संविधान की धारा 17 के अन्दर अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया है यानी Abolition of untouchability. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले आप से एक छोटी सी गुजारिश यदि आपने अभी तक मेरे चैनल को subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ इसको subscribe कर लीजिए और बेल icon को प्रेस कर दीजिए. आते हैं पॉइन्ट पर. दोस्तों संविधान का अनुच्छेद 17 कहता है कि Untouchability is abolished, and it's practice in any form is forbidden.The enforcement of any disability arising out of untouchability shall be an offence punishable in accordance with law.यानी अस्पृश्यता को समाप्त किया जाता है और किसी भी रूप मे इसका अभ्यास प्रतिबंधित है. अस्पृश्यता से उत्पन्न किसी भी प्रकार की अपंगता को थोपना विधि के अनुसार दण्डनीय होगा. दोस्तों, भारत के महान संविधान निर्माताओं द्वारा भारतीय समाज को अतार्किक, परंपरागत अंधविश्वासों एवं अनुष्ठानिक मान्यताओं से मुक्त कराने की दूर दृष्टि को अभिव्यक्ति मिली भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के रूप में. संविधान निर्माताओं को य़ह स्पष्ट था कि देश के लोकतन्त्र और विधि के शासन की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए य़ह अत्यंत आवश्यक है कि जितनी जल्दी हो सके जाति व्यवस्था
को समाप्त किया जाना चाहिए. दोस्तों,संविधान की धारा 35 के अंतर्गत संसद को य़ह अधिकार है कि कानून बनाकर अस्पृश्यता के अनुपालन को दण्डनीय अपराध घोषित करे और इसके लिए समुचित दण्ड का निर्धारण करे. संसद ने अपने इस अधिकार का प्रयोग करते हुए Untouchability offences Act 1955 यानी अस्पृश्यता आपराधिक अधिनियम 1955 पारित किया. इस कानून को 1976 में संशोधित करके नया नाम दिया गया Protection of Civil Rights Act 1955 यानी नागरिक अधिकार सुरक्षा अधिनियम 1955.दोस्तों अस्पृश्यता शब्द को न ही संविधान में न ही Protection of Civil Right Act 1955 में ही परिभाषित किया गया है. अस्पृश्यता शब्द का आमतौर पर अर्थ है कि ऐसा सामाजिक प्रचलन जिसमें सिर्फ जन्म के आधार पर दलित वर्ग लोगों को तथाकथित उच्च वर्ग के लोगों द्वारा छोटा समझा जाता है और उनको किसी भी प्रकार के सामाजिक व्यवहार के योग्य नहीं समझा जाता. नागरिक अधिकार सुरक्षा कानून 1955 कुछ कृत्यों को अस्पृश्यता के आधार पर किए जाने को अपराध घोषित करता है और उसका दोषी पाए जाने पर दण्ड का निर्धारण करता है. पहला सार्वजनिक संस्थाओं जैसे अस्पताल, डिस्पेंसरी, शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश देने से इन्कार करना. दूसरा, सार्वजनिक पूजा स्थल पर किसी व्यक्ति को पूजा करने या प्रार्थना करने से रोकना. तीसरा, ऐसे स्थान जो आम जनता के लिए खुले हों जैसे दुकान, रेस्तरां, होटल, सिनेमा घर, तालाब, नल, जलस्रोत, सड़क, श्मशान घाट, इत्यादी स्थानों पर किसी को अस्पृश्यता के आधार पर जाने से रोकना. चौथा, 1976 के संशोधन के बाद किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति को अस्पृश्यता के आधार पर अपमानित करना, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अस्पृश्यता का उपदेश देना. जाति व्यवस्था की परम्परा ,धार्मिक ,दार्शनिक या ऐतिहासिकता के आधार पर अस्पृश्यता को सही ठहराना भी अब अपराध की श्रेणी में आते हैं और दोषी पाए जाने पर नागरिक अधिकार सुरक्षा कानून 1955 के अंतर्गत दण्ड का प्रावधान है. दोस्तों, अस्पृश्यता के अनुपालन का दोषी पाए जाने पर एक से दो वर्षों की कैद का प्रावधान है. दोबारा अस्पृश्यता का दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को संसद और राज्य विधायिका के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लग जाएगा. दोस्तों, यदि किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के साथ सामाजिक अपंगता या भेदभाव पूर्ण व्यवहार किया जाता है तो अदालत य़ह स्वीकार कर लेगी कि ऐसा व्यवहार अस्पृश्यता के आधार पर हुआ है जब तक कि आरोपी स्वयँ को निर्दोष न साबित कर ले. दरअसल ऐसे मामलों में वैधानिक अनुमान यानी Statutory Presumptions के आधार पर य़ह माना जाएगा कि अपराध किया गया है. नागरिक अधिकार सुरक्षा अधिनियम 1955 द्वारा अस्पृश्यता पर एक वास्तविक एवं प्रभावकारी प्रतिबंध लगाया गया है.
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