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संदेश

Right to life and personal liberty

 संविधान का अनुच्छेद 20 कुछ मामलों में अपराध की दोषसिद्धि यानी Conviction for offences के विरुद्ध सुरक्षा की गारण्टी देता है. इसका अर्थ य़ह है कि किसी को अपराधी सिद्ध करने के लिए कोई भी कदम उठाने के लिए कोई भी स्वतंत्र नहीं है. संविधान अभियुक्त को भी स्वयं के बचाव का पूरा अवसर ही नहीं देता बल्कि कुछ मामलों में तो सुरक्षा की गारंटी भी देता है. अनुच्छेद 20 का क्लॉज वन कहता है कि Ex Post Facto विधि निर्माण नहीं किया जा सकता यानी Retrospective Criminal Legislation या पूर्व प्रभावी आपराधिक कानून नहीं बनाए जा सकते. अनुच्छेद 20 का क्लॉज टू कहता है कि Double Jeopardy नहीं हो सकता यानी एक ही अपराध के लिए दो बार दण्डित नहीं किया जा सकता. क्लॉज थ्री कहता है कि Self incriminating यानी आत्म दोषारोपण यानी स्वयम के विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता है. दोस्तों Ex Post Facto यानी Retrospective यानी पूर्व प्रभावी कानून के विरुद्ध अनुच्छेद 20 के क्लॉज वन में प्रावधान किया गया है जिसके अन्तर्गत य़ह स्पष्ट किया गया है कि किसी व्यक्ति को तब तक अपराधी घोषित नहीं किय...

Freedom of Press

भारत के संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता की गारण्टी का कोई अलग से प्रावधान नहीं है. प्रेस की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19 क्लॉज 1 में प्रदत्त बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में ही शामिल है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ अपने विचारों को व्यक्त करना ही नहीं बल्कि दूसरों के विचारों को भी प्रिन्ट या अन्य माध्यम से व्यक्त करना भी है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी अन्य मौलिक अधिकारों की तरह ही 19(2) के अन्तर्गत तर्कसंगत प्रतिबंधों के अधीन है. समाज के व्यापक हित में राज्य की सुरक्षा, भारत की संप्रभुता एवं अखण्डता, विदेशी राज्यों से मैत्री सम्बंध, अवमानना या किसी अपराध के उकसावे की स्थिति में सरकार कानून बनाकर प्रेस की स्वतंत्रता पर तर्कसंगत प्रतिबंध लगा सकती है. सभी सम्भावित परिस्थितियों में प्रेस को असीमित और निरंकुश स्वतंत्रता प्रदान करना अव्यवस्था और अराजकता को निमंत्रण देने जैसा है. दोस्तों समाचार पत्र वास्तव में अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के माध्यम हैं. विचारों की अभिव्यक्ति की भी अपनी एक सीमा और जिम्मेदारी होनी चाहिए. यदि कोई नागरिक संविधान के अनुच्छेद 19(1) के अन्तर्गत प्र...

अनुच्छेद 19 स्वतंत्रता का अधिकार

 दोस्तों बहुत सारे नकारात्मक अधिकारों के अलावा भारतीय संविधान बहुत सारे सकारात्मक अधिकार भी देश के नागरिकों को प्रदान करता है ताकि संविधान के प्रस्तावना यानी Preamble में दिए गए स्वातंत्र्य के महान आदर्शों को आगे बढ़ाया जा सके. इन्हीं में से संविधान के अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत ऐसे मौलिक अधिकार दिए गए हैं जो भारत के प्रत्येक नागरिक को मूल स्वतंत्रता प्रदान करते हैं. दोस्तों वैसे तो मूल संविधान में कुल सात प्रकार के स्वतंत्रता की गारण्टी संविधान दी गयी थी परन्तु 44 वें संविधान संशोधन 1978 के माध्यम से सम्पत्ति रखने और क्रय-विक्रय के अधिकार को समाप्त कर दिया गया परिणामस्वरुप अब वह सिर्फ एक साधारण वैधिक अधिकार है. दोस्तों सम्पत्ति के अधिकार की समाप्ति के बाद अब छह प्रकार की स्वतंत्रता देश के नागरिकों को उपलब्ध हैं. संविधान का अनुच्छेद 19 क्लॉज 1 कहता है कि भारत के सभी नागरिकों को अधिकार होगा पहला वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यानी Freedom of speech and expressions. दूसरा बिना किसी अस्त्र के शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार यानी Freedom of assembly peaceably wothout arms .तीसर...

अनुच्छेद 18 , Abolition of Titles

 अँग्रेजी शासन के दौरान विदेशी सरकार लोंगों को उपाधियां यानी Titles दिया करती थी भारत के अन्दर अंग्रेजों के प्रति समर्पित एक तबका खड़ा किया जा सके जो अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान हो. देश के राष्ट्रवादी नेता य़ह कहकर इसका विरोध करते थे कि ब्रिटिश सरकार अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को अन्जाम देने के लिए और सार्वजनिक जीवन को भ्रष्ट बनाने के लिए उपाधियां प्रदान कर रही है. दोस्तों जब आजादी मिलने के बाद भारत का संविधान लागू करने की बात आयी तो सरकार द्वारा उपाधियां प्रदान करने की दुरूपयोगी परम्परा को प्रतिबंधित करने की मांग उठी. परिणामस्वरुप संविधान ने स्पष्ट तौर पर राज्य द्वारा किसी भी प्रकार की उपाधियां प्रदान करने पर प्रतिबंध लगा दिया ताकि सत्ता का दुरुपयोग रोका जा सके.दोस्तों, ध्यान देने वाली बात यह है कि य़ह प्रतिबंध सिर्फ राज्य के विरुद्ध है परन्तु दूसरे सार्वजनिक संस्थाएँ जैसे विश्वविद्यालय पर कोई रोक नहीं है वे अपने विशिष्ट प्रतिभा के धनी लोंगों को उपाधियों से सम्मानित कर सकते हैं और इस उपाधियों का प्रयोग उनके नाम के साथ किया जा सकता है. दोस्तों, राज्य द्वारा मिलिटरी और ...

Article 17

 संविधान की धारा 17 के अन्दर अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया है यानी Abolition  of untouchability. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले आप से एक छोटी सी गुजारिश यदि आपने अभी तक मेरे चैनल को subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ इसको subscribe कर लीजिए और बेल icon को प्रेस कर दीजिए. आते हैं पॉइन्ट पर. दोस्तों संविधान का अनुच्छेद 17 कहता है कि Untouchability is abolished, and it's practice in any form is forbidden.The enforcement of any disability arising out of untouchability shall be an offence punishable in accordance with law.यानी अस्पृश्यता को समाप्त किया जाता है और किसी भी रूप मे इसका अभ्यास प्रतिबंधित है. अस्पृश्यता से उत्पन्न किसी भी प्रकार की अपंगता को थोपना विधि के अनुसार दण्डनीय होगा. दोस्तों, भारत के महान संविधान निर्माताओं द्वारा भारतीय समाज को अतार्किक,  परंपरागत अंधविश्वासों एवं अनुष्ठानिक मान्यताओं से मुक्त कराने की दूर दृष्टि को अभिव्यक्ति मिली भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के रूप में. संविधान निर्माताओं को य़ह स्पष्ट था कि देश के लोकतन्त्र और विधि के शासन की व्...

Article 16, Constitution of India

  संविधान के अनुच्छेद 16 का सम्बन्ध है सरकारी पदों पर नियोजन और नियुक्ति से. Article 16 क्लॉज वन स्पष्ट कहता है कि There shall be equality of opportunity for all citizens in the matters relating to employment and appointment for any office under the state.यानी सभी नागरिकों के लिए सरकारी पदों पर नियोजन या नियुक्ति के मामलों में अवसरों की समानता होगी यानी सभी को समान अवसर मिलेंगे. उदाहरण के लिए IAS की परीक्षा में सभी Graduates सम्मिलित हो सकते हैं. अनुच्छेद 16 का क्लॉज टू कहता है कि No citizen shall on the ground only of religion,race,caste,sex, descent and placs of birth or any of them  be ineligible for....... यानी कोई भी नागरिक किसी भी सरकारी पद के लिए सिर्फ धर्म, वर्ण, जाति,लिंग vansh और जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता. दोस्तों अनुच्छेद 16(1) स्पष्ट कहता है कि Matters relating to employment and appointments यानी नियोजन और नियुक्ति के मामलों में. इसमें नियुक्ति से पहले और नियुक्ति के बाद की स्थितियां भी शामिल हैं जो कि पूरे नियोजन ...

Article 15 , Constitution of India

 संविधान के अनुच्छेद  15 के अनुसार धर्म, वर्ण, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर कोई भेदभाव प्रतिबंधित है. क्लॉज वन स्पष्ट कहता है कि राज्य किसी भी नागरिक के विरुद्ध सिर्फ धर्म,वर्ण, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं कर सकता. अनुच्छेद 15 के क्लॉज टू के अनुसार सिर्फ धर्म, वर्ण, जाति, लिंग, और जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक पर किसी भी तरह की अयोग्यता, देनदारी, प्रतिबंध और शर्तें थोपी नहीं जा सकतीं.  किसी भी नागरिक को दुकानों, सार्वजनिक रेस्तरां, होटलों, एवं मनोरंजन के सार्वजनिक स्थानों जैसे सिनेमा घरों में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता. धर्म, वर्ण, जाति, लिंग, और जन्मस्थान के आधार पर किसी भी व्यक्ति को कुओं, टंकियों, स्नान घाटों, सड़कों, लोक समागम के स्थानों पर आने जाने या प्रयोग करने से नहीं रोका जा सकता यदि ये सभी स्थान या तो आम जनता के प्रयोग के लिए समर्पित हैं या इन स्थानों का रख-रखाव पूरा या आधा राज्य द्वारा प्रदत्त धन यानी फंड द्वारा किया जाता है . क्लॉज थ्री के अनुसार य़ह अनुच्छेद किसी भी तरह राज्य को महिलाओं और बच्चों के पक्ष में कोई...

संविधान का अनुच्छेद 14 ,समानता का अधिकार

 संविधान की धारा 14 का जिसके अंतर्गत सभी को समानता का अधिकार प्राप्त है यानी Equality before law and Equal protection of law. य़ह है विधि के समक्ष समानता का अधिकार और विधि का समान संरक्षण. य़ह टॉपिक Prelims और Mains दोनों के लिए Important है. दोस्तों, Political Science की भाषा में देश को राज्य कहते हैं और जिन्हें हम राज्य कहते हैं उन्हें प्रान्त कहा जाता है. इस लेख में जहां भी राज्य शब्द आए तो उसका आशय होगा देश. तो राज्य शब्द का प्रयोग देश के लिए है. संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार The state shall not deny to any person the Equality before the law and the equal protection of law within the territory of India. यानी राज्य भारत के इस भूमि क्षेत्र में किसी को भी विधि के समक्ष समानता और विधि के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा. दोस्तों इसमें दो भाव हैं पहला विधि के समक्ष समानता और दूसरा है विधि का समान संरक्षण. वैसे देखने पर एक जैसे लग सकते हैं पर ये हैं बिलकुल अलग. विधि के समक्ष समानता एक नकारात्मक भाव उत्पन्न करता है जैसे धर्म जाति पंथ के आधार पर किसी भी व्यक्ति के पक्ष म...

Prerogative Writs क्या होती हैं

 Prerogative Writs क्या होती हैं .ये कितने प्रकार की होती हैं और संविधान का Article 32  कैसे लोंगों के Fundamental Rights का रक्षा कवच है. Fundamental Rights का सिर्फ संविधान का हिस्सा होना ही काफी नहीं है. यह तब तक एक खोखली घोषणा से ज्यादा कुछ भी नहीं है जब तक इसे प्रभावकारी तरीके से लागू करने के शक्तिशाली माध्यम न  हों. तमाम देशों का अनुभव इस बात की पुष्टि करता है कि इन अधिकारों के अस्तित्व की वास्तविकता का परीक्षण सिर्फ कोर्ट में ही हो सकता है लेकिन इसके लिए जरूरी है कि न्यायपालिका पूरी तरह निष्पक्ष हो और स्वतन्त्र हो साथ ही उसके पास ऐसे माध्यम मौजूद हों जो उन्हें Fundamental Rights को  प्रभावशाली ढंग से लागू कराने की ताकत देते हों. ब्रिटिश और अमेरिकन लीगल सिस्टम में ये माध्यम Writs के रूप में मौजूद हैं. भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त Fundamental Rights को प्रभावकारी बनाने के लिये विशेष व्यवस्था की गयी है. Fundamental Rights सिर्फ सरकार के विरुद्ध ही नहीं बल्कि विधायिका यानी Legislature के विरूद्ध भी लोंगों को उपलब्ध हैं. संविधान की धारा 13 के अनुसार यद...

गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन या Gurudwara reform movement

 पंजाब का गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन क्या था. कैसे गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतो के चंगुल से आजाद कराया गया. इसमे अकालियों का त्याग और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का गठन.  स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान राष्ट्रवाद और लोकतन्त्र के पक्ष में बह रही देश की हवा ने धीरे-धीरे देश के सामाजिक और धार्मिक मामलों को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया. गाँधी जी के दिखाए अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते समाज के कमजोर वर्गों के लिए एक मजबूत हथियार बनकर सामने आए. धीरे-धीरे ज़न चेतना के संचार एवं विस्तार के परिणामस्वरूप भारत के सामाजिक और धार्मिक सुधार आन्दोलन देश के स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ गए. दरअसल जैसे जैसे देश का राष्ट्रीय आन्दोलन आगे बढ़ रहा था वैसे- वैसे उपनिवेशवाद यानी Colonialism का आधार सिमट रहा था. ब्रिटिश अधिकारियों ने सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से प्रतिक्रियावादी शक्तियों का समर्थन हासिल करने का प्रयास करना शुरू कर दिया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है पंजाब का गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन या अकाली आन्दोलन. एक धार्मिक आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ अकाली आन्दोलन अन्त में भारत के स्वतंत्...

प्रोजेक्ट टाइगर

 भारत में चल रहे प्रोजेक्ट टाइगर ने 1973 में पहली बार देश के सामने टाइगर रिजर्व की अवधारणा को प्रस्तुत किया . कभी फॉरेस्ट अधिकारियों द्वारा  एक प्रशासनिक कदम से शुरुआत करने वाला टाइगर रिजर्व 2006 आते आते एक वैधानिक स्वरुप ले चुका था. आज भारत के बाघ संरक्षण योजना की पूरी दुनियाँ में सराहना हो रही है. बात करेंगे कि भारत में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत कब और कैसे हुई.1972 में देश के वन्यजीवों की सुरक्षा के मद्देनज़र एक नया कानून बनाया गया वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 यानी Wild Life Protection Act 1972 जिसके अंतर्गत Notified फॉरेस्ट एरिया में चिन्हित स्थानों पर नैशनल पार्क बनाए गए. यहाँ पर रह रहे वनवासियों के अधिकारों को समाप्त करके वे सारे अधिकार राज्य सरकारों को सौंप दिए गए. नए कानून के अंतर्गत कई वाइल्डलाइफ Sanctuaries भी बनाए गए जिसमें वनवासियों को कुछ सीमित अधिकारों का इस्तेमाल करने की इजाजत दी गयी. आज देश में बाघों की बढ़ती संख्या इस महान प्रयास का ही परिणाम है. इसी प्रयास का परिणाम है प्रोजेक्ट टाइगर. दोस्तों 1973 में करीब 1915 स्क्वेयर किलोमीटर एरिया में नौ टाइगर...