क्यों अंग्रेजों के जमाने के बनाए गए आपराधिक संहिता यानी क़ानूनों को संशोधित करने की जरूरत पडी . किन विषयों में परिवर्तन का लक्ष्य रखा गया है. सबसे मुख्य बात यह है कि किस तरह UAPA की आतंकवादी कार्यवाई की परिभाषा भारतीय न्याय संहिता 2023 की परिभाषा से अलग है. केन्द्रीय गृहमंत्री ने
लोकसभा में तीन संशोधित बिलों को प्रस्तुत किया जो कि ब्रिटिश ज़माने के आपराधिक कानूनों यानी क्रिमिनल laws का स्थान लेंगे.दोनों सदनों से पारित होने के बाद इन बिलों को राष्ट्रपति की सहमति भी मिल गयी है इसी के साथ इन बिलों को अब कानून की हैसियत प्राप्त हो चुकी है. इसके पहले वाले version को जो अगस्त में प्रस्तुत हुआ था उसको वापस लेने के बाद य़ह संशोधित version प्रस्तुत किया गया है. अगस्त में प्रस्तुत बिल को 31 सदस्यों वाली संसद की स्टैंडिंग कमेटी को सौंपा गया था. तमाम विशेषज्ञों और दूसरे Stakeholders से सलाह मशविरे के बाद अंत में सात नवम्बर को इसे अंतिम रूप दिया गया. इंडियन पेनल कोड यानी IPC का स्थान लेगा भारतीय न्याय संहिता 2023. कोड ऑफ क्रिमिनल Procedures यानी CrPC का स्थान लेगा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023. इंडियन Evidence Act का स्थान लेगा भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023. तमाम सुधारों और सांसदों द्वारा प्रस्तावित पचास से ज्यादा सुझावों के मद्देनजर संसद की स्थायी समिति ने इन बिलों की Punrsamiksha की. सरकार ने स्पष्ट किया कि तमाम सुधारों और सुझावों पर गौर करने के बाद ही बिलों को प्रस्तुत किया जा रहा है. दोस्तों नए कानून भारतीय न्याय संहिता 2023 के सेक्शन 113 में आतंकवाद की वर्तमान परिभाषा को संशोधित करके UAPA यानी Unlawfull Activity Prevention Act 1967 की सेक्शन 15 की परिभाषा को ही अपनाया गया है. UAPA के अंतर्गत आतंकवादी कार्यवाई की परिभाषा कुछ इस तरह है. ऐसी कोई कार्यवाई जिसका इरादा भारत की एकता अखण्डता आर्थिक सुरक्षा या सम्प्रभुता को खतरा पहुँचाना या भारत के लोंगों या लोंगों के एक वर्ग में भय पैदा करना या भय पैदा करने की संभावना हो. ऐसी कोई भी कार्यवाई आतंकवाद की परिभाषा में आएगा. इसके पहले वाले संस्करण में आतंकवादी कार्यवाई की परिभाषा में तमाम तरह की कार्रवाईयों को शामिल कर लिया गया था जैसे आम जनता या जनता के एक वर्ग को धमकाना या डराने की कोशिश करना, कानून व्यवस्था को भंग करना, भय का वातावरण पैदा करना, या भय फैलाना, देश के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक ढांचे को अस्थिर करना या तबाह करना, आम लोगों की सुरक्षा को खतरा पहुँचाना इत्यादि. यहाँ तक कि अहिंसक भाषण को भी आतंकवादी कार्यवाई की श्रेणी में रखा जा सकता था. UAPA की आतंकवाद की परिभाषा और इस नए कानून की परिभाषा में उच्च मूल्यों वाले नकली भारतीय करेंसी नोटों, सिक्कों या कोई अन्य वस्तु के उत्पादन, सर्कुलेशन, स्मगलिंग को भी रखा गया था जबकि संशोधित बिल में इस परिभाषा को और व्यापक बनाते हुए किसी भी भारतीय करेंसी नोट, सिक्कों या अन्य वस्तु को शामिल किया गया है. मतलब यह कि पहले सिर्फ उच्च मूल्य के ही नोटों या सिक्कों की बात की गयी थी जबकि संशोधित कानून में इस शर्त को हटा लिया गया है और अब इसमें सभी प्रकार के नोटों और सिक्कों को शामिल कर लिया गया है. दोस्तों अब यदि कोई सम्पत्ति आतंकवाद या आतंकवादी कार्रवाईयों के माध्यम से खुद की जानकारी में अर्जित की गई हो तो य़ह एक दण्डनीय अपराध होगा. कोई यदि जानबूझकर या पूरी जानकारी में किसी आतंकवादी को शरण देता है तो य़ह एक दण्डनीय अपराध होगा. UAPA के सेक्शन 18A और 18B के तर्ज़ पर आतंकवादी कार्यवाई करने के लिए लोंगों की भर्ती और प्रशिक्षण दिए जाने को भी दण्डनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया है. खास बात यह है कि कम से कम पुलिस अधीक्षक स्तर या उससे उपर के अधिकारी ही य़ह तय कर सकते हैं कि आतंकवादी कार्रवाई के मामले में अभियोजन UAPA के अंतर्गत या सेक्शन 113 के अन्तर्गत चलेगा. अपराध सिद्ध होने पर मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है. जो लोग आतंकी घटना को अंजाम देने के लिए खण्डयंत्र या साजिशें, उकसावा, भड़काना या उसमें सहयोग करते हैं उनके लिये कानून में पांच साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा की व्यवस्था है. दोस्तों इस नए संशोधित कानून में क्रूरता को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास किया गया है जिसके अनुसार किसी महिला के विरुद्ध पति द्वारा या अन्य रिश्तेदारों द्वारा की जाने वाली क्रूरता को परिभाषित किया गया है जिसमें दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की कैद का प्रावधान है. नया जोड़ा गया सेक्शन 86 क्रूरता को परिभाषित करता है जैसे जानबूझकर ऐसा आचरण करना कि कोई महिला आत्महत्या करने के लिए मज़बूर हो जाय या ऐसी गंभीर चोटें पहुँचाना जिससे उसकी जिंदगी, अंगों, स्वास्थ्य चाहे मानसिक स्वास्थ्य हो शारीरिक स्वास्थ्य हो, इन सबको खतरा पहुंचे. इसके अलावा गैर कानूनी मांगों जैसे कोई सम्पत्ति या बहुमूल्य वस्तु को पूरा करने के लिए महिला या उसके किसी संबंधी को प्रताड़ित करना भी क्रूरता के दायरे में आएगा. दोस्तों यद्यपि कि इस संशोधित बिल में क्रूरता को अब परिभाषित किया गया है लेकिन IPC के सेक्शन 498A और ओरिजिनल बिल के सेक्शन 84 में क्रूरता को परिभाषित उन्हीं शब्दों में किया गया है जिन शब्दों का प्रयोग स्पष्टीकरण क्लॉज में हुआ है. दोस्तों,भारतीय न्याय संहिता में नए जोड़े गए सेक्शन 73 के अनुसार यदि कोई बलात्कार या यौन शोषण जैसे गंभीर मामले पर चल रही अदालती कार्यवाही पर कुछ छापता है या कोई मैटर प्रकाशित करता है बिना अदालत की इजाजत के तो उस अवस्था में दोषी पाए जाने पर उसे दो साल तक की कैद और फाइन हो सकती है. इस प्रावधान पर यह भी स्पष्ट किया गया है कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की रिपोर्टिंग इस प्रावधान के अंतर्गत अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा. दोस्तों ओरिजिनल बिल में Regressive Terminology यानी प्रतिगामी शब्दों को हटाने के उद्देश्य से पागलपन, मंदबुद्धि, मेंटल Retardation या Unsoundness of Mind जैसे शब्दों को हटाकर Mental illness या मानसिक बीमारी शब्द को रखा गया था लेकिन पैनल ने सुझाव दिया कि Mental illness एक व्यापक अर्थ वाला शब्द है जिसमें Mood swing और स्वेच्छापूर्वक नशेबाजी शामिल है. इस संशोधित कानून के तमाम प्रावधानों में परिवर्तन करके Mental illness को हटाकर Unsoundness of Mind या मानसिक अस्वस्थता रख दिया गया है. इस संशोधित कानून के सेक्शन 367 में Unsoundness of Mind के साथ साथ बौद्धजैविक अपंगता या Intellectual Disability को जोड़ा गया है.दोस्तों ओरिजिनल बिल में Mob Lynching और Hate crime को पहली बार हत्या के एक अलग श्रेणी में रखा गया था. इस अपराध के अंतर्गत वे मामले आयेंगे जहाँ हत्या की गयी हो और इस जघन्य अपराध को पांच या पांच से ज्यादा लोंगों ने मिलकर अंजाम दिया हो या नस्ल, जाति, सम्प्रदाय, सेक्स, जन्मस्थान, आस्था, या किसी अन्य आधार पर हत्या की गयी हो. पैनल ने इसकी कड़ी आलोचना की क्यों कि हत्या जैसे जघन्य अपराध के लिए सिर्फ सात साल का ही प्रावधान किया गया है जबकि हत्या जैसे गंभीर अपराध के लिए कम से कम आजीवन कारावास की सजा की व्यवस्था है. संशोधित कानून में सात साल तक के सजा का प्रावधान हटा दिया गया है और अब Mob Lynching और हत्या के अपराध को समान अपराध के स्तर पर रखा गया है. दोस्तों संशोधित बिल में पैनल की दो बहुत ही महत्त्वपूर्ण सिफारिशों को नहीं रखा गया है . जिसमें पहला है विवाहित स्त्री/पुरुष के बीच अवैध सम्बन्ध को Gender-Neutral आपराधिक कृत्य घोषित करना . दूसरा है एक क्लॉज जो कि स्त्री पुरुष, और transpersons के बीच जबरन या Non-Consensual सेक्स और पाशविकता
को आपराधिक कृत्य की श्रेणी में रखता है. 2018 में सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से Adultery को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था. कोर्ट ने माना था कि य़ह कानून महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण है और उनकी स्वायत्तता का हनन है. पैनल का तर्क था कि विवाह जैसे सामाजिक संस्था की पवित्रता को बनाए रखने के लिए Adultery को Gender neutral रखते हुए अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए . दोस्तों पैनल का य़ह भी सुझाव था कि यदि एक पुरुष का दूसरे पुरुष द्वारा जबरन या Non-Consensual सेक्स किया जाता है तो IPC की धारा 377 के अंतर्गत कार्यवाई की जा सकती है. आईपीसी की धारा 377 के अंतर्गत एक महिला अपने पति के खिलाफ अप्राकृतिक सेक्स का मामला दर्ज करा सकती है. सवाल उठता है कि यदि न्याय संहिता में ये कृत्य अपराध नहीं हैं तो मतलब साफ़ है कि Sodomy और Buggery के पीड़ितों के लिए कोई कानूनी राहत उपलब्ध नहीं होगा. यदि एक पुरुष का बलात्कार एक दूसरे द्वारा होता है तो पीड़ित या transpersons को कोई कानूनी राहत उपलब्ध नहीं होगा. दोस्तों संशोधित बिल में छोटे संगठित अपराधों यानी Petty Organised crimes की और सटीक परिभाषा दी गयी है. यदि कोई भी चाहे वह किसी ग्रुप या गैंग का सदस्य हो या अकेले या कुछ लोंगों के साथ मिलकर चोरी, छिनैती, टिकटों की काला बाजारी, जुआ, सट्टा ,परिक्षाओं के प्रश्न पत्र बेचना, इत्यादि अपराधों में लिप्त पाया जाता है तो उसे छोटे संगठित अपराधों का दोषी करार दिया जायेगा. य़ह प्राविधान य़ह भी कहता है कि चोरी की परिभाषा में में छल, वाहन से चोरी, रहवासी घर, बिजनेस परिसर, कार्गो की चोरी, पॉकेट मारना, इत्यादि भी आते हैं. इसके अलावा card Skimming, उठाईगिरी, Automated Teller Machine की चोरी भी छोटे संगठित अपराधों की श्रेणी में आते हैं. दोस्तों अब आते हैं भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 पर . ओरिजिनल बिल में छोटे अपराधों जैसे आत्महत्या का प्रयास, सरकारी कर्मचारियों का गैर कानूनी व्यवसाय में लिप्त होना, 5000 रुपये से कम मूल्य की सम्पत्ति चुराना, सार्वजनिक रूप से नशा करना, और अपमान करना जैसे अपराधों के लिए सामुदायिक सेवा या Community Services का प्रावधान किया गया था. अब इस संशोधित बिल के सेक्शन 23 में इन अपराधों को फिर से परिभाषित किया गया है. दोषी पाए जाने पर कोर्ट सजा के तौर पर सामुदायिक सेवा का आदेश दे सकती है पर इसके एवज में कोई पारिश्रमिक देय नहीं होगा. प्रथम श्रेणी या द्वितीय श्रेणी के Magistrate को सजा तय करने का अधिकार है ताकि छोटे अपराधों के मामलों में क्षतिपूर्ति के दृष्टिकोण को बढ़ावा मिले. दोस्तों ओरिजिनल बिल के सेक्शन 43(3) में गंभीर अपराधों के आरोपियों को हथकड़ी लगाने की इजाजत थी ताकि अभियुक्त फरार न हो जाय और गिरफ्तारी के दौरान पुलिस के अधिकारियों और स्टाफ़ की सुरक्षा को कोई खतरा न हो. पैनल ने सिफारिश किया कि सिर्फ हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों के मामले में ही अभियुक्त को हथकड़ी लगायी जाय . आर्थिक अपराधों के मामलों में हथकड़ी लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है. एक परिवर्तन किया गया है कि हथकड़ी लगाने के पुलिस के अधिकार को अब और व्यापक बनाते हुए इसे गिरफ्तारी के समय से लेकर अदालत में प्रस्तुत किए जाने के समय तक ले लिए कर दिया गया है. दोस्तों ओरिजिनल बिल में अदालतों की कार्यवाही को ऑडियो विजुअल माध्यम से संचारित करने की इजाजत दी गयी थी. ओरिजिनल बिल में दिए गए कई तरह के अदालती कार्यवाहियों जैसे पूछताछ, सेशन कोर्ट के सामने ट्रायल, Summary मामलों में ट्रायल, Plea Bargaining, और हाई कोर्ट के सामने ट्रायल जैसी तमाम कार्यवाहियों को अब संशोधित बिल से हटा दिया गया है. संशोधित कानून के सेक्शन 251, 262, 266,और 308 में अभियुक्त के सामने आरोपों को पढ़ना, रिहाई पर सुनवाई, गवाहों का परीक्षण, साक्ष्यों की रिकॉर्डिंग, जैसे प्रावधानों पर ऑडियो विजुअल माध्यम की इजाजत दी गयी है. दोस्तों संशोधित बिल में ओरिजिनल बिल के उन प्रावधानों को नजरअंदाज किया गया है जिसमें पुलिस कस्टडी को शुरुआती 15 दिन से ज्यादा किया गया था. सेक्शन 187(3) जो कि CrPC के सेक्शन 167(2)(a) के अनुरूप है जिसमें "Otherwise than in the custody of Police" जैसे वाक्य का प्रयोग नहीं किया गया है जिसका अर्थ य़ह हुआ कि पूरी विवेचना के दौरान चाहे वह 60 दिन का हो या 90 दिन का हो ,जैसा अपराध हो उसके अनुसार थोड़े थोड़े दिनों के लिए ली गई पुलिस कस्टडी का पूरा मिलाकर भी 15 दिन से ज्यादा नहीं हो सकता. चूंकि पुलिस कस्टडी में चरम हिंसा की संभावना आम है खास तौर पर समाज के कमजोर वर्गों के लोगों के साथ इसलिए पैनल ने चिन्ता जाहिर की कि इस क्लॉज का अधिकारियों द्वारा दुरुपयोग किया जा सकता है क्योंकि इसमें बहुत स्पष्ट नहीं किया गया है कि अभियुक्त की कस्टडी प्रथम 15 दिनों में नहीं लिया गया था या तो उसके बर्ताव के कारण या किसी अन्य बाह्य परिस्थितियों के कारण जो Investigating Officer के नियंत्रण के बाहर की हो. कमेटी ने सिफारिश किया कि इस क्लॉज की स्पष्ट व्याख्या के लिए एक उपयुक्त संशोधन किया जाना चाहिए. परिणामस्वरूप संशोधित कानून में अब गिरफ्तारी के 24 घण्टे के अन्दर ही छोटे अपराधों के अभियुक्त को किसी Magistrate के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए और यदि य़ह सम्भव नहीं है तो उसे रिहा कर देना चाहिए.
दोस्तों अब आते हैं भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 पर. दोस्तों ओरिजिनल बिल के सेक्शन 61 में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की स्वीकार्यता की इजाजत थी कि एक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और पेपर रिकॉर्ड का कानूनी प्रभाव समान होगा. सेक्शन 63 के अंतर्गत किसी भी सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं होगी जैसा कि Indian Evidence Act के सेक्शन 65B के अंतर्गत सर्टिफिकेट की जरूरत पड़ती है. अब इस प्रावधान को संशोधित कर दिया गया है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की साक्ष्य स्वीकार्यता सेक्शन 63 के अधीन है. दोस्तों विशेषज्ञों ने चिन्ता जाहिर की है कि तीनों संशोधित बिलों ने
अत्यधिक आपराधिक करण और व्यापक पुलिस अधिकारों को दुरुस्त करने का महत्तवपूर्ण अवसर गंवा दिया. विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 जो 15 दिन से ज्यादा पुलिस कस्टडी की इजाजत देता है वास्तव में नागरिक अधिकारों के लिए बहुत बड़ा खतरा है. इस नए कानून में पुलिस कस्टडी के समय काल का व्यापक विस्तार नागरिक स्वतंत्रता के ऊपर सीधे हमला है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 ने समान्य आपराधिक कानूनों के अंतर्गत पुलिस अभिरक्षा की अधिकतम सम्भावित सीमा 15 से बढ़ाकर 60 दिन या फिर 90 दिन कर दिया है. आज के वर्तमान कानून में पुलिस अभिरक्षा गिरफ्तारी के पहले 15 दिन तक सीमित है लेकिन नए कानून में इसके विस्तार ने पुलिस ज्यादतियों की सम्भावनाओं को और बढ़ा दिया है. गिरफ्तार अभियुक्तों की पुलिस कस्टडी में सुरक्षा और लंबी अवधि की कस्टडी में अत्यधिक बल प्रयोग एवं मनगढंत साक्ष्यों की संभावना वास्तव में चिन्ता का विषय है.
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