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अनुच्छेद 19 स्वतंत्रता का अधिकार

 दोस्तों बहुत सारे नकारात्मक अधिकारों के अलावा भारतीय संविधान बहुत सारे सकारात्मक अधिकार भी देश के नागरिकों को प्रदान करता है ताकि संविधान के प्रस्तावना यानी Preamble में दिए गए स्वातंत्र्य के महान आदर्शों को आगे बढ़ाया जा सके. इन्हीं में से संविधान के अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत ऐसे मौलिक अधिकार दिए गए हैं जो भारत के प्रत्येक नागरिक को मूल स्वतंत्रता प्रदान करते हैं. दोस्तों वैसे तो मूल संविधान में कुल सात प्रकार के स्वतंत्रता की गारण्टी संविधान दी गयी थी परन्तु 44 वें संविधान संशोधन 1978 के माध्यम से सम्पत्ति रखने और क्रय-विक्रय के अधिकार को समाप्त कर दिया गया परिणामस्वरुप अब वह सिर्फ एक साधारण वैधिक अधिकार है. दोस्तों सम्पत्ति के अधिकार की समाप्ति के बाद अब छह प्रकार की स्वतंत्रता देश के नागरिकों को उपलब्ध हैं. संविधान का अनुच्छेद 19 क्लॉज 1 कहता है कि भारत के सभी नागरिकों को अधिकार होगा पहला वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यानी Freedom of speech and expressions. दूसरा बिना किसी अस्त्र के शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार यानी Freedom of assembly peaceably wothout arms .तीसरा संघ बनाने की स्वतंत्रता जिसमें सहकारिता संघ भी शामिल है यानी Freedom To form association or union or cooperative societies, चौथा पूरे भारत क्षेत्र में भ्रमण करने की स्वतंत्रता यानी  Freedom to move throughout the territory of India, पाँचवाँ भारत क्षेत्र के किसी भी हिस्से में रहने और बसने की स्वतंत्रता यानी Freedom to reside and settle in any part of the India , छठा सभी को कोई भी पेशा, जीविका अपनाने, व्यापार और व्यावसाय करने की स्वतंत्रता यानी Freedom to practice any profession,carry out any occupation, trade,or business . दोस्तों कोई भी राज्य अपने नागरिकों को असीमित यानी Absolute वैयक्तिक अधिकार प्रदान नहीं कर सकता इसलिए हमारे संविधान द्वारा जिन मौलिक अधिकारों की गारण्टी दी गयी है वे सभी अधिकार कुछ तार्किक प्रतिबंधों के अधीन हैं. जिस संविधान ने देश के नागरिकों को मौलिक स्वतंत्रता प्रदान किया है वही संविधान राज्य को य़ह शक्ति देता है कि वह समाज के व्यापक हित में कानून के माध्यम से मौलिक अधिकारों पर तर्कसंगत प्रतिबंध लगा सकता है. इस प्रकार से संविधान वैयक्तिक स्वतंत्रता और सामाजिक नियंत्रण के बीच उपयुक्त सन्तुलन कायम करने का प्रयास करता है. चूंकि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना है इसलिए संविधान के महान निर्माताओं ने नागरिकों को असीमित अधिकार देने के बजाय य़ह सुनिश्चत किया कि जहाँ सामुदायिक हितों और वैयक्तिक हितों के बीच टकराव होगा उस स्थिति में सामुदायिक हितों को प्राथमिकता मिलेगी. जहाँ अमेरिकी संविधान निर्माताओं ने तर्कसंगत प्रतिबंधों  और इसकी सीमाओं का निर्धारण न्यायालय पर छोड़ा वहीँ भारतीय संविधान निर्माताओं ने मौलिक अधिकारों पर तार्किक प्रतिबंधों को अनुच्छेद 19 के क्लॉज दो से  छह में स्पष्ट रूप से उल्लिखित यानी Mention किया. दोस्तों य़ह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि इस सन्दर्भ में राज्य की परिभाषा में सिर्फ संघ और प्रांतों की विधायिकायें ही नहीं आतीं बल्कि सभी स्थानीय और कानूनी संस्थाएँ जैसे नगर निगम, लोकल बोर्ड्स इत्यादि भी राज्य की परिभाषा में आते हैं और संस्थाएँ भी सभी प्रकार की स्वतन्त्रताओं पर प्रतिबंध लगा सकती हैं बशर्ते ये प्रतिबंध तर्कसंगत हों और अनुच्छेद 19 के क्लॉज दो से छह में दिए गए आधार से मेल खाती हों. दोस्तों भारतीय संविधान बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है परन्तु मानहानि, अदालत की अवमानना, शालीनता और नैतिकता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्री सम्बंध, अपराध के लिए उकसावा, सामाजिक व्यवस्था, भारत की संप्रभुता एवं अखण्डता की रक्षा जैसे मामलों पर राज्य तार्किक प्रतिबंध यानी Reasonable Restrictions लगा सकता है. शालीनता और नैतिकता का सम्बन्ध सिर्फ यौन नैतिकता से नहीं है बल्कि सार्वजनिक जीवन में व्यवहार और औचित्य के उच्च मानदण्डों से है. जैसे किसी प्रत्याशी द्वारा धर्म के नाम पर वोट माँगना शालीनता और नैतिकता के सिद्धांतों के विरुद्ध है. दोस्तों वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस बात की अनुमति नहीं देता कि कोई गैर कानूनी और अनैतिक कार्य में लिप्त हो. इसका अर्थ य़ह नहीं हुआ कि एक चुनी हुई सरकार को गैरकानूनी और बलपूर्वक उखाड़ फेंकने के लिए भीड़ को कोई भड़काये .दोस्तों शान्तिपूर्ण सभा करने की स्वतंत्रता का अर्थ य़ह हुआ कि सभा शान्तिपूर्ण होनी चाहिए और बिना किसी अस्त्र के और राज्य को य़ह अधिकार है कि वह समाज के व्यापक हित में तार्किक प्रतिबंध लगा सकता है. किसी भी सभा का दुरुपयोग अव्यवस्था फैलाने, शान्ति व्यवस्था भंग करने या भारत की अखण्डता और संप्रभुता के प्रति दुर्भावना फैलाने के लिए नहीं किया जा सकता. दोस्तों सभी नागरिकों को संघ यानी Association, Union or Cooperative Societies बनाने का अधिकार है परन्तु य़ह अधिकार भारत के सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, संप्रभुता और अखण्डता के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए तार्किक प्रतिबंधों के अधीन हैं. य़ह मौलिक अधिकार किसी को आपराधिक षड्यंत्र करने, ऐसा संघ बनाने जो शान्ति व्यवस्था के लिए खतरा हो, गैरकानूनी हड़ताल करने, सार्वजनिक अव्यवस्था फैलाने, या भारत की अखण्डता और संप्रभुता को हानि पहुंचाने की अनुमति नहीं देता. दोस्तों अनुसंधान 19 देश के सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार देता है कि वे भारत क्षेत्र के किसी भी हिस्से में स्वतंत्रता पूर्वक आ जा सकते हैं . देश के सभी नागरिकों को भारत क्षेत्र में कहीं भी रहने और बसने की स्वतंत्रता है पर ये अधिकार भी आम जनता के व्यापक हितों या किसी अनुसूचित जनजाति की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तार्किक प्रतिबंधों के अधीन हैं. दोस्तों अनुच्छेद 19 देश के सभी नागरिकों को कोई भी पेशा अपनाने, जीविका, व्यापार, या उद्यम अपनाने या करने का मौलिक अधिकार देता है परन्तु आम जनता के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए तार्किक प्रतिबंधों के अधीन हैं. इसके अलावा राज्य विधि के माध्यम से किसी भी पेशे या तकनीकी व्यावसाय करने के लिए विशेष योग्यता का निर्धारण कर सकता है. राज्य स्वयं के लिए कुछ व्यापार और कारोबार को सुरक्षित कर सकता है जिसको करने की किसी और को अनुमति नहीं होगी. दोस्तों भारत के संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों की विशेष बात यह है कि मौलिक अधिकारों की घोषणा में ही संविधान ने इनकी सीमाओं का भी निर्धारण कर दिया है. अमेरिकी संविधान के  Bill of Rights में वैयक्तिक स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार का अंकुश नहीं लगाया गया है परन्तु इन अधिकारों को प्रभावी बनाने के लिए और समाज के व्यापक हित में कोर्ट को Police power of the state के सिद्धान्त को गढ़ना पड़ा ताकि वैयक्तिक स्वतंत्रता पर तर्कसंगत प्रतिबंध लगाया जा सके. दोस्तों AK Gopalan VS State of Madras के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वैयक्तिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा के बीच उचित संतुलन कायम करने की बात पर जोर दिया. उल्लेखनीय बात यह है कि Reasonableness या तार्किक या तर्कसंगत ही वह शब्द है जिसकी व्याख्या की आवश्यकता ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की एंट्री कर दी यानी सुप्रीम कोर्ट के लिए दरवाजा खोल दिया.यदि कोई व्यक्ति शिकायत करता है कि किसी कानून या किसी शासनादेश के कारण उसके मौलिक अधिकार या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है तो उस अवस्था में कोर्ट का य़ह दायित्व होगा कि वह य़ह सुनिश्चित करे कि क्या विधि द्वारा लागू प्रतिबंध तर्कसंगत है और यदि परीक्षण के बाद य़ह प्रतिबंध तर्कसंगत नहीं पाया जाता है तो उस विधि या शासनादेश को असंवैधानिक घोषित करे और निरस्त करे. दोस्तों Reasonable Restrictions यानी तर्कसंगत प्रतिबंध वास्तव में अनुच्छेद 19 के क्लॉज 1 के अंतर्गत प्रदत्त मौलिक अधिकारों और इसी अनुच्छेद के क्लॉज दो से छह के अंतर्गत सामाजिक नियंत्रण यानी Social Control के रूप में उपलब्ध अपवादों के बीच संतुलन कायम करने का प्रयास करता है. इस मामले पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी प्रतिबंध तभी तक तर्कसंगत हैं जब तक वैयक्तिक अधिकारों और सामाजिक अधिकारों के बीच समुचित संतुलन हो. उदाहरण के तौर पर समाज कल्याण योजना के अंतर्गत भूमिहीन लोंगों को भूमि देने के साथ य़ह शर्त जोड़ना कि एक निश्चित अवधि के पहले वे उस भूमि को बेंच नहीं सकते हैं. य़ह एक तार्किक प्रतिबंध है. तार्किकता या तर्कसंगतता के परीक्षण के लिए किसी आम मानदण्ड का निर्धारण कठिन है. य़ह निर्भर करेगा प्रत्येक विवादित कानून पर. उस मौलिक अधिकार की प्रकृति जिसके हनन पर विवाद है, प्रतिबंध का मूल उद्देश्य,,वह समस्या जिसके समाधान का प्रयास किया गया है और उसकी तात्कालिकता यानी Urgency, प्रतिबंध लागू करने में अनुपात हीनता यानी किस हद तक कानून लागू किया जाना चाहिए और उस समय की परिस्थितियाँ, इन सभी पक्षों को न्यायालय संज्ञान में लेगा किसी भी निर्णय तक पहुंचने में. दोस्तों जिन कारणों के आधार पर सरकार संविधान द्वारा प्रदत्त या Gauranteed किसी मौलिक अधिकार पर प्रतिबंध लगाना चाहती है उन कारणों पर सरकार और इसके अधिकारियों  की आत्म-सन्तुष्टि यानी Subjective Satisfaction बहुत ही असाधारण परिस्थितियों यानी Exceptional Circumstances में ही होना चाहिए और कम से कम होना चाहिए. किसी भी मौलिक अधिकार पर अंकुश लगाने से पहले सभी तत्कालिक परिस्थितियों पर गंभीर विचार होना चाहिए. इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि प्रतिबंध का वास्तविक सार क्या है और इसके लागू करने के तौर तरीके क्या हैं और व्यवहार में लाने का साधन क्या है. दोस्तों सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी कानूनी प्रावधान की तार्किकता यानी Reasonableness का परीक्षण करते समय कि कहीं य़ह किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन तो नहीं कर रहा है, हमेशा कुछ बातों का ध्यान रखना होगा कि जैसे संविधान में दिए गए नीति निर्देशक तत्वों का, प्रतिबंध न तो मनमाना पूर्ण हो न ही आवश्यकता से अधिक आम जनता के हितों से परे, प्रतिबंधों के परीक्षण के लिए कोई समान्य नियम नहीं बनाए जा सकते जो हर प्रकार की परिस्थितियों में लागू हों. य़ह बदलती परिस्थितियों, मानवीय मूल्यों, संविधान के सामाजिक दर्शन एवं तात्कालिक स्थितियाँ या परिस्थितियाँ इत्यादी पर निर्भर करेगा. प्रतिबंधों और अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत प्रदत्त सामाजिक नियंत्रण के बीच एक उपयुक्त सन्तुलन होना चाहिए. जिस सामाजिक मूल्यों और सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं उसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए. लागू किए गए प्रतिबंध और कानून के उद्देश्य के बीच में एक सीधा, नजदीकी और तार्किक सम्बन्ध होना चाहिए. दोस्तों इसका मतलब साफ़ है कि किसी भी प्रतिबंध की तार्किकता यानी Reasonableness का परीक्षण मौलिकता और प्रक्रियात्मक दृष्टिकोण दोनों से होना चाहिए. मौलिकता के दृष्टिकोण से लागू किए गए प्रतिबंध और संबंधित कानून के सामुहिक उद्देश्य के बीच एक तर्कसंगत सम्बन्ध होना चाहिए और प्रतिबंध उस उद्देश्य से आगे नहीं होना चाहिए मतलब उतना ही होना चाहिए जितनी की जरूरत है. दूसरे शब्दों में प्रतिबंध उस समस्या से बड़ा नहीं होना चाहिए जिसके समाधान के लिये प्रतिबंध लगाए गए हैं. ऐसा प्रतिबंध जो  मनमाने पूर्ण तरीकों से मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करता हो उसे तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता. उदाहरण के लिए एक बीड़ी उत्पादक क्षेत्र में कृषि कार्य हेतु पर्याप्त मजदूरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए Deputy Commissiner ने कुछ विशेष गाँवों के लोंगों को बुआई के दिनों में बीड़ी उत्पादन में कार्य न करने का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को संविधान की धारा 19(1)(g) के व्यावसाय के अधिकार के उल्लंघन का दोषी पाया और सरकारी आदेश को निरस्त कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध को अतार्किक और आवश्यकता से अधिक पाया परिणामस्वरूप उसे असंवैधानिक करार दे दिया. दोस्तों जहां तक प्रक्रियात्मक पक्ष का सम्बन्ध है वह य़ह देखता है कि प्रतिबंध को लागू करने का तरीका क्या है. प्रतिबंध सिर्फ सीमा के अंदर ही नहीं होना चाहिए बल्कि इसे लागू करने के तौर-तरीके भी उचित और न्यायसंगत होने चाहिए .न्यायालय को तमाम परिस्थितियों पर विचार करना चाहिए जैसे प्रतिबंध को लागू करने का तरीका और इसे असल व्यवहार में लाने का ढंग तभी यह सुनिश्चित हो पाएगा कि प्रतिबंध प्रक्रियात्मक रूप से भी तर्कसंगत है है कि नहीं. प्रतिबंध   अतर्कसंगत होगा यदि इसे लागू करने का तरीका प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के विरुद्ध है. यदि कोई प्रतिबंध संघ बनाने के अधिकार या व्यवसाय करने के अधिकार में कटौती करता है और  उस नागरिक को अपना पक्ष रखने का अवसर बिना ही तो वह प्रतिबंध अतार्किक यानी Unreasonable है. जब तक कि असाधारण परिस्थितियाँ न हों तब तक मौलिक अधिकारों के प्रयोग को व्यक्तिपरक संतुष्टि यानी Subjective Satisfaction के अधीन करना वास्तव में अतर्कसंगत यानी  Unreasonable होगा. 

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