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Prerogative Writs क्या होती हैं

 Prerogative Writs क्या होती हैं .ये कितने प्रकार की होती हैं और संविधान का Article 32  कैसे लोंगों के Fundamental Rights का रक्षा कवच है. Fundamental Rights का सिर्फ संविधान का हिस्सा होना ही काफी नहीं है. यह तब तक एक खोखली घोषणा से ज्यादा कुछ भी नहीं है जब तक इसे प्रभावकारी तरीके से लागू करने के शक्तिशाली माध्यम न  हों. तमाम देशों का अनुभव इस बात की पुष्टि करता है कि इन अधिकारों के अस्तित्व की वास्तविकता का परीक्षण सिर्फ कोर्ट में ही हो सकता है लेकिन इसके लिए जरूरी है कि न्यायपालिका पूरी तरह निष्पक्ष हो और स्वतन्त्र हो साथ ही उसके पास ऐसे माध्यम मौजूद हों जो उन्हें Fundamental Rights को  प्रभावशाली ढंग से लागू कराने की ताकत देते हों. ब्रिटिश और अमेरिकन लीगल सिस्टम में ये माध्यम Writs के रूप में मौजूद हैं. भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त Fundamental Rights को प्रभावकारी बनाने के लिये विशेष व्यवस्था की गयी है. Fundamental Rights सिर्फ सरकार के विरुद्ध ही नहीं बल्कि विधायिका यानी Legislature के विरूद्ध भी लोंगों को उपलब्ध हैं. संविधान की धारा 13 के अनुसार यदि कार्यपालिका की किसी कार्यवाई या विधायिका द्वारा बनाए गए किसी कानून से यदि किसी भी Fundamental Right का उल्लंघन होता है तो न्यायपालिका ऐसे किसी भी कदम को निरस्त कर सकती है. किसी भी तरह के मनमाने कार्रवाई को कोर्ट खारिज कर सकती है. न्यायालय को य़ह अधिकार है कि वह निजी संस्थाओं और व्यक्तियों के विरूद्ध भी Fundamental Rights को लागू कर सकती है और किसी भी तरह के Violation की अवस्था में जुर्माना भी ठोंक सकती है. दोस्तों भारतीय न्यायपालिका को य़ह अधिकार है कि वह किसी भी व्यक्ति के आग्रह पर किसी भी संस्था या व्यक्ति के विरुद्ध किसी भी पीड़ित व्यक्ति के Fundamental Rights को लागू करने के लिए इन Prerogative Writs को जारी कर सकती है. दोस्तों संविधान की धारा 32 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट को और धारा 226 के अन्तर्गत हाई Courts को Prerogative Writs जारी करने की शक्ति प्रदान किया गया है.  संविधान की धारा 359 के अंतर्गत यदि Emergency घोषित हो तो Fundamental Rights का निलम्बन किया जा सकता है वह भी संविधान में दिए गए प्रावधानों के अनुसार. सुप्रीम कोर्ट में संविधान की धारा 32 के अंतर्गत याचिका दायर कर के अपने Fundamental Rights को लागू कराने का आग्रह स्वयं ही एक Fundamental Right है. संविधान में इसे Constitutional Remedy के  नाम से जाना जाता है. दूसरे Fundamental Rights की तरह इसे भी संविधान के पार्ट थ्री में रखा गया है. देखा जाय तो संविधान की धारा 32 पूरे संवैधानिक ढांचे की आधारशिला है .डॉ अम्बेडकर ने इसे संविधान की आत्मा और हृदय की संज्ञा दी थी.  संविधान की धारा 32 के अनुसार कोई भी व्यक्ति अपने Fundamental Rights को लागू कराने के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है और सुप्रीम कोर्ट को य़ह अधिकार है कि उक्त याचिका के आधार पर Prerogative Writs जैसे Habeas Corpus, Mandamus, Prohibition, Certiorary, और Quo- Warranto जो भी इनमें से उपयुक्त हो, जारी कर सकता है. Article 32 स्वयं गारण्टी देता है Fundamental Rights की सुरक्षा की. य़ह Constitutional Remedy स्वयम एक Fundamental Right है. Article 32 के अंतर्गत दायर किसी भी किसी भी याचिका को संज्ञान में लेने से सुप्रीम कोर्ट इन्कार नहीं कर सकता यदि प्रथम दृष्टया किसी भी Fundamental Right का हनन होता दिख रहा है मतलब सुप्रीम कोर्ट य़ह नहीं कह सकता कि पहले से मौजूद दूसरे विकल्पों की  तलाश करने के बाद ही यहां आयें. यदि Fundamental Rights का कोई हनन नहीं हुआ है तो Article 32 के अंतर्गत कोई याचिका   स्वीकार नहीं होगी. दोस्तों अब बात करेंगे कि Prerogative Writs होते क्या हैं. य़ह शब्द English कॉमन लॉ से लिया गया है. चूंकि Sovereign या King को Fountain ऑफ  Justice कहा जाता था मतलब राजा हमेशा न्याय ही करेगा का सिद्धांत. राजा विशेष परिस्थितियों में विशेष आदेश जारी करने का अधिकार रखता था. समय बदलने के साथ वहाँ की हाई कोर्ट ऑफ़ जस्टिस ने Prerogative Writs जारी करना शुरू कर दिया जब किसी असाधारण मामले में असाधारण राहत देने की आवश्यकता महसूस की जाती थी. उदाहरण के तौर पर यदि किसी विशेष मामले पर विशेष राहत देने के लिए या तो कोई कानून है ही नहीं या यदि कोई कानून है भी तो वह पर्याप्त नहीं है. ऐसे में हाई कोर्ट कोई भी उपयुक्त Writ जारी कर सकता है. दोस्तों Article 32 पर केवल सुप्रीम कोर्ट ही Prerogative Writs जारी कर सकती है जबकि Article 226 के अन्तर्गत हाई कोर्ट भी Writs जारी कर सकते हैं. Prerogative Writs जारी करने के मामले में हाई कोर्ट का अधिकार सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा व्यापक है. Article 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट तभी कोई Writ जारी कर सकती है जब किसी Fundamental Right का हनन या Violation हुआ हो. जबकि हाई कोर्ट Fundamental Rights  के हनन के मामले में तो Writs जारी कर ही सकता है पर इसके साथ साथ दूसरे अन्य कानूनों के उल्लंघन के मामले में भी Writs जारी कर सकता है. उदाहरण के तौर पर राज्य सरकारें उन वस्तुओं के Sale और  Purchase पर कोई टैक्स नहीं लगा सकती जो राज्य के बाहर खरीदी और बेची जा रही है या उन वस्तुओं पर भी जिन्हें इम्पोर्ट या Export किया जा रहा है. यदि किसी राज्य सरकार ने इसका उल्लंघन करते हुए इस पर टैक्स लगा दिया तो सम्बंधित हाई कोर्ट Writ जारी कर सकता है. दोस्तों Article 32 के अंतर्गत सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने पर य़ह सिद्ध करना पड़ेगा कि क्यों पहले हाई कोर्ट नहीं गए, या नहीं जा सकते थे तो क्यों या हाई कोर्ट जाना ही बेकार था. यदि एक बार किसी Fundamental Rights का हनन या  Violation सिद्ध हो जाता है तो सुप्रीम कोर्ट Article 32 के अंतर्गत राहत देने से इन्कार नहीं कर सकता. सुप्रीम कोर्ट य़ह नहीं कह सकता कि पीड़ित व्यक्ति को किसी दूसरे कोर्ट से राहत हासिल करना चाहिए या उसे साधारण कानून के जरिए राहत प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट य़ह भी नहीं कह सकता कि राहत देने से पहले सबूत इकट्ठे कर लिए जाएं या विवादास्पद तथ्यों की जाँच करा लिया जाय. सुप्रीम कोर्ट य़ह भी नहीं कह सकता है उचित Writ में ही याचिकाकर्ता को राहत  मांगनी चाहिए बल्कि सुप्रीम कोर्ट को स्वयं उपयुक्त Writ के अन्दर राहत उपलब्ध कराना चाहिए या याचिका में ही उचित  बदलाव कर देना चाहिए. आम तौर पर पीड़ित व्यक्ति ही याचिका दायर करके उपयुक्त राहत की मांग कर सकता था पर अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी व्यक्ति समाज के व्यापक हित में याचिका दायर कर सकता है. य़ह असल में Right to be heard का विस्तार है जिससे जनहित याचिका यानी Public Interest Litigation को सपोर्ट मिलता है. इसके अलावा AK Gopalan VS State of Madras के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने Preventive Detentions Act 1950 के सेक्शन 14 को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि उक्त प्रावधान संविधान की धारा 32 का उल्लंघन करता है. ध्यान देने की बात य़ह है कि सिर्फ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को ही Prerogative Writs जारी करने का अधिकार है. दोस्तों अब बात करेंगे अलग अलग Writs का. पहला Writ है Habeas Corpus जिसका शाब्दिक अर्थ है To have the body यानी शरीर को प्रस्तुत करो. इस Writ के माध्यम से कोर्ट य़ह सुनिश्चित करती है कि यदि किसी व्यक्ति को हिरासत में रखा गया है तो उसे कोर्ट के सामने प्रस्तुत किया जाय ताकि उक्त व्यक्ति को  हिरासत में रखे जाने का कारण ज्ञात हो सके और यदि उक्त व्यक्ति को हिरासत में रखने का कोई उचित न्यायिक कारण नहीं है तो उसे रिहा कर दिया जाय. Habeas Corpus Writ सरकारी अधिकारी या किसी प्राइवेट व्यक्ति  जिसने किसी अन्य व्यक्ति को अपनी कस्टडी में रखा हुआ है, के खिलाफ जारी की जा सकती है. Writ की अवहेलना की अवस्था में संबंधित व्यक्तियों के विरूद्ध अदालत की अवमानना की कार्यवाही की जा सकती है जिसके अन्दर सजा का भी प्रावधान है. न सिर्फ सरकारी अधिकारियों के मनमाने रवैये बल्कि प्राइवेट व्यक्तियों के विरूद्ध भी Habeas Corpus Writ एक शक्तिशाली रक्षा कवच है. यदि हिरासत में ले गए व्यक्ति को किसी Magistrate के सामने प्रस्तुत कर दिया जाता है तो Habeas Corpus Writ निष्फल यानी Infructuous हो जाता है. अलग अलग परिस्थितियों में Habeas Corpus Writ जारी किया जा सकता है. पहला Fundamental Rights को लागू कराने के लिए. Article 21 के अनुसार किस भी व्यक्ति को उसके जीवन या वैयक्तिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता सिवाय विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के यानी  No person shall be deprived of his personal liberty except according to procedures established by law. यदि सरकारी एजेंसी द्वारा किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जाता है तो बिना किसी वैधानिक आधार के या विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया से हटकर किसी को गिरफ्तार किया जाता है या जिस कानून के अंतर्गत किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है वह कानून ही अवैध या असंवैधानिक है. इस अवस्था में हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट Habeas Corpus Writ उस अधिकारी के विरुद्ध जारी कर सकती हैं जिसने पीड़ित को हिरासत में लिया है और उस व्यक्ति को रिहा करने का आदेश दे सकती है. Habeas Corpus Writ उस अवस्था में भी जारी किया जा सकता है जब किसी व्यक्ति को जिस कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया है या हिरासत में लिया गया है वह कानून ही Ultra- Vire या गैर संवैधानिक है. दोस्तों कुछ ऐसे मामले भी हैं जब Writ of Habeas Corpus जारी नहीं किया जा सकता है जैसे कि यदि हिरासत में लिया गया व्यक्ति और हिरासत में लेने वाला दोनों ही कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर हों या कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे किसी अपराधिक मामले में दोषी पाए जाने पर किसी कोर्ट द्वारा सजा दी गई हो यानी सजायाफ्ता हो या अभिलेख न्यायालय या संसद द्वारा की जा रही अवमानना की कार्यवाई में हस्तक्षेप करना हो या किसी व्यक्ति को किसी कोर्ट द्वारा जेल भेजा गया हो और प्रथम दृष्टया वह आदेश गैर कानूनी नहीं है या उस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र के बाहर हो. दूसरा Writ है Mandamus जिसका शाब्दिक अर्थ है Command या आदेश. Mandamus Writ सरकार के जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोंगों को उनकी सार्वजनिक और कानूनी कर्तव्यों यानी Public-Legal ड्यूटी का निर्वाह करने का परम आदेश देता है जिसके निर्वाह करने से उन्होंने इन्कार कर दिया है और इस कर्तव्य का निष्पादन किसी और माध्यम से नहीं हो सकता मतलब पीड़ित व्यक्ति के पास कोई और Remedy नहीं है. दोस्तों यहां पर य़ह स्पष्ट है कि यदि कोई व्यक्ति अपने सार्वजनिक एवं कानूनी कर्तव्य का निर्वाह  करने से इन्कार कर रहा है जबकि उसके इस कर्तव्य का निर्वहन याचिकाकर्ता का कानूनी अधिकार है इस अवस्था में उस व्यक्ति के विरुद्ध कोर्ट द्वारा Mandamus Writ जारी किया जा सकता है. वैसे य़ह हाई कोर्ट का विवेकाधिकार है.यदि राहत का कोई और कानूनी विकल्प मौजूद हो तो  हाई कोर्ट Mandamus Writ जारी करने से इन्कार भी कर सकता है. हालाँकि जहाँ तक Fundamental Rights को लागू करने का प्रश्न है तो वैकल्पिक समाधान होना बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है क्योंकि तब Fundamental Rights को लागू कराना सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट का कर्तव्य है. भारत में Mandamus Writ सिर्फ सरकारी अधिकारियों के खिलाफ ही नहीं बल्कि सरकार के भी खिलाफ़ जारी किया जा सकता है. Article 226 और 361 के अंतर्गत सरकार के विरुद्ध भी उपयुक्त कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं Mandamus Writ Subordinate Courts और दूसरे न्यायिक संस्थाओं के विरुद्ध भी जारी किए जा सकते हैं यदि वे अपने कानूनी कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं. दोस्तों Mandamus Writ जारी करने का मुख्य उद्देश्य है Fundamental Rights को लागू कराना. यदि कोई सरकारी अधिकारी या सरकार स्वयम की किसी कार्यवाई से किसी व्यक्ति के Fundamental Rights का उल्लंघन होता है तो न्यायपालिका Mandamus Writ जारी करके उक्त कार्यवाई पर रोक लगा सकती है. एक मामले में याचिकाकर्ता जो कि Subordinate civil Judicial Services के लिए योग्य था लेकिन Communal Rotation के कारण उसका चयन नहीं किया जा रहा था जो कि Article 16(1)द्वारा Gauranteed Fundamental Rights का उल्लंघन था तब कोर्ट ने मद्रास स्टेट को Mandamus Writ जारी करके Communal Rotation को छोड़कर योग्यता के आधार पर याचिकाकर्ता के पात्रता का परीक्षण करने का आदेश दिया. दोस्तों Fundamental Rights को लागू करने के अलावा हाई कोर्ट और मामलों पर भी Mandamus Writ जारी कर सकता है. Mandamus Writ किसी कोर्ट या Judicial ट्राइब्यूनल को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए जारी किया जा सकता है यदि वह ऐसा करने से इन्कार कर रहा है. Mandamus Writ जारी करके कोर्ट किसी सरकारी अधिकारी या स्वयँ सरकार को निर्देश दे सकती है कि वह उस कानून को लागू  न करे क्योंकि वह असंवैधानिक है.Article 361 के अन्तर्गत Mandamus Writ राष्ट्रपति और राज्यपाल के विरुद्ध जारी नहीं किया जा सकता. Mandamus Writ प्राइवेट व्यक्तियों के खिलाफ़ भी जारी नहीं किया जा सकता. अब आते हैं तीसरे Writ Prohibition पर. Prohibition Writ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा जारी किया जाता है Subordinate Courts यानी अधीनस्थ न्यायालयों को यदि वे अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर कार्य कर रही हैं या ऐसे अधिकार क्षेत्र पर काम कर रही हैं जो वैधिक रूप से उनमें निहित नहीं है . दूसरे शब्दों में  इस Writ का उद्देश्य है अधीनस्थ न्यायालयों को उनकी वैधिक या कानूनी सीमाओं के अन्दर ही रहने के लिए बाध्य करना. दोस्तों Prohibition और Mandamus में य़ह अन्तर है कि जहाँ Mandamus कार्यवाई करने के लिए परम आदेश देता है वहीँ Prohibition कार्रवाई रोकने के लिए आदेश देता है. Mandamus Writ जारी किया जाता है न्यायिक अधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों दोनों के विरुद्ध जबकि Prohibition Writ न्यायिक और अर्ध-न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध ही जारी किया जा सकता है प्रशासनिक के विरुद्ध नहीं. ध्यान देने की बात य़ह है कि Prohibition Writ कोर्ट का विवेकाधिकार नहीं है बल्कि यह अधिकार का मामला है. भारत में Prohibition Writ जारी किया जा सकता है अधिकार क्षेत्र के अतिक्रमण या अभाव के मामले में पर इसके साथ ही य़ह Writ उस मामले में भी जारी हो सकता है जिसमें किसी अधीनस्थ कोर्ट ने उस कानून के अन्दर ही अपना अधिकार क्षेत्र हासिल कर लिया हो जो कानून स्वयं किसी Fundamental Right का उल्लंघन करता हो. सुप्रीम कोर्ट Prohibition Writ तभी जारी कर सकता है जब किसी Fundamental Right का हनन हुआ हो. दोस्तों अब बात करते हैं अगले Writ Certiorary की. देखा जाय तो Prohibition Writ तब जारी किया जाता है जब कोई मामला लम्बित है यानी Pending है और अन्तिम आदेश अभी होना बाकी है जबकि Certiorary Writ तब जारी किया जाता है जब अदालती कार्यवाही समाप्त हो गई हो या अन्तिम आदेश जारी कर दिया गया हो. हालाँकि  Prohibition और Certiorary दोनों को जारी किया जाता है न्यायिक या अर्ध न्यायिक न्यायालयों या ट्राइब्यूनल के खिलाफ़ लेकिन Prohibition  जारी किया जाता है ट्राइब्यूनल के असंवैधानिक निर्णयों को रोकने के लिए जबकि Certiorary Writ को जारी किया जाता है ट्राइब्यूनल के आदेश को निरस्त करने के लिए. दोनों ही Writs का उद्देश्य है कि अधीनस्थ अदालतें और ट्राइब्यूनल अपने उचित अधिकार क्षेत्र में रहकर ही कार्य करें और किसी अन्य के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण न करें. Certiorary Writ जारी करने के लिए जरूरी है कि पहला ,कोई ट्राइब्यूनल हो या कोई सरकारी अधिकारी हो जिसके पास अधिकार हो एक न्यायिक संस्था के तौर पर काम करने का और उसके निर्णय लोंगों के अधिकारों को प्रभावित करते हों. दूसरा, जरूरी है कि ट्राइब्यूनल या अधिकारी ने बिना अधिकार के ही कोई अर्ध-न्यायिक कार्यवाई की हो या अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कोई फैसला किया हो या उसका फैसला प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध हो या Error Apparent on the face of its record यानी देखते ही कोई त्रुटि मालूम हो जाए. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Certiorary Writ को प्रशासनिक मामलों में जारी नहीं किया जा सकता. य़ह उन्हीं अधिकारियों के विरुद्ध जारी किया जा सकता है जिन्हें न्यायिक तौर-तरीकों से कार्यवाई करनी होती है और किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले दोनों पक्षों को सुनना जरूरी हो बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के बाद के फैसलों प्रशासनिक और अर्ध-न्यायिक के बीच का अन्तर मिट गया और आज की स्थिति में किसी भी अधिकारी को कोई भी निर्णय लेने से पहले दोनों पक्षों को सुनना जरूरी है.  किसी भी पीड़ित को अपना पक्ष रखने का अवसर न देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के विरुद्ध है. ऐसे आदेश को धारा 226 के अन्तर्गत कोर्ट द्वारा निरस्त किया जा सकता है. दोस्तों जानने की कोशिश करते हैं कि कब कोई ट्राइब्यूनल बिना अधिकार क्षेत्र के कार्य करता है. पहला  यदि कोर्ट का गठन ही त्रुटिपूर्ण हो यानी ऐसे लोग इसमें बैठ गए हैं जो इसकी योग्यता ही नहीं रखते और निर्णय ले रहे हैं. दूसरा, वह कानून जिसके अंतर्गत ट्राइब्यूनल का गठन हुआ हो उसके अनुसार जाँच का विषय वस्तु ही ट्राइब्यूनल के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो. तीसरा,जिन तथ्यों पर कोर्ट का अस्तित्व निर्भर करता हो कोर्ट ने उन तथ्यों की गलत व्याख्या करके अपना अधिकार क्षेत्र सुनिश्चित किया हो. ऐसी स्थिति भी हो सकती है जब ट्राइब्यूनल ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया हो या इसके फैसले धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार या मिलीभगत से हासिल किए गए हों. अन्त में, जब किसी अधीनस्थ कोर्ट या ट्राइब्यूनल का निर्णय Error Apparent on the face of its record से प्रभावित हो जाता है तो Certiorary Writ के माध्यम से खारिज किया जा सकता है. यहाँ त्रुटि या  Error का अर्थ है Error of Law. यदि कोई ट्राइब्यूनल जिस आधार पर कोई फैसला करता है और य़ह पाया जाता है कि कानून के अंतर्गत ये आधार उस फैसले की इजाज़त नहीं देते तक Certiorary Writ जारी करके उस फैसले को रद्द किया जा सकता है. ऐसे भी मामलों में हाई कोर्ट Certiorary Writ को जारी करके अधीनस्थ यानी Inferior Courts के फैसले को रद्द कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट भी Certiorary Writ जारी कर सकता है बशर्ते किसी Fundamental Right का उल्लंघन हुआ हो. दोस्तों अब बात करेंगे Quo-Warranto की. Quo Warranto Writ के माध्यम से कोर्ट य़ह     जाँच करती है कि किसी सर्वसम्मति पद यानी Public Office पर बैठने वाला कानून के अनुसार उस पद पर बैठने की योग्यता रखता है या नहीं. यदि उसका उस पद पर दावा गलत निकला तो कोर्ट उसे निकाल बाहर करने का आदेश दे सकती है. Quo Warranto Writ जारी करने के लिए य़ह जरूरी है कि पहला,  वह  ऑफिस या पद सार्वजनिक है और विधि या संविधान द्वारा सृजित या Created है. दूसरा, ऑफिस या पद Substantive यानी मौलिक हो. इसका अर्थ है य़ह पद किसी की इच्छा पर निर्भर नहीं है. तीसरा, किसी भी सार्वजनिक पद पर किसी व्यक्ति की नियुक्ति में संविधान, विधि , और वैधानिक दस्तावेजों का उल्लंघन हुआ हो. दोस्तों अब बात करेंगे Quo-Warranto की. Quo Warranto Writ के माध्यम से कोर्ट य़ह     जाँच करती है कि किसी सार्वजनिक पद यानी Public Office पर बैठने वाला कानून के अनुसार उस पद पर बैठने की योग्यता रखता है या नहीं. यदि उसका उस पद पर दावा गलत निकला तो कोर्ट उसे निकाल बाहर करने का आदेश दे सकती है. 

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