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Freedom of Press

भारत के संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता की गारण्टी का कोई अलग से प्रावधान नहीं है. प्रेस की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19 क्लॉज 1 में प्रदत्त बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में ही शामिल है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ अपने विचारों को व्यक्त करना ही नहीं बल्कि दूसरों के विचारों को भी प्रिन्ट या अन्य माध्यम से व्यक्त करना भी है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी अन्य मौलिक अधिकारों की तरह ही 19(2) के अन्तर्गत तर्कसंगत प्रतिबंधों के अधीन है. समाज के व्यापक हित में राज्य की सुरक्षा, भारत की संप्रभुता एवं अखण्डता, विदेशी राज्यों से मैत्री सम्बंध, अवमानना या किसी अपराध के उकसावे की स्थिति में सरकार कानून बनाकर प्रेस की स्वतंत्रता पर तर्कसंगत प्रतिबंध लगा सकती है. सभी सम्भावित परिस्थितियों में प्रेस को असीमित और निरंकुश स्वतंत्रता प्रदान करना अव्यवस्था और अराजकता को निमंत्रण देने जैसा है. दोस्तों समाचार पत्र वास्तव में अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के माध्यम हैं. विचारों की अभिव्यक्ति की भी अपनी एक सीमा और जिम्मेदारी होनी चाहिए. यदि कोई नागरिक संविधान के अनुच्छेद 19(1) के अन्तर्गत प्रदान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर न्यायालय को बदनाम करता है, उसकी मर्यादा को चोट पहुँचाता है तो न्यायालय को अधिकार होगा कि ऐसे व्यक्ति को न्यायालय की अवमानना का दोषी करार दे और उसे दण्डित करे. दोस्तों भारत में प्रेस को कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है. प्रेस को भी वही स्वतंत्रता प्राप्त है जो एक साधारण नागरिक को अनुच्छेद 19(1) के अन्तर्गत प्राप्त है. इसका सीधा अर्थ य़ह है कि प्रेस को टैक्स के मामले में ,उद्योगों से संबंधित कानूनों के लागू होने के मामले में, कर्मचारियों के सेवा शर्तों के मामलों में, कोई छूट नहीं है. दोस्तों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए राज्य के लिए य़ह न्यायसंगत नहीं होगा कि ऐसा कोई कानून बनाए जिससे प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई अंकुश लगे या इसके प्रसार में किसी प्रकार की कटौती हो जिससे सूचनाओं का प्रसार संकुचित हो या अभिव्यक्ति का माध्यम तय करने की स्वतंत्रता पर कोई अंकुश लगे यानी विचारों को व्यक्त करने के माध्यम को चुनने की स्वतंत्रता किसी भी तरह प्रभावित हो या प्रेस को सरकारी सहायता लेने के लिए मज़बूर होना पड़े ताकि इसकी स्वतंत्रता प्रभावित हो. राज्य के लिए य़ह उचित नहीं होगा कि ऐसा कोई कानूनी कदम जिससे इसका प्रसार प्रभावित हो या प्रेस पर विशेष टैक्स लगाये जिससे सूचनाओं का संचरण यानी Circulation सीमित हो जाय. 
दोस्तों जब भी किसी कानून की संवैधानिकता को विशेष तौर पर जो प्रेस के विरुद्ध हो  कोर्ट में चुनौती दी जाती है तो कोर्ट को  इसका परीक्षण मौलिकता और प्रक्रियात्मक तार्किकता यानी  Substantive and Proceedural Reasonableness दोनों दृष्टिकोण से करनी चाहिए .जब सुप्रीम कोर्ट के सामने Panjab special powers (Press) act 1956 आया  तब कोर्ट ने इसके एक प्रावधान को रद्द कर दिया जबकि दूसरे प्रावधान को बरकरार रखा. कोर्ट ने कहा कि सबकुछ सरकार के स्व-विवेक यानी Subjective Satisfaction पर छोड़ देना और प्रभावित पार्टी को अपना पक्ष रखने का अवसर न देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है और य़ह तर्कसंगत प्रतिबंध नहीं है. Press (Objectionable Matter) act 1951 के 1956 में समाप्त हो जाने के बाद प्रेस पर नियंत्रण के लिए देश में कोई कानून नहीं था लेकिन 1976 में संसद ने कड़े प्रावधानों और स्थायी स्वरुप में Prevention of Publication of Objectionable Matters Act 1976 पारित किया लेकिन 1977 में जनता पार्टी सरकार ने इस कानून को रद्द कर दिया और 44th संविधान संशोधन 1978 के माध्यम से एक नया अनुच्छेद 361A संविधान में डाला गया. अनुच्छेद 361-A के अनुसार, कोई भी व्यक्ति यदि संसद या राज्य विधानसभा के दोनों सदनों या दोनों में से किसी एक की सत्य कार्यवाही से संबंधित विषय-वस्तु का प्रकाशन समाचार-पत्र में करता है तो उस पर किसी भी प्रकार का दीवानी या फौजदारी मुकदमा देश के किसी भी न्यायालय में नहीं चलाया जा सकता . दोस्तों संविधान का कोई भी प्रावधान प्रेस पर Censorship लगाने को प्रतिबन्धित नहीं करता . इसकी संवैधानिकता का परीक्षण भी संविधान के अनुच्छेद 19 के क्लॉज दो के अंतर्गत दिए गए तार्किकता यानी Reasonableness के आधार पर ही किया जा सकता है. संविधान के लागू होने के ठीक बाद ही Brajbhushan vs State of Delhi के मामले में सेंसरशिप की वैधानिकता का मामला सुप्रीम कोर्ट में आया. साथ ही East Panjab Safty Act 1949 के सेक्शन 7(1)(c) का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में आया. इस ऐक्ट के अनुसार राज्य सरकार Public safty aur Public order को  किसी भी प्रकार का खतरा होने का अंदेशा होने पर किसी प्रिंटर प्रकाशक या सम्पादक को आदेश दे सकती है कि किसी विषय या विषयों के वर्ग के प्रकाशन के पहले स्क्रूटनी या जाँच के लिए प्रस्तुत किया जाय. कुछ इसी तरह के मामले  Madras maintenance of public order act 1949 को भी न्यायालय में चुनौती दी गई जिसमें Ramesh Thaper vs State of Madras मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने बहुमत के फैसले में स्पष्ट किया कि Public safty aur Public order जैसे शब्द राज्य की सुरक्षा यानी Security of the State के अंतर्गत नहीं आते इसलिए विवादित कानून को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त कर दिया. दोस्तों सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद प्रथम संविधान संशोधन विधेयक 1951 के माध्यम से अनुच्छेद 19(2) में Public order शब्द जोड़ा गया. इसी संविधान संशोधन में Reasonable यानी तार्किकता यानी तर्कसंगतता शब्द  भी अनुच्छेद 19 (2) में जोडा गया. इस प्रथम संविधान संशोधन से सुप्रीम कोर्ट का उक्त निर्णय निष्प्रभावी हो गया. इस दोहरे संवैधानिक संशोधन के बाद यदि प्रेस पर जनहित के नाम पर सेंसरशिप लगाया जाता है तो उसे एकदम से असंवैधानिक करार नहीं दिया जा सकता कि य़ह प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध है पर जिन परिस्थितियों में सेंसरशिप की घोषणा हुई है उनकी तार्किकता या तर्कसंगत होने की जाँच पड़ताल कोर्ट द्वारा की जा सकती है. अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों में प्रेस पर सेंसरशिप वह भी शांतिकाल में तो कल्पना से भी परे है लेकिन भारत में जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से पता चलता है य़ह बिलकुल सम्भव है. वीरेंद्र vs स्टेट ऑफ पंजाब के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शान्ति की अवस्था में भी प्रेस पर सेंसरशिप लगाना वैधानिक होगा यदि य़ह मौलिकता और प्रक्रियात्मक दोनों ही दृष्टिकोण से तार्किक सुरक्षा उपायों यानी Reasonable Safeguards के अधीन है अन्यथा नहीं. दोस्तों यहां पर य़ह स्पष्ट है कि तात्कालिक परिस्थितियों का सामना करने के लिए एक सीमित समय के लिए Pre-Censorship वैधानिक है बशर्ते आवश्यक प्रक्रियात्मक सावधानियां बरती गई हों उदाहरण के लिए भारतीय दण्ड संहिता का सेक्शन 144. फिर भी यदि इसे पूरी तरह से कार्यपालिका के विवेकाधीन छोड़ दिया जाय तो य़ह अतार्किक होगा. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक कानून की वैधानिकता को सही ठहराया जिसके अंतर्गत मोशन पिक्चर्स यानी सिनेमा के Pre-Censorship का प्रावधान था. सूचना तकनीकी अधिनियम यानी Information Technology Act 2000 के सेक्शन 66A को इस आधार पर चुनौती दी गई कि य़ह बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है क्योंकि य़ह अनुच्छेद 19(2)के अन्तर्गत उपलब्ध आठों अपवादों यानी Exceptions के अंतर्गत कहीं नहीं आता. य़ह भी कि य़ह कुछ ज्यादा ही व्यापक है जैसे इसमें इन्टरनेट के माध्यम से प्रसारित सारी सूचनाएँ मतलब सारी सूचनाओं पर  66A लागू होगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेक्शन 66A एक ऐसे अपराध की बात करता है जो अस्पष्ट और अतिशयोक्तिपूर्ण है यानी जो Vague and Overboard है. इसलिए Information Technology Act 2000 का सेक्शन 66A संविधान के अनुच्छेद 19(1)के अनुसार असंवैधानिक है और  अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत उपलब्ध अपवादों यानी Exceptions में भी नहीं आता. दोस्तों ध्यान देने वाली बात यह है कि जब संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत राष्ट्रीय आपातकाल यानी National Emergency की घोषणा की जाती है तब अनुच्छेद 358 के अंतर्गत अनुच्छेद 19 निलम्बित हो जाता है ताकि बिना किसी अवरोध के Pre-Censorship लागू किया जा सके. जून 1975 में आन्तरिक अशान्ति के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की गयी तब तुरन्त इसके बाद ही रक्षा एवं आन्तरिक सुरक्षा अधिनियम 1971 यानी Defence and Internal Security Act 1971 के नियम 48(1) के अन्तर्गत सेन्सरशिप के आदेश जारी हुए थे. जब 1977 के चुनावों के बाद जनता पार्टी सरकार सत्ता में आयी तब 21 मार्च 1977 को आपातकाल को निरस्त करने के आदेश हुए और अगले दिन 22 march 1977 को प्रेस सेंसरशिप को निरस्त करने की घोषणा कर दी गई. य़ह भी ध्यान देने वाली बात है कि जहाँ अनुच्छेद 31A से लेकर 31C लागू होगा वहाँ अनुच्छेद 19 नहीं लागू होगा.

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