सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मंडल आयोग एवं पिछड़ा वर्ग आरक्षण

 आज सुप्रीम कोर्ट ने Creamy Layer की चर्चा करके एक बार फिर से मंडल आयोग को चर्चा के केंद्र लाकर खड़ा कर दिया तो आज बात करेंगे मंडल आयोग क्या था, इसकी सिफारिशें क्या थीं.  क्या है Creamy Layer की अवधारणा. क्या आरक्षण का लाभ सिर्फ कुछ लोंगों तक ही सिमट कर रह गया है जाना इस के मूल उद्देश्य की विफलता  है और इसमें सुधार कैसे सम्भव है. और अन्त में कौन थे BP मंडल. दोस्तों संविधान का article 15 देश के नागरिकों के प्रति धर्म नस्ल जाति सेक्स और जन्मस्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को प्रतिबन्धित करता है. इसी तरह संविधान का article 16 सरकारी सेवाओं के लिए भर्ती यानी Recruitment में धर्म नस्ल जाति सेक्स और जन्मस्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को प्रतिबन्धित करता है. यदि किसी समुदाय का प्रतिनिधित्व  इन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है तो उसके पक्ष में आरक्षण का प्रावधान किया जा सकता है. दोस्तों तात्पर्य य़ह है कि भारतीय समाज के सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए लोंगों जैसे पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन-जातियों को सामाजिक न्याय उपलब्ध कराने और उनके उत्थान यानी Development के लिए भारत का संविधान विशेष प्रावधान किए जाने की बात करता है इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर अनुसूचित जातियों और जनजातियों को केंद्रीय सेवाओं में क्रमशः 15% और 7.5% आरक्षण की व्यवस्था की गयी. दोस्तों संविधान के लागू होने के करीब 40 वर्षों बाद मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1990 में अन्य पिछड़े वर्गों के लोंगों के लिए केंद्रीय सेवाओं में 27% आरक्षण लागू किया गया. बाद में 2005 में इसका विस्तार करते हुए अनुसूचित जातियों,  अनुसूचित ज़न-जातियों,और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था सरकारी या गैर- सरकारी शिक्षण संस्थाओं में लागू किया गया. भारतीय समाज के आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए भी सरकारी सेवाओं में आरक्षण की मांग लंबे समय से होती आयी है. 2019 में आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोंगों के 10% आरक्षण का प्रावधान किया गया. य़ह 10% की व्यवस्था अनारक्षित समुह से आने वाले लोंगों के लिए है. दोस्तों 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर केंद्रित सेवाओं में 27% आरक्षण लागू किए जाने के बाद सरकार के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. 1992 में अपने एक महत्तवपूर्ण फैसले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी vs भारत सरकार के मामले पर सरकारी सेवाओं में अन्य पिछड़े वर्गो के लोंगों के लिए किए गए 27% आरक्षण के प्रावधान को सही ठहराते हुए इसे संविधान सम्मत करार दिया और स्पष्ट किया कि भारतीय समाज में जाति वर्ग विशेष यानी  Class का निर्धारण  करती है . माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक न्याय के उच्च मानदण्डों और प्रशासनिक दक्षता को ध्यान में रखते हुए आरक्षण की अधिकतम सीमा को 50% पर निर्धारित कर दिया यानी Capping कर दी. हाँ विशेष परिस्थितियों में आरक्षण को 50% की सीमा से अधिक  किया जा सकता है. दोस्तों सरकारी सेवाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए 27% आरक्षण को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक नयी अवधारणा Creamy Layer को जन्म देते हुए इसे आरक्षण से बाहर रखने का निर्णय दिया. Creamy Layer की परिभाषा को सुनिश्चित करने और लोंगों को Creamy Layer के अन्दर रखने या बाहर रखने के  मापदण्ड को निर्धारित करने के लिए Justice Ram Nandan Prasad समिति का गठन किया गया और इसकी सिफारिशों के आधार पर 1993 में अभिभावकों की प्रतिवर्ष आय या उनकी आर्थिक स्थिति को Creamy Layer का आधार बनाया गया.  1993 में एक लाख सालाना income के लोंगों को इसमें रखा गया. 2004 में इसे बढ़ाकर 2.5 लाख कर दिया गया. 2008 4.5 लाख कर दिया गया. 2013 में छह लाख रुपये और 2017 में इसे बढ़ाकर 8 लाख रुपये सालाना कर दिया गया जो अभी भी चल रहा है. दोस्तों आइए जानने की कोशिश करते हैं कि कौन से वे लोग हैं जो Creamy Layer की श्रेणी में सम्मिलित किए जा सकते हैं. प्रथम संवैधानिक पद धारण करने वाले जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति,  राज्यपाल, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज, संघ लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य. राज्य लोकसेवा आयोगों के अध्यक्ष और सदस्य, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, नियंत्रक एवं मुख्य लेखा परीक्षक इत्यादि, दूसरा केंद्रीय और राज्य सेवाओं में कार्यरत Group A और  Group B अधिकारी. इसके अलावा पब्लिक सेक्टर Undertakings ,बीमा कंपनियों के अधिकारी ,इसमें प्राइवेट companiyon के अधिकारी भी इसमें शामिल हैं. तीसरे इंजीनीयर,  डॉक्टर,सलाहकार, कलाकार, लेखक इत्यादि. सेना में कर्नल या उससे उपर स्तर के अधिकारी, वायुसेना, नौसेना और अर्धसैनिक बलों के समान रैंक के अधिकारी. उद्योग,  वाणिज्य,व्यापार में लगे लोग. शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग  जो बिल्डिंग के मालिक हैं और उनके पास एक निश्चित सीमा से अतिरिक्त कृषि भूमि है. दोस्तों समय समय पर य़ह चिंता जाहिर की जाती रही है कि अन्य पिछड़े वर्ग के आवेदक और उनके अभिभावक स्वयम को Creamy Layer से बाहर रखने के लिये तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं, जैसे सम्पत्तियों को उपहार स्वरूप परिवार के दूसरे सदस्यों के नाम कर देना, समय से पहले Retirement ले लेना इसके अलावा और भी दूसरे सम्भव तरीके अपनाना. दोस्तों सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आरक्षण का लाभ समान रूप से सभी पिछड़ी जातियों को मिल पा रहा है. जो जातियां आर्थिक रूप से संपन्न हैं उन्हीं के बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर पा रहे हैं और नौकरियों में आरक्षण का पूरा लाभ ले पा रहे हैं. देखा य़ह जा रहा है कि आरक्षण का लाभ सिर्फ कुछ जातियों तक ही सिमट कर रह गया है. दोस्तों रोहिणी आयोग के अनुसार आरक्षित नौकरियों और विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में 97% पद और  सीटों पर सिर्फ 25% लोग काबिज़ हैं. अन्य पिछड़े वर्गों के करीब 2600 समुदायों में से 1000 से अधिक समुदायों का केंद्रीय सेवाओं में प्रतिनिधित्व शून्य प्रतिशत है. अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोग भी इसी प्रश्न और इसी विषमता से प्रभावित हैं. उनमें कुछ ही जातियाँ हैं जो आरक्षण की सीढ़ी चढ़कर आगे बढ़ रही हैं बाकी जातियों की स्थिति ज्यों की त्यों है. अभी सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने Sc और ST के लिए Creamy Layer के तर्ज़ पर कोई व्यवस्था बनाने की बात की है ताकि सभी को आरक्षण का लाभ मिल सके. दोस्तों आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए प्रदत आरक्षण को मिला दिया जाए तो आज सरकारी सेवाओं में आरक्षण 60% तक पहुंच गया है.स्वयम सरकार का कहना है कि SC,ST और OBC के आरक्षित पदों का करीब 40 से 50% पद खाली रह जाते हैं उनपर भर्ती नहीं हो पाती. इसके अनेक कारण हो सकते हैं. नियोजक संस्थाओं का एकआमउत्तर होताहै "उपयुक्त अभ्यर्थी नहीं मिला " .बड़ा प्रश्न य़ह है कि क्या भर्ती प्रक्रिया यानी Recruitment में जातिवादी पक्षपात की भी तो कोई भूमिका तो नहीं. ऐसा भी हो सकता है कि "उपयुक्त अभ्यर्थी नहीं मिला "के पीछे वे शक्तियाँ हैं जो य़ह चाहती हैं कि समाज के पिछड़े वर्गों को वह तरक्की न मिल सके जिसका वी हकदार हैं. इस समस्या को व्यापक दृष्टि से देखने की जरूरत है. दोस्तों आरक्षित पदों की रिक्तियों पर समयानुसार भर्ती प्रक्रिया पूरी कर लेनी चाहिए. अधिक समय तक भर्ती को लम्बित रखना सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा. य़ह एक सच्चाई है कि कई सारे समुदाय आरक्षण की पात्रता रखते हुए भी इसके लाभ से पूरी तरह वंचित  हैं. न तो शैक्षणिक स्तर पर न ही नियोजन के स्तर पर उन्हें उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त है. इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए और सामाजिक न्याय को सभी तक पहुंचाने के लिए य़ह  अति आवश्यक है कि OBC के साथ-साथ SC , ST का एक उप- वर्गीकरण यानी Sub-Categorisation किया जाय . यही राय सुप्रीम कोर्ट की है. दोस्तों वस्तुस्थिति य़ह है कि OBC के साथ साथ SC और ST का एक बड़ा तबका आरक्षण के लाभ से पूरी तरह वंचित है. शिक्षा के स्तर पर उनकी स्थितियाँ और भी दयनीय है. वे मजदूरी के पेशे से बाहर आने में कदापि सक्षम नहीं हैं. आरक्षण की व्यवस्था ने OBC और अनुसूचित समाज के अन्दर ही उच्च जाति और निम्न जाति की दीवार खड़ी कर दी है. उनके अन्दर भी उसी भेदभाव को जन्म दे दिया है जिसको समाप्त करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की परिकल्पना की गयी थी. 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भारतीय न्याय संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023

  क्यों अंग्रेजों के जमाने के बनाए गए आपराधिक संहिता यानी क़ानूनों को संशोधित करने की जरूरत पडी . किन विषयों में परिवर्तन का लक्ष्य रखा गया है. सबसे मुख्य बात यह है कि किस तरह UAPA की आतंकवादी कार्यवाई की परिभाषा भारतीय न्याय संहिता 2023 की परिभाषा से अलग है.  केन्द्रीय गृहमंत्री ने   लोकसभा में तीन संशोधित बिलों को प्रस्तुत किया जो कि ब्रिटिश ज़माने के आपराधिक कानूनों यानी क्रिमिनल laws का स्थान लेंगे.दोनों सदनों से पारित होने के बाद इन बिलों को राष्ट्रपति की सहमति भी मिल गयी है इसी के साथ इन बिलों को अब कानून की हैसियत प्राप्त हो चुकी है. इसके पहले वाले version को जो अगस्त में प्रस्तुत हुआ था उसको वापस लेने के बाद य़ह संशोधित version प्रस्तुत किया गया है. अगस्त में प्रस्तुत बिल को 31 सदस्यों वाली संसद की स्टैंडिंग कमेटी को सौंपा गया था. तमाम विशेषज्ञों और दूसरे Stakeholders से सलाह मशविरे के बाद अंत में सात नवम्बर को इसे अंतिम रूप दिया गया. इंडियन पेनल कोड यानी IPC का स्थान लेगा भारतीय न्याय संहिता 2023. कोड ऑफ क्रिमिनल Procedures यानी CrPC का स्थान...

Article 17

 संविधान की धारा 17 के अन्दर अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया है यानी Abolition  of untouchability. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले आप से एक छोटी सी गुजारिश यदि आपने अभी तक मेरे चैनल को subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ इसको subscribe कर लीजिए और बेल icon को प्रेस कर दीजिए. आते हैं पॉइन्ट पर. दोस्तों संविधान का अनुच्छेद 17 कहता है कि Untouchability is abolished, and it's practice in any form is forbidden.The enforcement of any disability arising out of untouchability shall be an offence punishable in accordance with law.यानी अस्पृश्यता को समाप्त किया जाता है और किसी भी रूप मे इसका अभ्यास प्रतिबंधित है. अस्पृश्यता से उत्पन्न किसी भी प्रकार की अपंगता को थोपना विधि के अनुसार दण्डनीय होगा. दोस्तों, भारत के महान संविधान निर्माताओं द्वारा भारतीय समाज को अतार्किक,  परंपरागत अंधविश्वासों एवं अनुष्ठानिक मान्यताओं से मुक्त कराने की दूर दृष्टि को अभिव्यक्ति मिली भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के रूप में. संविधान निर्माताओं को य़ह स्पष्ट था कि देश के लोकतन्त्र और विधि के शासन की व्...

प्रोजेक्ट टाइगर

 भारत में चल रहे प्रोजेक्ट टाइगर ने 1973 में पहली बार देश के सामने टाइगर रिजर्व की अवधारणा को प्रस्तुत किया . कभी फॉरेस्ट अधिकारियों द्वारा  एक प्रशासनिक कदम से शुरुआत करने वाला टाइगर रिजर्व 2006 आते आते एक वैधानिक स्वरुप ले चुका था. आज भारत के बाघ संरक्षण योजना की पूरी दुनियाँ में सराहना हो रही है. बात करेंगे कि भारत में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत कब और कैसे हुई.1972 में देश के वन्यजीवों की सुरक्षा के मद्देनज़र एक नया कानून बनाया गया वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 यानी Wild Life Protection Act 1972 जिसके अंतर्गत Notified फॉरेस्ट एरिया में चिन्हित स्थानों पर नैशनल पार्क बनाए गए. यहाँ पर रह रहे वनवासियों के अधिकारों को समाप्त करके वे सारे अधिकार राज्य सरकारों को सौंप दिए गए. नए कानून के अंतर्गत कई वाइल्डलाइफ Sanctuaries भी बनाए गए जिसमें वनवासियों को कुछ सीमित अधिकारों का इस्तेमाल करने की इजाजत दी गयी. आज देश में बाघों की बढ़ती संख्या इस महान प्रयास का ही परिणाम है. इसी प्रयास का परिणाम है प्रोजेक्ट टाइगर. दोस्तों 1973 में करीब 1915 स्क्वेयर किलोमीटर एरिया में नौ टाइगर...