अँग्रेजी शासन के दौरान विदेशी सरकार लोंगों को उपाधियां यानी Titles दिया करती थी भारत के अन्दर अंग्रेजों के प्रति समर्पित एक तबका खड़ा किया जा सके जो अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान हो. देश के राष्ट्रवादी नेता य़ह कहकर इसका विरोध करते थे कि ब्रिटिश सरकार अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को अन्जाम देने के लिए और सार्वजनिक जीवन को भ्रष्ट बनाने के लिए उपाधियां प्रदान कर रही है. दोस्तों जब आजादी मिलने के बाद भारत का संविधान लागू करने की बात आयी तो सरकार द्वारा उपाधियां प्रदान करने की दुरूपयोगी परम्परा को प्रतिबंधित करने की मांग उठी. परिणामस्वरुप संविधान ने स्पष्ट तौर पर राज्य द्वारा किसी भी प्रकार की उपाधियां प्रदान करने पर प्रतिबंध लगा दिया ताकि सत्ता का दुरुपयोग रोका जा सके.दोस्तों, ध्यान देने वाली बात यह है कि य़ह प्रतिबंध सिर्फ राज्य के विरुद्ध है परन्तु दूसरे सार्वजनिक संस्थाएँ जैसे विश्वविद्यालय पर कोई रोक नहीं है वे अपने विशिष्ट प्रतिभा के धनी लोंगों को उपाधियों से सम्मानित कर सकते हैं और इस उपाधियों का प्रयोग उनके नाम के साथ किया जा सकता है. दोस्तों, राज्य द्वारा मिलिटरी और शैक्षणिक उपाधियां प्रदान करने पर कोई रोक नहीं है और इन उपाधियों को प्रयोग नाम के साथ भी किया जा सकता है. दोस्तों, समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए विशिष्टता प्रदान करने पर राज्य पर कोई प्रतिबंध नहीं है पर इन विशिष्टताओं का उपयोग नाम के साथ नहीं किया जा सकता. भारत रत्न और पद्मा विभूषण जैसे पुरुस्कारों का प्रयोग उपाधियों के तौर पर नहीं किया जा सकता और ये संवैधानिक प्रतिबंधों के दायरे में नहीं आते. दोस्तों 1954 में भारत सरकार ने चार प्रकार के अलंकरण की शुरुआत की भारत रत्न, पद्मा विभूषण, पद्मा भूषण, पद्मा श्री. भारत रत्न अलंकार उनके लिए जिन्होंने कला, साहित्य, विज्ञान या समाज सेवा के क्षेत्र में विशिष्ट एवं उल्लेखनीय योगदान दिया हो. दूसरे पुरुस्कार उनके लिए जिन्होंने किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र में अपना अति विशिष्ट योगदान दिया और इसमें सरकारी कर्मचारियों द्वारा प्रदान की गयीं अतिविशिष्ट सेवाएं भी शामिल हैं. दोस्तों,हालांकि ये पुरुस्कार सिर्फ अलंकरण हैं और पुरस्कृत व्यक्तियों द्वारा अपने नाम के साथ विशिष्टता के तौर पर नहीं लगाए जा सकते.दोस्तों इन पुरुस्कारों की घोषणा पर तमाम लोंगों ने इस आधार पर कड़ा एतराज जताया कि ये पुरुस्कार संविधान की धारा 18 का सीधे तौर पर उल्लंघन करते हैं. आलोचकों ने ध्यान दिलाया कि हालांकि ये पुरुस्कार उपाधि के तौर पर प्रयोग नहीं किए जाएंगे पर ये पद और श्रेणी के आधार पर विशिष्टता प्रदान करते हैं जो संविधान के Preamble यानी प्रस्तावना के विरुद्ध है जो स्तर की समानता यानी Equality of Status की बात करता है. आलोचकों की दलीलों को इस तथ्य से ताकत मिलती है कि राष्ट्रीय पुरुस्कारों को श्रेष्ठ और निम्न श्रेणियों में विभाजित किया गया है. भारत रत्न से अलंकृत व्यक्तियों को तो Warrant of precedence यानी वरियता क्रम में स्थान दिया गया है जो कि प्रोटोकॉल के हिसाब से नौवें स्थान पर यानी कैबिनेट मंत्री के ठीक नीचे आता है. Warrant of precedence यानी वरीयता क्रम एक ऐसी सूची है जिसमें पदाधिकारियों, गणमान्य व्यक्तियों, अधिकारियों को सूचीबद्ध किया गया है पर इसका कोई कानूनी आधार नहीं है. दोस्तों इन पुरुस्कारों के विरुद्ध जो सबसे बड़ा एतराज है और जो न्यायसंगत भी है कि यदि कोई पुरस्कृत व्यक्ति इन पुरुस्कारों को अपने नाम के साथ जोड़कर उपाधि के तौर पर इनका प्रयोग करता है तो न तो संविधान न ही किसी वर्तमान कानून में इस पर कोई प्रतिबंध है. स्पष्ट है कि ऐसा कोई प्रयोग संविधान के अनुच्छेद 18(1) में निहित प्रतिबंधों के विरुद्ध है फिर भी इसे न तो संविधान न ही कोई कानून अपराध की श्रेणी में रखता है. आलोचकों की य़ह आशंका भी सही साबित होती है जब कई बार य़ह देखते हैं कि कई गणमान्य लोग अपनी विशिष्टता का प्रदर्शन करने के लिए प्राप्त अलंकारों का प्रयोग अपने नाम के साथ सार्वजनिक रूप से करते हैं.दोस्तों आलोचकों द्वारा इन राष्ट्रीय अलंकारों का विरोध की काफी लंबे समय तक कोई सुनवाई नहीं हुई पर 1977 में सत्ता परिवर्तन के बाद जब जनता पार्टी की सरकार आयी तब इन राष्ट्रीय पुरुस्कारों या अलंकरण को समाप्त कर दिया गया पर जब दोबारा से श्रीमती इंदिरा गांधी की कॉंग्रेस सरकार सत्ता में आयी तो फिर से इन पुरुस्कारों को बहाल कर दिया गया. दोस्तों देखा जाय तो संविधान का अनुच्छेद 18(1) स्वयं एक अपवाद पैदा करता है जब तो सैन्य या शैक्षणिक अलंकारों यानी Decoratins की अनुमति देता है यानी विशिष्टता पैदा करता है. य़ह मामला कोर्ट में भी गया और माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में य़ह स्पष्ट कर दिया कि किसी के असाधारण सेवा या योगदान को मान्यता के रूप में ग़ैर- सैन्य या Non-Military पुरुस्कार या अलंकरण देना संविधान की धारा 14 और 18 का उल्लंघन नहीं है. इससे पुरस्कृत व्यक्तियों द्वारा अपने नाम के साथ उपाधि के तौर पर प्रयोग निश्चित तौर पर असंवैधानिक है. दोस्तों 1954 में प्रारंभ किए गए भारत रत्न पुरस्कार पहली बार तीन लोंगों को अलग अलग क्षेत्रों में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए दिए गए. इनमें जाने माने भौतिक विज्ञानी CV Raman , C Rajgopalachari और डॉ राधाकृष्णन शामिल हैं. पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री पहले व्यक्ति थे जिन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया. खान अब्दुल गफ्फार खान और नेल्सन मंडेला दो ग़ैर भारतीय हैं जिन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया. 1997 में नेता जी सुभाष चंद्र बोस को भारत रत्न देने की घोषणा हुई पर इससे पूरे देश में विवाद खड़ा हो गया क्योंकि एक तो उनकी मृत्यु पर ही विवाद है, दूसरे क्यों इतने विलंब से दिया गया तीसरे उनके कद को देखते हुए अब उन्हें भारत रत्न देना उनके महान व्यक्तित्व की गरिमा के विरुद्ध समझा गया.
कई दशकों से जारी इजराइल-फ़िलीस्तीन युद्ध में एक ऐसा भी वक़्त आया जब दोनों के बीच शांति की नयी उम्मीदें सामने आयीं. दोस्तों बात 1992 की है जब इजराइल के प्रधानमंत्री यीजाक राबिन ने फ़िलीस्तीन के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाया और फ़िलीस्तीनी नेता यासर अराफात ने भी आगे बढ़कर उस शानदार पहल का स्वागत किया. दोनों ही नेता अपने अपने मुद्दे सुलझाने के लिए सामने आए. इजराइली प्रधानमंत्री यीजाक राबिन ने माना कि फ़िलीस्तीनी मुक्ति संगठन PLO कोई आतंकवादी संगठन नहीं है बल्कि वे अपना देश चाहते हैं और इसका सम्मान किया जाना चाहिए. फ़िलीस्तीनी नेता यासर अराफात ने भी सकारात्मक रवैय्या अपनाते हुए इजराइल के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार भी किया और मान्यता भी दी. दोस्तों आज बात करेंगे 30 साल पहले हुए ओस्लो समझौते की जो फ़िलीस्तीनियों के लिए शान्ति की अन्तिम उम्मींद लेकर आया था पर य़ह फ़िलीस्तीनयों की आशाओं की अन्तिम किरण इजराइली आन्तरिक राजनीति का शिकार हो गयी. उसका परिणाम य़ह हुआ कि वह खूनी संघर्ष जो 1993 में ही खत्म हो जाना चाहिए था वह आज भी उसी निर्दयता के साथ जारी है. ...
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