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Article 16, Constitution of India

 संविधान के अनुच्छेद 16 का सम्बन्ध है सरकारी पदों पर नियोजन और नियुक्ति से. Article 16 क्लॉज वन स्पष्ट कहता है कि There shall be equality of opportunity for all citizens in the matters relating to employment and appointment for any office under the state.यानी सभी नागरिकों के लिए सरकारी पदों पर नियोजन या नियुक्ति के मामलों में अवसरों की समानता होगी यानी सभी को समान अवसर मिलेंगे. उदाहरण के लिए IAS की परीक्षा में सभी Graduates सम्मिलित हो सकते हैं. अनुच्छेद 16 का क्लॉज टू कहता है कि No citizen shall on the ground only of religion,race,caste,sex, descent and placs of birth or any of them  be ineligible for....... यानी कोई भी नागरिक किसी भी सरकारी पद के लिए सिर्फ धर्म, वर्ण, जाति,लिंग vansh और जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता. दोस्तों अनुच्छेद 16(1) स्पष्ट कहता है कि Matters relating to employment and appointments यानी नियोजन और नियुक्ति के मामलों में. इसमें नियुक्ति से पहले और नियुक्ति के बाद की स्थितियां भी शामिल हैं जो कि पूरे नियोजन की प्रक्रिया का हिस्सा हैं. अवसरों की समानता का वास्तविक महत्व उसका मात्र कानूनी सहायता होना नहीं है. अवसरों की समानता का अस्तित्व सिर्फ इस पर निर्भर नहीं करता कि सामाजिक अपंगता यानी Social disabilities का न होना ही बल्कि ऐसे उपयुक्त अवसरों का सुलभ होना जिससे लोंगों को अपनी योग्यता एवं उत्कृष्टता को  फलीभूत करने का समान एवं सम्पूर्ण अवसर प्राप्त हो. समान व्यवहार होना चाहिए लेकिन उन्हीं के साथ जिनकी स्थितियाँ समान हों. दोस्तों यदि पदोन्नती के समय Merit cum seniority यानी योग्यता वरिष्ठता को आधार बनाया गया है तो योग्यता और क्षमता को वरिष्ठता की अपेक्षा ज्यादा महत्व दिया जाएगा लेकिन योग्यता और क्षमता के मानदण्ड में यदि अभ्यर्थियों में समानता है तो उस अवस्था में तब वरिष्ठता को प्राथमिकता मिलेगी. हालाँकि वरिष्ठता को तय करने का आधार के निश्चित मापदण्ड होने चाहिए जो न्यायसंगत,तर्कसंगत और निष्पक्ष हों क्योंकि वरिष्ठता किसी के भी सेवाकाल का एक बहुत ही महत्तवपूर्ण पक्ष है. दोस्तों नियमित पदों पर नियोजन और नियुक्ति में नियमित भर्ती प्रक्रिया का पालन होना चाहिए जो कि संविधान सम्मत हो न कि जो अव्यवस्थित और पक्षपातपूर्ण हो. अस्थायी, संविदा आधारित, आकस्मिक, दिहाड़ी और तदर्थ नियोजन इत्यादि संवैधानिक योजना के अनुरूप नहीं हैं इसलिए ऐसी नियुक्तियों का नियमितीकरण नहीं किया जा सकता. ऐसी प्रक्रिया से नियुक्त किए गए लोग स्थायी सेवा का दावा नहीं कर सकते. तदर्थ या Ad-hoc की नियुक्ति किसी पद पर होती है न कि किसी सेवा या काडर में होती है और ये Ad-hoc नियुक्तियां नियमित भर्ती प्रक्रिया के प्रावधानों के अनुसार भी नहीं की जातीं. Ad-hoc पर नियुक्त व्यक्ति फॅमिली पेंशन का भी दावा नहीं कर सकता. लंबे समय तक काम करने के बावज़ूद Ad-hoc कर्मचारी को सरकारी कर्मचारी का दर्जा प्राप्त नहीं हो सकता. सरकार का य़ह दायित्व है कि नियोजन के लिए बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों मे से योग्यता के आधार पर चयन करे. किसी भी पद के दावेदार सभी अभ्यर्थियों को समान अवसर दिया जाना चाहिए अपनी योग्यता सिद्ध करने का. चयन प्रक्रिया निष्पक्ष और न्यायसंगत हो न कि मनमानापूर्ण और पक्षपातपूर्ण. चूंकि पदोन्नती नियोजन का हिस्सा है इसलिए नियुक्ति से लेकर पदोन्नती और सेवामुक्तई तक किसी भी प्रकार का भेदभाव संविधानसम्मत नहीं हो सकता. अनुच्छेद 16 एक ऐसा muladhikar है जो हर तरह के भेदभाव के विरुद्ध एक सशक्त रक्षा कवच है. दोस्तों, अनुच्छेद 16 के कुछ अपवाद भी हैं. 16(3) के अंतर्गत संसद को य़ह अधिकार है कि वह किसी राज्य या स्थानीय प्राधिकरण में किसी विशेष वर्ग में नियुक्ति के लिए निवास स्थान का शर्त लगा सकती है कि अभ्यर्थियों को वहीँ का निवासी होना आवश्यक है. अपने इस अधिकार का प्रयोग करते हुए संसद ने Public employment (Requirement as to residence) Act 1957 पास किया जिसमें भारत सरकार को य़ह अधिकार दिया गया कि कुछ पदों और सेवाओं के लिए आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा में  को नियोजन के लिए निवास स्थान का शर्त रख सकती है. हालाँकि य़ह व्यवस्था 1974 में ही समाप्त हो गयी. अब कहीं भी नियोजन के लिए निवास स्थान की कोई शर्त नहीं है सिवाय आंध्र प्रदेश के जिसके लिए संविधान में 371D जोड़ा गया. दोस्तों दूसरा अपवाद है अनुच्छेद 16 (4). संविधान के अनुच्छेद 16 के क्लॉज 4 के अनुसार राज्य मे कुछ पदों और नियुक्तियों को पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए आरक्षित रखा जा सकता है यदि राज्य की सेवाओं में इनका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है. पिछड़े वर्गों के लोंगों में अनुसूचित जातियां और जनजातियां भी शामिल हैं. य़ह अनुच्छेद वंचितों को सामाजिक आर्थिक न्याय पहुँचाने के उद्देश्य से प्रेरित है. दोस्तों संविधान का अनुच्छेद 16 का क्लॉज पाँच कहता है कि किसी धार्मिक या साम्प्रदायिक संस्था से जुड़े पदों पर उन्हीं धार्मिक या साम्प्रदायिक संस्था को मानने वाले लोंगों द्वारा ही भरे जाएंगे. दोस्तों संविधान के अनुच्छेद 335 के अनुसार संघ और प्रांतों में सेवाओं और पदों पर नियोजन के मामलों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के दावों पर vichar किया जाएगा पर प्रशासनिक दक्षता को बनाए रखते हुए. यदि Qwalifying marks अनुसूचित जातियों और जनजातियों के अभ्यर्थियों लिए कम किए जाते हैं तो प्रशासन में दक्षता बनाए रखने में कठिनाई होगी. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 16(4) में आरक्षण देने के मामले में राज्य के ऊपर कोई सीमा निर्धारित नहीं की गयी है. मतलब राज्य कितना भी आरक्षण दे सकता है पर अनुच्छेद 16(4)को अनुच्छेद 335 के साथ पढ़े जाने की जरूरत है. अनुच्छेद 335 स्पष्ट कहता है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सरकारी सेवाओं और पदों पर नियोजन का दावा ,प्रशासनिक दक्षता को बनाए रखने की आवश्यकता के अनुरूप होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अतार्किक, अत्यधिक और अनावश्यक आरक्षण देना संविधान के साथ धोखा होगा. हालाँकि 82वें संविधान संशोधन 2000 के माध्यम से अनुच्छेद 335 में एक नया प्रावधान जोड़ा गया जिसके अन्तर्गत राज्य को य़ह अधिकार दिया गया कि वह चाहे तो अनुसूचित जातियों और जनजातियों के अभ्यर्थियों के राज्य की सेवाओं और पदों पर पदोन्नती के मामले में यदि कोई परीक्षा हो तो Qwalifying Marks को कम कर सकता है या यदि मूल्यांकन का कोई दूसरा मापदण्ड हो तो उसमें ढील दिया जा सकता है. इस संविधान संशोधन ने पदोन्नती के मामले में दक्षता बनाए रखने की शर्तों को क़रीब क़रीब खत्म कर दिया. दोस्तों समझने की बात य़ह है कि सार्वजनिक पदों और सेवाओं के लिए नियोजन और नियुक्ति के मामलों में में जैसा कि पहले बताया गया है कि सिर्फ धर्म, वर्ण, जाति, लिंग, vansh,और जन्मस्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए लेकिन दूसरे आधार पर भेदभाव हो सकता है. राज्य तमाम अभ्यर्थियों में से प्रमोशन के लिए या नियुक्ति के लिए दक्षता, अनुशासन या किसी अन्य आधार पर चयन कर सकती है. जब तक कि नियोजन या नियुक्ति प्रक्रिया में नियमों का पालन हो रहा है, निर्धारित योग्यता और पद के कार्य और कर्तव्य के बीच तर्कसंगत सम्बन्ध है, किसी कानून का उल्लंघन नहीं हो रहा है तब तक कोर्ट का हस्तक्षेप नहीं हो सकता. दोस्तों इंदिरा साहनी मामले या मंडल आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने अपने ऐतिहासिक फैसले में सरकारी सेवाओं में आरक्षण को लेकर कई मानदण्ड निर्धारित किए जैसे पहला है कि पिछड़े वर्गों के नियोजन और नियुक्ति के सम्बन्ध में अनुच्छेद 16(4) में विस्तृत प्रावधान हैं. दूसरा संविधान में पिछड़े वर्गों के नागरिकों की कोई परिभाषा नहीं दी गई है. जाति, पेशा, गरीबी, और सामाजिक पिछड़ापन आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं. भारत में छोटी जातियों को ही पिछड़ा हुआ माना जाता है. वैसे जाति अपने आप में एक वर्ग यानी Class हो सकती है. तीसरा, हिन्दू समाज में पिछड़े वर्गों की पहचान उनकी जाति, परंपरागत व्यवसाय, गरीबी, जन्मस्थान, अशिक्षा इत्यादि के आधार पर की जाती है. ऐसे समुदाय जिसमें जाति की पहचान नहीं होती उसमें जाति के अलावा अन्य सभी मापदण्ड लगाए जाएंगे. चौथा, अनुच्छेद 16 चार में जिस पिछड़ेपन की बात की गयी है वह मूलरूप से सामाजिक पिछड़ापन है. अवश्यक नहीं की य़ह सामाजिक और शैक्षणिक दोनों हो. पाँचवाँ, Means टेस्ट के माध्यम से एक सीमा तय होनी चाहिए और जिनकी Income उस सीमा से ज्यादा हो उन्हें Creamy Layer में रखा जाय और उन्हें आरक्षण का लाभ न मिले. सम्पत्ति को भी सामाजिक उत्थान का आधार बनाकर Creamy Layer का निर्धारण किया जा सकता है. छठा, आरक्षण का पात्र होने के लिए जरूरी है कि किसी वर्ग का पिछड़ा हुआ होना जरूरी है और साथ ही सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अभाव हो. सातवाँ, अनुच्छेद 16 चार के अंतर्गत आरक्षण की व्यवस्था 50% से ज्यादा नहीं हो सकता. आठवाँ, 50% का नियम प्रत्येक वर्ष लागू होना चाहिए न कि किसी वर्ग, सेवाओं, Cadre के आधार पर. नौवां, अनुच्छेद 16 चार के अंतर्गत पदों  का आरक्षण शुरुआती नियुक्ति तक ही सीमित होगी और प्रमोशन में लागू नहीं होगा. यदि प्रमोशन में आरक्षण है भी तो वह सिर्फ पाँच वर्षों तक ही रहेगा. 77th संविधान संशोधन 1995 में क्लॉज 4A जोड़कर इस समयसीमा को हटा दिया गया है और अब अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोंगों के लिए प्रमोशन में आरक्षण बना रहेगा. दशवां, पिछड़े वर्गों की पहचान न्यायिक पुनरावलोकन यानी Judicial Review के अधीन है .दोस्तों, अन्य पिछड़ी जातियों का विभाजन जैसा कि मंडल आयोग ने किया था वह अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर लागू नहीं होगा, उनका उपवर्गीकरण और सामुहिकरण नहीं होगा. दोस्तों अनुच्छेद 16 चार राज्य को आरक्षण प्रदान करने का अधिकार देता जरूर है पर य़ह राज्य का विवेकाधिकार है. इसका अर्थ स्पष्ट तौर पर य़ह है कि पिछड़ी जाति के लोगों का आरक्षण का दावा कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है. य़ह राज्य के विवेक पर है कि वह आरक्षण दे या नहीं. दोस्तों यदि योग्य अभ्यर्थी न मिलें तो आरक्षित रिक्तियों को अधिकतम तीन सालों तक बढ़ाया जा सकता है यानी Carry Forward किया जा सकता है. उसके बाद वे समाप्त यानी Lapse हो जाएंगी. 81st संविधान संशोधन 2000 के माध्यम से अनुच्छेद 16 में क्लॉज 4B जोड़ा गया जिसके अंतर्गत राज्य को य़ह अधिकार दिया गया कि ऐसी रिक्तियों को एक अलग समुह के तौर पर आने वाले वर्ष में उनपर नियुक्ति की जाय. सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 16 चार A और 4B के अंतर्गत सरकार को मिले कुछ अधिकारों की कुछ सीमा तय की है. पहला 50%से अधिक आरक्षण नहीं हो सकता. दूसरा, Creamy Layer सिद्धांत का पालन होगा. तीसरा, इस अधिकार के प्रयोग का आधार क्या है जैसे पिछड़ापन, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व. चौथा, अनुच्छेद 335 के मद्देनज़र प्रशासनिक दक्षता को ध्यान में रखना. 

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