दोस्तों नमस्कार zedplus में आप का स्वागत है. आज बात करेंगे बांग्लादेश की जहाँ अभी जनता ने वहाँ की सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया, सैकड़ों लोग मारे गए और तो और प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा. आज बात करेंगे बांग्लादेश के पूरे इतिहास की. बंग्लादेश कब बना. कभी पूर्वी बंगाल से पूर्वी पाकिस्तान और फिर बांग्लादेश. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले आप से एक छोटी सी गुजारिश यदि आपने अभी तक मेरे चैनल को subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ इसको subscribe कर लीजिए और बेल icon को प्रेस कर दीजिए. आते हैं पॉइन्ट पर. दोस्तों अगस्त 1947 में भारत में ब्रिटिश शासन के अंत के साथ ही साम्प्रदायिकता के आधार पर भारत के दो टुकड़े हो गए और एक नए देश पाकिस्तान का जन्म हुआ. हिन्दू बहुल पश्चिम बंगाल भारत के हिस्से में आया और मुस्लिम बहुल पूर्वी बंगाल पाकिस्तान के हिस्से में गया. पूर्वी बंगाल को नया नाम दिया गया East wing of पाकिस्तान सीमाओं का निर्धारण सर Redcliff ने किया था .दोस्तों शुरुआती दिनों में पाकिस्तान ने शासन प्रणाली के रूप में संसदीय लोकतंत्र को अपनाने की बात की पर जिस संविधान सभा के ऊपर संविधान निर्माण और इस नए देश के प्रथम संसद के रूप में कार्य करने की जिम्मेदारी थी वह मोहम्मद अली Zinna के दबंग नेतृत्व के सामने झुक गयी परिणामस्वरूप य़ह व्यवस्था शुरू होने से पहले खत्म हो गयी. भारत विभाजन के नायक मोहम्मद अली Zinna पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल बने. Zinna के दबाव में लोकप्रिय बंगाली नेता Suharwardi के स्थान पर ख्वाजा Najimuddin को East बंगाल का मुख्यमंत्री बनाया गया. दोस्तों कराची को पाकिस्तान की नयी केन्द्रीय सरकार का मुख्यालय बनाया गया. केन्द्रीय विधायिका में बंगालीयों की सदस्य संख्या अधिक होते हुए भी प्रशासनिक पदों उनकी संख्या बहुत ही कम थी. एक देश होने के बावजूद भी पाकिस्तान और East बंगाल के बीच भौगोलिक ही नहीं भाषायी आधार पर एक लंबी दूरी थी. इस दूरी को मोहम्मद अली Zinna बंगालीयों पर उर्दू भाषा थोप कर और अपनी दबंग कार्यशैली के माध्यम से खत्म करना चाहते थे .1948 आते आते पूर्वी बंगाल के लोंगों ने बंगाली भाषा को पाकिस्तान सरकार द्वारा न स्वीकार किए जाने और पाकिस्तानी नौकरशाही में ग़ैर बंगालीयों के बढ़ते दबदबे और साथ ही साथ पाकिस्तान की सेंट्रल govt द्वारा बंगाल के प्रान्तीय सरकार के अधिकारों और राजस्व यानी Revenue हड़पने की प्रवृति का एतराज जताना शुरूकर दिया. दोस्तों Zinna जब तक पाकिस्तान के गवर्नर जनरल रहे उन्होंने पाकिस्तान की सेंट्रल Govt पर अपना दबदबा बनाए रखा. पाकिस्तानी सत्ता की करीब करीब सारी शक्तियाँ उन्होंने खुद में समेटे रखा जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान में लोकतांत्रिक माध्यमों से नए नेतृत्व को उभरने का न तो समुचित अवसर मिला और न ही लोकतन्त्र की जड़ों को कोई गहराई मिल सकी . दोस्तों 1948 में मोहम्मद अली Zinna की मृत्यु के बाद Nazimuddin नए गवर्नर जनरल बने पर सत्ता की असली ताकत प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के हाथों में केंद्रित थी. 16 October 1951 को रावलपिंडी में एक जनसभा को संबोधित करते समय एक हत्यारे ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी. दोस्तों लियाकत अली खान की हत्या के बाद Nazimuddin पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने और पंजाब से आने वाले गुलाम मोहम्मद को गवर्नर जनरल बनाया गया. गुलाम मोहम्मद ने धीरे-धीरे सिविल और मिलिटरी अफसरों को अपने पक्ष में करके अपनी स्थिति मजबूत की और 1953 में नैशनल असेंबली में बहुमत के बावजूद Nazimuddin को बर्खास्त कर दिया 1954 में संविधान सभा को भी भंग कर दिया. 1955 में गुलाम मोहम्मद ने इस्तीफा दे दिया और जनरल Iskandar Mirza नए गवर्नर जनरल बने. उनके कार्यकाल में 1955 में East Bengal का नाम बदलकर East Pakistan कर दिया गया. दोस्तों पाकिस्तान में नयी संविधान सभा का गठन किया गया और सबसे बड़ी सकारात्मक बात य़ह थी कि इसमें West Pakistan और East Pakistan का प्रतिनिधित्व बराबरी का था यानी Equal Representation था. 1956 में नया संविधान लागू हुआ जिसमें संघीय सरकार को व्यापक अधिकार प्राप्त था. जनरल Iskandar Mirza नए राष्ट्रपति बने और Suharwardi नए प्रधानमंत्री नियुक्त हुए. राष्ट्रपति Iskandar Mirza ने साज़िश करके 1957 में Suharwardi को प्रधानमंत्री पद से हटने पर मजबूर कर दिया और Feroz Khan Noor नए प्रधानमंत्री बने. दोस्तों 1958 आते आते पाकिस्तान में राजनैतिक स्थितियाँ बद से बदतर होती गयीं और कमजोर लोकतन्त्र ने दम तोड़ दिया. पाकिस्तान में मिलिटरी शासन स्थापित कर दिया गया. Iskandar Mirja निर्वासित कर दिए गए. पाकिस्तानी मिलिटरी और नौकरशाही ने एक मजबूत गठजोड़ बना लिया यानी Strong Alliance बना लिया. पाकिस्तान की प्रशासनिक सेवा में बंगालीयों की हिस्सेदारी को अपमानजनक हद तक कम कर दिया गया और उनके साथ दोयम दर्जे का बर्ताव किया जाने लगा. चूँकि सारे मिलिटरी प्रतिष्ठान West पाकिस्तान में ही स्थित थे तो आर्थिक सहायता और विकास का बड़ा हिस्सा West पाकिस्तान में ही केंद्रित हो गया और पूर्वी पाकिस्तान के साथ सौतेला व्यहवार यानी Step Motherly Treatment किया जाने लगा. दोस्तों East पाकिस्तान की जनता में अपने प्रति अन्याय के विरुद्ध रोष बढ़ता ही जा रहा था. ऐसे समय में उनके अन्दर सुलग रही नाराजगी को आवाज दिया शेख Mujiburrahaman ने. एक Zamindar परिवार से ताल्लुक रखने वाले शेख Muziburrahamaan 1949 में आवामी लीग के संस्थापक थे और 1963 में Suharwardi की मृत्यु के बाद awami लीग के अग्रणी नेता के रूप में उभर कर सामने आए. दोस्तों East Pakistan की जनता की तरफ से आवाज बुलंद करने वाले शेख Mujiburahaman एक बेहतरीन संगठनकर्ता और शानदार वक्ता थे . दोस्तों सेना ने बार बार उन्हें जेलों में डाला पर उनकी लोकप्रियता बढ़ती ही गयी. 1965 में East Pakistan के लिए Autonomy की मांग करते हुए शेख Mujiburahaman ने ऐतिहासिक छह सूत्रीय मांगों की पेशकश कर दी. दोस्तों इस बीच 1966 में जनरल Yahya खान पाकिस्तान के Commander in Chief बने और 1969 में जब राष्ट्रपति अयूब खान ने इस्तीफा दे दिया तब Yahya खान पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए पर वे सेनाध्यक्ष बने रहे. 1970 में Yahya खान ने पाकिस्तान में आम चुनावों की घोषणा कर दी. दोस्तों पाकिस्तान की नैशनल असेंबली की 313 सीटों में से 169 सीटें East Pakistan को Allot की गयीं थीं. जब पाकिस्तानी सेना के देख-रेख में हुए चुनाव के परिणाम घोषित हुए तो शेख Mujiburrahaman की आगामी लीग को 169 में से 167 सीटों पर जीत हासिल हुई जबकि West Pakistan के कुल 144 सीटों में से Zulfikar अली Bhutto की पार्टी
पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को सिर्फ 81 सीटों पर जीत हासिल हुई. चुनाव परिणाम के मुताबिक शेख Mujiburahaman को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री नियुक्त होना चाहिए था पर राष्ट्रपति Yahya खान और दूसरे West पाकिस्तानी नेता शेख Mujiburahaman को सत्ता सौंपने को बिल्कुल तैयार नहीं हुए. जुल्फिकार अली भुट्टो ने खुली धमकी दी कि जो भी सांसद ढाका जाएगा उसकी टांगे तोड़ दी जाएंगी. शेख Mujiburahaman को चुनाव जीतने के बाद सत्ता सौंपना तो दूर राष्ट्रपति Yahya खान ने भारी संख्या पाकिस्तानी सैनिकों को East Pakistan में उतारना शुरू कर दिया .East Pakistan में आजादी के समर्थन में सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हो गया. 7 मार्च 1971 को शेख Mujiburrahaman ने आजादी के समर्थन में रैली को सम्बोधित किया जिसमें करीब 20 लाख लोंगों ने हिस्सा लिया. शेख Mujiburahaman ने बांग्लादेश की आजादी की घोषणा कर दी. दोस्तों, 25 march 1971 को राष्ट्रपति Yahya खान ने Operation Search Light लॉन्च किए जाने की घोषणा कर दी. बलप्रयोग और दमन के माध्यम से बंगाली जनता की आवाज दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना द्वारा अब तक का सबसे क्रूरतम और जघन्य प्रयास शुरू किया गया. भारी संख्या में awami लीग के कार्यकर्ताओं के साथ शेख Mujiburrahaman को गिरफ्तार कर लिया गया. शेख Mujiburahaman को गिरफ्तार करने के बाद West Pakistan ले जाया गया. पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी में भारी संख्या में बंगाली छात्र मारे गए. परिणाम य़ह हुआ कि बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई की शुरुआत हो गयी. पाकिस्तानी सेना ने बंगाली जनता पर बेइंतिहा जुल्म ढालना शुरू किया. पाकिस्तानी राष्ट्रपति Yahya खान के निर्देश पर तीस लाख बांग्लादेशी नागरिकों को बर्बरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया. पाकिस्तानी सैनिकों ने तीन लाख से अधिक बांग्लादेशी महिलाओं के साथ बलात्कार किया. बलात्कार, बर्बरता,और मौत का ऐसा मंजर शायद ही कभी देखा गया हो. बांग्लादेशी जनता पर पाकिस्तानी सेना द्वारा मानवता को शर्मशार कर देने वाले जघन्य हिंसा और बलात्कार देखकर पूरी दुनियां हिल गयी. विश्व के शक्तिशाली देशों ने अपने अपने रणनीतिक दृष्टिकोण से पक्ष लेना शुरू किया. अमेरिका और चीन ने पाकिस्तान का पक्ष लिया जबकि भारत और सोवियत यूनियन यानी रूस ने बांग्लादेश का साथ दिया. दोस्तों भारी संख्या में बांग्लादेशी शरणार्थियों के आने से भारत के सामने अजीब स्थिति पैदा हो गयी. पाकिस्तानी हमले और उसकी सेना द्वारा बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी जनता पर किए जा रहे हिंसा और बलात्कार की घटनाओं के सामने भारत को मजबूरन तीन दिसम्बर 1971 को West Pakistan और East Pakistan पर एक साथ हमला बोलना पड़ा. बांग्लादेश की मुक्ति bahini ने Operation Jackpot और Operation Barrisol चलाकर पाकिस्तानी सेना का मुकाबला किया. 16 दिसम्बर को पाकिस्तान ने Surrendure कर दिया और बांग्लादेश एक स्वतन्त्र राष्ट्र बन गया. Yahya खान को उनके पद से हटा दिया गया और उनके स्थान पर zulgikar अली भुट्टो को पदासीन किया गया. दोस्तों चार नवम्बर 1972 को बांग्लादेश में नया संविधान लागू किया गया और बांग्लादेश को एक सेकुलर राष्ट्र घोषित किया गया. बांग्लादेशी संविधान में संसदीय शासन प्रणाली, Bill of Rights के साथ-साथ स्थानीय स्व शासन को मजबूत करने की बात की गयी. नए नए आजाद हुए बांग्लादेश के सामने संचार, यातायात, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, पावर supply को बहाल करने की चुनौती थी. साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं औद्योगिक उत्पादन की चुनौतियां भी सामने थी. 1973 में बांग्लादेश में आम चुनाव हुए शेख Mujiburahaman के नेतृत्व में आवामी लीग ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की. उथलपुथल भरे बांग्लादेश के राजनैतिक और आर्थिक हालात को देखते हुए शेख Mujiburahaman ने ज्यादा से ज्यादा शक्तियाँ खुद के हाथों समेटना शुरू कर दिया. यानी वे All powerful होते गए. दोस्तों 15 अगस्त 1975 को बांग्लादेशी सेना के कुछ अफसरों ने शेख Mujiburahaman और उनके परिवार के कई सदस्यों की हत्या कर दी और अगले तीन वर्षों तक बांग्लादेश की सत्ता मिलिटरी के हाथों में केंद्रित रही. 1977 में सेनाध्यक्ष Zia Ur Rahaman बांग्लादेश के नए राष्ट्रपति बन गए. Zia Ur Rahman ने बहुदलीय लोकतंत्र को बहाल कर दिया. 1981 में राष्ट्रपति Zia Ur Rahman की भी हत्या कर दी गयी और abdus Sattar बांग्लादेश के नए राष्ट्रपति बने. दोस्तों एक साल के अन्दर ही नए राष्ट्रपति Abus Sattar को एक सैन्य विद्रोह में हटा दिया गया और चीफ जस्टिस Ahsanuddin Chaudhary को नया राष्ट्रपति बनाया गया पर असल ताकत सेनाध्यक्ष HM Irshad के हाथों में थी. 1983 में सेनाध्यक्ष HM Irsaad स्वयम राष्ट्रपति बन गए. मिलिटरी तानाशाह HM Irshad ने कई प्रशासनिक परिवर्तन किए साथ ही बांग्लादेश की संसद पर दबाव डालकर 1988 में बांग्लादेश को एक इस्लामिक राष्ट्र घोषित कराया. बांग्लादेश की सैनिक तानाशाही की निरंकुश एवं दमनकारी नीतियों के चलते जनाक्रोश बढ़ता गया और धीरे-धीरे एक व्यापक जनान्दोलन खड़ा हो गया. जनरल Irshad को इस्तीफा देकर कुर्सी छोड़नी पड़ी. दोस्तों 1991 में बांग्लादेश में आम चुनावों की घोषणा हुई. बांग्लादेश में संसदीय लोकतंत्र को बहाल कर दिया गया. बेगम खालिदा Zia प्रधानमंत्री बनीं. उनके पांच साल के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की शुरुआत हुई. तमाम Sectors को प्राइवेट Investment के लिए खोल दिया गया. इस बीच बांग्लादेश की सेना ने दुनियाँ के अनेक देशों में UNO के शान्ति मिशन में अपना योगदान दिया. दोस्तों थोड़े-बहुत राजनैतिक उथलपुथल के बाद एक Caretaker सरकार की देखरेख में नए आम चुनाव हुए. 21 वर्षों के बाद Awami लीग की फिर से सत्ता में वापसी हुई. शेख हसीना जो कि शेख Mujiburahaman की बेटी हैं बांग्लादेश की नयी प्रधानमंत्री बनीं. प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सत्ता में आते ही Indemnity Ordinance नाम के उस कानून को रद्द कर दिया जिसके अंतर्गत शेख Mujiburahaman के हत्यारों को सज़ा से सुरक्षा मिली हुई थी. प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भारत के साथ गंगा नदी के पानी के बंटवारे पर महत्तवपूर्ण समझौता किया तथा दुनियाँ के तमाम बड़े नेताओं का बांग्लादेश में स्वागत किया. 2001 में खालिदा Zia फिर से सत्ता में वापस आयीं. आर्थिक मोर्चे पर महत्तवपूर्ण सुधार देखे गए. एक कट्टरपंथी इस्लामिक ग्रुप ने 2004 -2006 के बीच कई आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया और पूरे बांग्लादेश में Political Instability का माहौल व्याप्त हो गया अंततः सेना की सलाह पर देश में Emergency घोषित करनी पडी. दोस्तों 2008 के आम चुनावों में Awami लीग की सत्ता में वापसी हुई और 6 जनवरी 2009 को शेख हसीना फिर से बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं. Political Stability और Economic Development के वादे पर शेख हसीना की शानदार वापसी हुई. शेख हसीना ने एक War Crime ट्राइब्यूनल गठित किया ताकि उन लोंगों को सज़ा दी जा सके जिन लोंगों ने बांग्लादेश की जनता पर कहर ढा रही पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था यानी देश के गद्दारों का. इसके अलावा जनवरी 2010 में शेख Mujiburahaman के हत्यारों को फांसी की सज़ा दे दी गई. ये सभी बांग्लादेशी सेना सीनियर ऑफिसर थे शेख हसीना सरकार पर मानवाधिकार उल्लंघन के कई गंभीर आरोप लगाए गए. इसके बावजूद आर्थिक मोर्चे पर उल्लेखनीय काम हुए. जाने माने अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस और उनके द्वारा स्थापित ग्रामीण बैंक को गरीबी उन्मूलन की दिशा में अतुलनीय योगदान देने के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. शेख हसीना और उनकी आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरुप बांग्लादेश दक्षिण एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनी. बांग्लादेश की Per Capita Income भारत और पाकिस्तान से आगे चली गई. बहुत सारी बड़ी परियोजनाओं का शुभारंभ हुआ. पर्यावरण सुरक्षा के मद्देनजर बड़े स्तर पर Green कल कारखानों यानी Factories का निर्माण हुआ. दोस्तों शेख हसीना पर विपक्ष की आवाज को दबाने का आरोप लगाया गया. कट्टरपंथी इस्लामिक पार्टी जमात ए इस्लामी पार्टी पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया कि उसके सिद्धांतों बांग्लादेश के सेकुलर संविधान के विरुद्ध हैं. चुनाव के निष्पक्ष संपादन पर सवाल उठाते हुए BNP और दूसरी पार्टियों ने 2014 के चुनाव के वहिष्कार करने की घोषणा कर दी परिणाम य़ह हुआ कि शेख हसीना के नेतृत्व वाली पार्टी आवामी लीग ने आसानी से चुनाव जीत लिया . दोस्तों 2018 के चुनाव में विपक्षी दलों ने हिस्सा तो लिया पर मुख्य विपक्षी नेता बेगम खालिदा Zia जेल में ही थीं और उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं थी. किसी भी तरह की चुनावी गड़बड़ियों को नकारते हुए शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग ने 2018 का चुनाव भी भारी बहुमत से जीत लिया. शेख हसीना पर पुराने आरोप दुहराते जाते रहे. दोस्तों 2024 के चुनाव पहले बांग्लादेश की विपक्षी पार्टियों ने चुनाव के निष्पक्ष आयोजन पर गंभीर सवाल उठाते हुए एक Caretaker सरकार की देखरेख में चुनाव कराने की मांग की. विपक्ष का आरोप था कि भारी संख्या में विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया गया है. ऐसे में निष्पक्ष चुनाव की कोई संभावना नहीं है. सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी BNP ने चुनाव में भाग नहीं लिया. विपक्षी पार्टियों ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल और विरोध सभाओं का आयोजन किया. फिर भी बांग्लादेश के चुनाव हुए और परिणाम भी आया. शेख हसीना की पार्टी Awami लीग को शानदार बहुमत हासिल हुआ और शेख हसीना चौथी बार लगातार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं. दोस्तों व्यापक बेरोजगारी, सरकारी तन्त्र व्याप्त भ्रष्टाचार,सत्ता से दूर होता आम बांग्लादेशी ऊपर से शेख हसीना की बढ़ती तानाशाही के परिणामस्वरुप आम लोंगों में गुस्सा उबाल पर आ पहुँचा और जुलाई 2024 में शेख हसीना के विरुद्ध बांग्लादेश की जनता में भारी विरोध पैदा हो गया. दोस्तों बांग्लादेश की आजादी के बाद शेख Mujiburahaman ने सत्ता सम्हालने के साथ ही य़ह वादा किया था कि देश के Freedom Fighters को देश की सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाएगा और उन्होंने अपना वादा पूरा भी किया. दरअसल पाकिस्तानी सेना द्वारा तीस लाख बांग्लादेशी नागरिकों का नरसंहार किया गया था और लाखों महिलाओं का बलात्कार किया गया था. बहुत बड़ी संख्या में लोग बेसहारा हो चुके थे. उनके जीवन को दोबारा पटरी पर लाने के लिए शेख Mujiburahaman ने कई कदम उठाए और उन्हीं में से एक था सरकारी सेवाओं में आरक्षण. दोस्तों 2018 में बांग्लादेशी छात्रों ने इस आधार पर आरक्षण का विरोध करना शुरू किया कि अब Freedom Fighters की दूसरी या तीसरी पीढ़ी आ चुकी है ऐसे में अब आरक्षण का कोई औचित्य नहीं है इसलिए अब य़ह समाप्त होना चाहिए. आरक्षण का य़ह मामला हाई कोर्ट में गया पर आठ मार्च 2018 को हाईकोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया. याचिका खारिज होते ही छात्रों में गुस्सा भड़क गया. स्थिति की गंभीरता को समझते हुए शेख हसीना ने आरक्षण के पूरे व्यवस्था को ही समाप्त करने की घोषणा कर दी. पर छात्रों का गुस्सा समाप्त नहीं हुआ क्योंकि वे आरक्षण व्यवस्था में सुधार चाहते थे इसकी समाप्ति नहीं क्योंकि इससे विकलांगों और कुछ अन्य लोंगों को प्राप्त आरक्षण भी समाप्त हो गया. बाद में बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को उलट दिया व्यवस्था दिया कि 93% सरकारी सेवाओं में योग्यता यानी मेरिट के आधार पर सेलेक्शन होगा और 7 % पद अलग अलग केटेगरी के लोंगों के लिए आरक्षण होगा. दोस्तों हुआ य़ह कि अब तक देर हो चुकी थी और जो आन्दोलन आरक्षण के छात्रों द्वारा शुरू हुआ था उसमें तमाम शेख हसीना के विरोधी भी शामिल हो चुके थे. सिर्फ बांग्लादेशी शक्तियाँ ही नहीं बल्कि पाकिस्तान और चीन ने भी बांग्लादेश में अपना खेल शुरु कर दिया था. हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए और शेख हसीना के इस्तीफे से कम पर मानने को तैयार नहीं थे. शेख हसीना की सरकार ने विरोध प्रदर्शनों को कुचलने का हर सम्भव प्रयास किया. पुलिस और सेना द्वारा कर्फ्यू लगाना, इन्टरनेट सेवाओं को बाधित करने, भारी संख्या में लोंगों की गिरफ्तारी के बावजूद विरोध प्रदर्शन बढ़ता ही जा रहा था. पुलिस Firing में तीन सौ से अधिक लोग मारे गए. य़ह एक विशाल ज़न आन्दोलन बन चुका था और पाँच अगस्त 2024 को राजधानी ढाका पहुँचने का एलान कर दिया गया .अंततः सेना और पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया .सेना ने हालत की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री शेख हसीना को 45 मिनट के अंदर ही देश छोड़ कर चले जाने की सलाह दी. जान बचाकर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे कर शेख हसीना ने अभी भारत में शरण ले रखी है. दोस्तों बांग्लादेश में नोबल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक कार्यवाहक सरकार बनाई गई है पर अभी भी पूरे बांग्लादेश में अराजकता का माहौल व्याप्त है. चारों तरफ लूटमार मची है, अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं.शायद जनादेश की लंबे समय तक उपेक्षा का यही परिणाम होता है. शायद किसी भी तानाशाह का यही हस्र होता है. दोस्तों मिलते हैं next वीडियो में किसी और टॉपिक पर. मेरे चैनल को subscribe करेंगे तो मुझे आपका support मिलेगा. नमस्कार धन्यवाद
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