हो सकता है कि जिस राज्य में चुनाव हो आचार संहिता भी वहीँ लगाई जाय. ऐसे कानून बनाए जाएं कि यदि किसी राज्य विधानसभा का चुनाव हो तो वहाँ केन्द्रीय नेताओं जैसे प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, सांसदों द्वारा चुनाव प्रचार पर किए जाने पर प्रतिबंध हो. राज्य विधानसभाओं के चुनाव में सिर्फ राज्य स्तर के नेता ही चुनाव प्रचार करें. इससे य़ह होगा कि राज्य विधानसभाओं के चुनाव में देश के केंद्रीय प्रशासन और सरकारी कामकाज पर कोई असर नहीं पड़ेगा न ही बड़े नेताओं द्वारा राज्य स्तर के चुनाव को प्रभावित करने का भय होगा. इसका सबसे बड़ा लाभ य़ह होगा कि राज्य स्तर के नेताओं को उभरने का मौका मिलेगा. जब राज्य विधानसभा के चुनाव में सिर्फ राज्य स्तर के नेताओं को चुनाव प्रचार और चुनाव जीतने की जिम्मेदारी दी जायेगी तो राज्य की राजनीति में नए चेहरों के सामने आने की सम्भावनायें बढ़ेंगी और बहुत से नए लोंगों को राजनीति में ऊपर उठने का अवसर मिलेगा. राज्यों को भी काबिल और बेहतर नेतृत्व मिलता रहेगा जिससे लोकतन्त्र और भी मजबूत होगा, उसकी जड़े और भी गहरी होंगी. 
दोस्तों आइए अब बात करते हैं कि क्या संवैधानिक और कानूनी अड़चनें आयेंगी लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ कराने में. अगर सैध्दांतिक रूप से य़ह स्वीकार कर भी लिया जाय कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ होने चाहिए पर इसको क्रियान्वित करने के लिए एक लंबे और पेचीदे कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा. पहली बात संविधान की कम से कम पांच धाराओं को संशोधित करना पड़ेगा. संविधान की धारा 83(2) और 85(2) जिनका सम्बन्ध है लोकसभा के कार्यकाल और उसके भंग होने यानी Dissolution से. उसी तर्ज़ पर संविधान की धारा 171(1) और 172(2) राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल और उनके भंग होने  या Dissolution को लेकर हैं. संविधान की धारा 85(1) के अन्तर्गत राष्ट्रपति कुछ विशेष परिस्थितियों में लोकसभा का समान्य कार्यकाल समाप्त होने से पहले इसे भंग कर सकते हैं, उसी तरह संविधान की धारा 174(2) के अन्तर्गत राज्यपाल कुछ विशेष परिस्थितियों में कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही राज्य विधानसभाओं को भंग कर सकते हैं या dissolve कर सकते हैं. संविधान की धारा 83(2) के अन्तर्गत लोकसभा का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ाया जा सकता है यदि देश में धारा 352 के अन्तर्गत राष्ट्रीय आपातकाल घोषित है. धारा 172(1) के अन्तर्गत राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल भी एक बार में एक साल के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है .साथ साथ चुनाव कराने के लिए इन संवैधानिक प्रावधानों को रद्द करना पड़ेगा. संविधान के 52वें  संशोधन के माध्यम से 1985 में दल बदल निरोधक कानून Anti-Defection Law बनाया गया जो संविधान की  दसवीं
अनुसूची में शामिल है. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में SR Bommai केस और 2006 में रामेश्वर प्रसाद केस में इस बात को स्पष्ट किया कि विधानसभा भंग करके राष्ट्रपति शासन लगाने का फैसला न्यायिक पुनसमीक्षा Judicial रिव्यू के अधीन है. मतलब साफ़ है यदि किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का आधार संवैधानिक रूप से वैध या valid नहीं पाया जाता तो कोर्ट पुरानी विधानसभा को पुनर्जीवित कर सकती है और पुरानी सरकार को बहाल कर सकती है. अभी हाल ही में नागालैंड, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश के मामलों में हुआ है. इसके अलावा इन सारे  संसाधनों को संविधान की धारा 368 के अंतर्गत करने के लिए संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में अलग अलग विशेष बहुमत यानी दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी और कम से कम देश की आधी राज्य विधानसभाओं के अनुमोदन की जरूरत पड़ेगी. समस्या य़ह है कि आज की तारीख में किसी भी पार्टी को राज्यसभा में साधारण बहुमत तक हासिल नहीं है और तमाम राज्यों में अलग अलग पार्टियों की सरकारें हैं और उनमें से ज्यादातर इस तरह के संविधान संसाधनों के खिलाफ हैं. इससे ज्यादा पेचीदा मामला तो है स्थानीय निकायों के चुनाव आम चुनावों के साथ कराना है क्योंकि स्थानीय निकाय राज्य सूची के विषय हैं. ऊपर से सभी राज्यों ने अलग अलग पंचायती राज ऐक्ट और नगर पालिका ऐक्ट पास किए हैं जिनमे इनका कार्यकाल संविधान की धारा 243(E) और 243(U) के अन्तर्गत पांच साल निर्धारित किया गया है. चूंकि सभी 28 राज्यों के पास अपने कानून हैं तो कम से कम 56 तरह के कानूनी प्रावधानों को परिवर्तित करना पड़ेगा.      अब बड़ा प्रश्न य़ह है कि कैसे लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ कराए जा सकते हैं. बहुत सारे संविधान संशोधनों की आवश्यकता पड़ेगी. य़ह मामला सीधे सीधे केन्द्र-राज्य संबंधों का है इसलिए न्यायिक पुनसमीक्षा Judicial रिव्यू एक बहुत बड़ी बाधा के रूप में सामने हैं. व्यावहारिक तौर पर ऐसा किया जा सकता है कि बहुत सारे विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराएँ जाएं और परिणाम पर गौर किया जाय पर इसके लिए राज्यों से व्यापक सलाह मशविरे की जरूरत होगी. अन्त में दोस्तों कहीं किसी कोने में एक आशंका य़ह भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं एक राष्ट्र एक चुनाव महज एक शुरुआत है मंज़िल है राष्ट्रपति शासन प्रणाली. क्योंकि जब राष्ट्रीय मुद्दों पर ही चुनाव होंगे वह भी एक साथ तो सारा चुनाव एक आदमी की पर्सनैलिटी यानी कि प्रधानमंत्री पर ही केंद्रित होकर रह जायेगा. कालान्तर में एक व्यक्ति की लोकप्रियता अंततः उसको एक तानाशाह के रूप स्थापित कर सकती है जैसे रूस के राष्ट्रपति पुतिन. यदि ऐसा हुआ तो न ही लोकतन्त्र रहेगा न ही चुनाव का कोई मतलब होगा.

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