दोस्तों नमस्कार zedplus में आप का स्वागत है. आज बात करेंगे प्राचीन भारत के गौरव नालंदा विश्वविद्यालय की. कब हुई इसकी स्थापना, इसे किसने स्थापित किया , शिक्षा के क्षेत्र में इस बौद्ध विश्वविद्यालय के गौरवशाली योगदान की और अन्त में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न किसने नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट किया आक्रान्ता बख्तियार खिलजी ने या फिर कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले आप से एक छोटी सी गुजारिश यदि आपने अभी तक मेरे चैनल को subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ इसको subscribe कर लीजिए और बेल icon को प्रेस कर दीजिए. आते हैं पॉइन्ट पर. दोस्तों प्राचीन भारत के गौरव नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना पांचवीं शताब्दी में पूर्व मगध के शासक कुमार गुप्त के शासनकाल के दौरान हुई. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से 500 साल पहले स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय सम्भवतः पूरे विश्व का प्रथम इतना बृहत शिक्षा केंद्र था जहाँ दस हजार विद्यार्थी एक साथ रहकर बुद्धिवाद, तर्कशास्त्र, गणित, मेडिसन, और कई अन्य विषयों का अध्ययन करते थे. कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय के विशालकाय नौ मंजिला पुस्तकालय में 90 लाख से अधिक पुस्तकों और पांडुलिपियाँ का अद्वितीय संग्रह था. नालंदा विश्वविद्यालय के महत्त्त्ता पर प्रकाश डालते हुए तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने कहा था कि जो भी बौद्ध ज्ञान इस संसार में उपलब्ध है उसमें सबसे ब़ड़ा योगदान नालंदा बौद्ध विश्वविद्यालय का है. अपनी स्थापना से करीब 700 वर्षों तक नालंदा विश्वविद्यालय विश्व के महानतम शिक्षा केन्द्र के रूप में ज्ञान का प्रकाश vikherata रहा.
दोस्तों भारत के बिहार राज्य में स्थित नालंदा महा विहार के अन्दर पाँचवीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी के बीच के पुरातात्विक मठ और शैक्षणिक संस्थानों के अवशेष मिलते हैं. इसमें स्तूप, मंदिर और विहार शामिल हैं. भारत का य़ह प्राचीनतम विश्वविद्यालय करीब 700 वर्षों तक अनवरत पूरे विश्व में ज्ञान का प्रसार करता रहा. शिक्षा का य़ह महान केन्द्र बुद्धिवाद के एक धर्म के रूप में विकास और मठवास तथा शैक्षणिक परंपराओं के अबाध रूप से फलने-फूलने का साक्षी है. दोस्तों नालंदा महाविहार का पुरातात्विक स्थल और यहाँ की विकसित निर्माण योजना, स्थापत्य कला के साथ-साथ कलात्मक सिद्धान्तों को भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया की अनेक संस्थाओं द्वारा अपनाया गया. महा विहार के स्थापत्य कला के मानकीकरण एवं मंदिर रूपी चैत्यों के निर्माण अनवरत संरक्षण और आदान प्रदान का आभास देते हैं. Chatushkoniy मुक्त रूप से खड़े गांधार कालीन महाविहार क्रमांगत विकास के फलस्वरूप एक बृहत आवासीय शिक्षा केन्द्र के रूप में स्थापित हो गए जिन्होंने कालान्तर में दक्षिण एशिया के तमाम मठवासी शहरों जैसे पहाड़पूर ,विक्रमशीला , अदान्ता पुरी ,और Jagaddalla को प्रेरित और प्रभावित किया. अनोखे स्वरुप के चैत्ययों के अभ्युदय ने पारंपरिक शैली के स्तूपों का स्थान लेना प्रारंभ कर दिया और बौद्ध मंदिरों को प्रेरित और प्रभावित किया. दोस्तों करीब 700 वर्षों तक विश्व में ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले नालंदा विश्वविद्यालय में दस हजार विद्यार्थि और दो हजार शिक्षक थे. यहाँ चीन कोरिया, जापान, तिब्बत, मंगोलिया, श्रीलंका एवं दक्षिण पूर्व एशिया के अनेक देशों से विद्यार्थि आया करते थे. इन विद्यार्थियों ने बहुत ही गहराई से नालंदा विश्वविद्यालय के वातावरण, स्थापत्य कला, शिक्षा के साथ साथ यहां के शिक्षकों के विस्तृत ज्ञान के बारे में अनेक स्थानों पर चर्चा की है. दोस्तों नालंदा विश्वविद्यालय के ख्याति के बारे में चीन के यात्री Hwensong ने बहुत ही विस्तार से लिखा है. कहा जाता है वापस लौटते समय Hwensong सैकड़ों पुस्तकें और पांडुलिपियाँ अपने साथ चीन ले आए और उनमें से बहुतों का अनुवाद चीनी भाषा में किया. चीनी यात्रियों के उल्लेख में मिलता है कि एक विशाल दीवार से घिरे नालंदा विश्वविद्यालय में तीन सौ कमरे, सात बड़े कक्ष और अध्ययन के लिए नौ मंजिला पुस्तकालय था जिसमें 90 लाख किताबें थीं. य़ह थोड़ी अतिश्योक्ति हो सकती है. खुदाई में तेरह मठों के मिलने का भी उल्लेख है पर अभी और मठों के मिलने की पूरी संभावना है. कुछ मठ एक मंजिला और कुछ के एक से अधिक मंजिल के होने के प्रमाण मिले हैं. एक प्रमुख आचार्य पूरे विश्वविद्यालय का प्रबंधन देखते थे. शासकों के अनुदान एवं करीब 200 गाँवों से प्राप्त आय से नालंदा विश्वविद्यालय का प्रबंधन होता था जिसमें विद्यार्थियों के लिए भोजन, कपड़े एवं आवास शामिल हैं. चीनी यात्री Hwensong के अनुसार शीलभद्र, चंद्रपाल, गुणमति, और स्थिरमति नालंदा विश्वविद्यालय के प्रमुख आचार्यों में शामिल थे. मौखिक व्याख्यान के माध्यम से आचार्य छात्रों को ज्ञान देते थे. शास्त्रार्थ के माध्यम से भी विद्यार्थियों का शंका समाधान किया जाता था. Hwensong के अनुसार कठिन प्रवेश प्रक्रिया के माध्यम से ही विद्यार्थियों को प्रवेश मिलता था. दोस्तों नालंदा विश्वविद्यालय में भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद पर व्यापक पठन पाठन और शोध होता था .उल्लेखनीय बात यह है कि आयुर्वेद के एक प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति के रूप में दूसरे देशों में पहचान मिलने में नालंदा विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का बहुत बड़ा योगदान है. दोस्तों बाहर से किले जैसा दिखने वाला नालंदा विश्वविद्यालय का परिसर प्रार्थना कक्षों, और व्याख्यान कक्षों से घिरा हुआ है. यहाँ की स्थापत्य कला को विश्व के अनेक देशों में अपनाया गया. यहाँ की प्लास्टर तकनीकी और धातु तकनीकी को भी अनेक देशों में अपनाया गया विशेष रूप से दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में. गणित और खगोल विज्ञान में नालंदा विश्वविद्यालय की उपलब्धियां समकालीन विश्व में अद्वितीय हैं. कहा जाता है भारत में गणित के जनक और शून्य की खोज करने वाले महान गणितज्ञ आर्यभट्ट छठी शताब्दी के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय के प्रमुख आचार्य रहे. नालंदा विश्वविद्यालय समय समय पर अपने प्राचार्यों एवं विद्यार्थियों को बौद्ध शिक्षा एवं बौद्ध दर्शन का प्रचार प्रसार करने के लिए चीन, श्रीलंका कोरिया, इंडोनेशिया, जापान जैसे देशों में भेजा करती थी. यही कारण था कि बौद्ध धर्म का प्रचार दुनियाँ के कई देशों में हुआ. कई देशों में बौद्ध धर्म स्थापित हुआ. गुप्त वंश के पतन के बाद नालंदा विश्वविद्यालय को कन्नौज के शासक हर्षवर्धन और पाल वंश के शासकों के अलावा अनेक विदेशी शासकों द्वारा भी अनुदान मिलता रहा.कई सारे प्रमाण इस बात की पुष्टि करते हैं कि धीरे-धीरे नालंदा महा विहार को हिन्दू राजाओं द्वारा मिलने वाला शाही संरक्षण समाप्त होता गया जिससे विश्वविद्यालय का आर्थिक ढ़ांचा चरमरा गया परिणामस्वरुप इसका संचालन कठिन हो गया. दोस्तों गुप्त काल में हिन्दुत्व के पुनरूत्थान से देश में धार्मिक संघर्ष अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया. कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म के प्रभाव को समाप्त करने के लिए वह सबकुछ किया जो करना सम्भव था यानी हिंसा और अहिंसा दोनों माध्यमों से बौद्ध धर्म को पूरी तरह से नेस्तनाबूद करने के लिए विध्वंसकारी प्रयास किए गये. नष्ट होने के बाद नालंदा विश्वविद्यालय धीरे-धीरे लोंगों के स्मृति पटल से गायब हो गया और करीब छह सौ वर्षों तक जमीन के अन्दर दबा रहा . 1812 में स्कॉटलैंड के एक सर्वेयर फ्रांसिस बुकानन Hamilton की नज़र में य़ह ऐतिहासिक स्थल आया और 1861 में सर अलेक्जेंडर Kaningham ने इस पुरातात्विक धरोहर की नालंदा विश्वविद्यालय के रूप में पहचान की. दोस्तों अब आते हैं मुख्य प्रश्न पर कि विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय को किसने नष्ट किया. वह कौन सी शक्तियाँ थीं जो शिक्षा के महान केन्द्र को जड़ समेत समाप्त कर देना चाहती थीं. वह कौन सी विचारधारा थी जिसे बौद्ध वाद से खतरा महसूस हो रहा था.दोस्तों जाने माने इतिहासकार DN झा साहब स्पष्ट कहते हैं कि कट्टरपंथी ब्राह्मणों में बौद्धों और जैनियों के प्रति तीव्र घृणा के भाव थे. DN झा साहब लिखते हैं कि प्राचीन भारत में धार्मिक हिंसा के बड़े पैमाने पर होने के प्रमाण मिलते हैं. सातवीं शताब्दी में राजा शशांक ने उस बोधि वृक्ष को काट दिया जिसके नीचे बैठकर भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था. यही नहीं राजा शशांक ने बुद्ध की प्रतिमा को हटाकर उस स्थान पर शिव की प्रतिमा स्थापित कर दी. दोस्तों 185 BC में पुष्य मित्र शुंग ने मौर्य वंश के अन्तिम शासक बृह drath की हत्या करके स्वयम को राजा घोषित कर दिया. पुष्य मित्र शुंग मौर्य साम्राज्य का सेनापति था और एक कट्टरपंथी ब्राह्मण था जो मौर्य शासकों द्वारा बौद्ध धर्म के संरक्षण एवं पोषण से अत्यधिक नाराज था. पुष्य मित्र ने सम्राट अशोक द्वारा निर्मित तमाम बौद्ध भवनों को नष्ट कर दिया. कहा जाता है कि पुष्य मित्र सुंग ने हजारों बौद्ध मठों और विहारों को नेस्तनाबूद कर दिया. यहाँ तक कि विश्व प्रसिद्ध सांची के स्तूप को भारी नुकसान पहुँचाया. पुष्य मित्र सुंग ने कौशांबी स्थिति Ghoshita ram मठ को आग लगाकर जला डाला और बड़ी निर्दयता पूर्वक बौद्ध भिक्षुओं की हत्या कर दी. संस्कृत की जानी-मानी पुस्तक दिव्य वदान में पुष्य मित्र सुंग को अत्यंत क्रूर और अत्याचारी बताया गया है. दोस्तों कई स्थानों पर बौद्ध स्थलों पर कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने बल पूर्वक अधिकार कर लिया और बौद्ध भिक्षुओं की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है वाराणसी स्थित सारनाथ जहाँ भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था. गुप्त काल के दौरान अशोका स्तूप को नष्ट करके उसके ऊपर मन्दिर बनाया गया. श्रावस्ती के एक बौद्ध मठ को उजाड़कर वहां मन्दिर जी स्थापना की गयी. मथुरा में जहाँ Bhuteshwar और Gokarneshwar मन्दिर स्थित हैं वहाँ कभी बौद्ध मठ और विहार थे जिन्हें प्रथम शताब्दी के दौरान नष्ट कर दिया गया. दोस्तों Rajtarangini के रचयिता Kalhan के अनुसार शैव राजा Jalauka ने बड़े स्तर पर बौद्ध मठों और विहार ओं को नष्ट कर दिया और बड़ी ही बेरहमी से बौद्ध भिक्षुओं की हत्याएँ की. दशवीं शताब्दी में राजा क्षेम गुप्त ने बौद्ध मठों को ध्वस्त करके क्षेम Gaurishwar मन्दिर का निर्माण किया. दोस्तों संस्कृत के महान Vyakaranacharya पतंजलि ने अपने कृति महाभाष्य में अत्यंत प्रमुखता के साथ प्रकाश डालते हुए लिखा कि कट्टरपंथी ब्राह्मणों और बौद्धों, जैनियों में नेवले और साँप की तरह दुश्मनी थी. महान इतिहासकार DN jha साहब ने विशेष उल्लेख किया है कि Vaishnav संत Tirumankai ने Nagpattanm के एक स्तूप से गौतम बुद्ध की सोने से बनी हुई एक बड़ी सी प्रतिमा को चुरा लिया फिर उसे पिघला कर विष्णु मंदिर में मूर्ति स्थापित की . राजा हर्षवर्धन ने कन्नौज में गंगा किनारे एक विशाल धर्म समागम का आयोजन किया जिसका उद्देश्य था महायान बौद्ध वाद की शिक्षाओं से लोंगों को अवगत कराना. यहां पर चीनी यात्री Hwensong भी एक सम्मानित अतिथि थे. समागम में तमाम राजे maharaje, अनेक धर्मो के लोग यानी बड़ी संख्या में ब्राह्मण, जैन और हीनयान बौद्ध वाद और महायान बौद्ध वाद के लोग जुटे. पहले तो कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने Hwensong की हत्या की कोशिश की पर सफल नहीं हुए और इसकी भनक राजा हर्षवर्धन को लग गयी पर उन्होंने कट्टरपंथियों को चेतावनी देकर छोड़ दिया. फिर कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने स्वयं राजा हर्षवर्धन की हत्या की साज़िश रची और धर्म समागम में आग लगा दी गई. अफरा-तफरी में एक व्यक्ति राजा हर्षवर्धन की ओर कटार लेकर दौड़ा पर पकड़ लिया गया. कट्टरपंथी ब्राह्मणों के इस दुस्साहस पर राजा हर्षवर्धन बड़ा क्रुद्ध हुआ और उसने कई कट्टरपंथी ब्राह्मणों को मौत के घाट उतार दिया. दोस्तों य़ह कुछ थोड़े से उदाहरण महान इतिहासकार DN Jha की शोध और कई अन्य श्रोतों
से लिए गए हैं जो य़ह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं कि प्राचीन भारत में बड़े स्तर पर बौद्ध धार्मिक स्थलों को नष्ट किया गया,बौद्ध भिक्षुओं की हत्याएँ की गयी और उनकी पुस्तकों व पांडुलिपियों को जलाकर खत्म कर दिया गया है. नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट करने और वहाँ के पुस्तकालय के 90 लाख से भी अधिक पुस्तकों और पांडुलिपियों को आग के हवाले करने का जो आरोप कट्टरपंथी ब्राह्मणों पर लगाया जाता है उसका आधार य़ह है कि ऐसी हिंसक घटनायें प्राचीन भारत में आम थीं. बड़े पैमाने पर बौद्ध स्थलों, बौद्ध विहारों, बौद्ध पांडुलिपियों को नष्ट कर दिया गया और बड़ी ही निर्दयता पूर्वक बौद्ध भिक्षुओं की हत्याएँ की गयीं. विश्व प्रसिद्ध और बौद्ध ज्ञान का महानतम केन्द्र नालंदा विश्वविद्यालय को कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने नष्ट किया था, य़ह बिलकुल सम्भव है.दोस्तों नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट करने के प्रयास तीन बार हुए. पहली बार राजा मिहिर कुल के नेतृत्व में हूणों का हमला हुआ. गौण शासकों द्वारा नालंदा महा विहार पर सातवीं शताब्दी में हमला दूसरा हमला था .तीसरा तथाकथित यानी मनगढंत और सबसे विनाशकारी हमला किया तुर्क बख्तियार खिलजी ने 1193 के दौरान जिसमें नालंदा महा विहार पूरी तरह से तहस-नहस हो गया. आग इतनी भयानक तरीके से लगाई गई थी कि लाखों पुस्तकों और पांडुलिपियों से समृद्ध नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय तीन महीने तक जलता रहा. बौद्ध भिक्षुओं और विद्यार्थियों को निर्दयता पूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया. सारा महा विहार खण्डहर में परिवर्तित हो गया. दोस्तों नालंदा विश्वविद्यालय पाँचवीं शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी तक विश्व में ज्ञान का सबसे बड़ा केन्द्र बना रहा. जहाँ तक मुस्लिम आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय पर हमला कर के जला देने की बात है तो ध्यान देने की बात य़ह है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. मुस्लिम आक्रमणकारी मूलतः लुटेरे होते थे और धन संपदा यानी सोना चांदी लूटकर वापस चले जाते थे. वे किसी भी स्थल का नामोनिशान मिटा देने का प्रयास नहीं करते थे. सोम नाथ मन्दिर को पहली बार महमूद गज़नी ने 1025 में लूटा. 1299 में अलाउद्दीन खिलजी ने सोम नाथ मन्दिर को तहस नहस कर दिया. इस मन्दिर का पुनर्निर्माण हुआ पर 1395 में गुजरात के मुस्लिम गवर्नर ने इसे बुरी तरह नष्ट कर दिया. मन्दिर का पुनः जीर्णोद्धार किया गया. 1665 में बादशाह औरंगजेब ने सोम नाथ मन्दिर को भारी क्षति पहुंचायी पर मन्दिर तो आज भी खड़ा है. 1528 में अयोध्या में राम मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गयी फिर भी मन्दिर का अस्तित्व खत्म नहीं हुआ. वैसे तो औरंगजेब ने अनेक मन्दिरों को नष्ट कर दिया था पर सबसे प्रमुख था वाराणसी स्थित विश्वनाथ मन्दिर जिसको 1669 में औरंगजेब के आदेश पर तोड़कर नष्ट कर दिया गया और उसके स्थान पर ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई पर विश्वनाथ मंदिर तो आज भी मौजूद है. दोस्तों तात्पर्य य़ह है कि मुस्लिम आक्रमणकारियों मुख्य उद्देश्य था लूट-पाट यानी सोना चांदी हीरा जवाहरात लूटना और चले जाना. पुस्तकों और पांडुलिपियों को नष्ट करके उनको क्या मिलता. वे पढ़े लिखे भी नहीं थे जो बौद्ध पांडुलिपियों को समझ पाते. वे तो लुटेरे थे उन्हें क्या लेना-देना था शिक्षा और ज्ञान से संबंधित वस्तुओं से. दोस्तों जहाँ तक बख्तियार खिलजी के नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट करने का विषय है तो यहाँ य़ह समझना जरूरी है कि बख्तियार खिलजी का रास्ता था अयोध्या से बंगाल. रास्ते में उसने लूट-पाट की, लोंगों की हत्याएँ कीं. यहाँ तक कि उसने किला ए बिहार को भी लूटा पर नालंदा कहीं से भी उसके रास्ते पर नहीं था और उसके पास कोई वजह नहीं थी नालंदा विश्वविद्यालय को लूटने और नष्ट करने की. समकालीन इतिहास में कहीं भी बख्तियार खिलजी द्वारा नालंदा महा विहार को नष्ट किए जाने का उल्लेख नहीं मिलता. Minhaj A सिराज ने अपनी मशहूर किताब Tabakat A Nasiri में कहीं भी इस घटना का उल्लेख नहीं किया है. धर्मा स्वामी और Sumpa नाम के दो तिब्बती विद्वानों ने जिन्होंने बौद्ध धर्म पर भारत के इतिहास का गहन अध्ययन किया है लेकिन उन्होंने कहीं भी अपनी किताबों में बख्तियार खिलजी नामक आक्रमणकारी द्वारा नालंदा महाविहार पर हमले और इसे जलाकर नष्ट किए जाने की किसी घटना का उल्लेख नहीं किया है. बौद्ध धर्म और बौद्ध विचारधारा पर एक और तिब्बती विद्वान तारा नाथ ने भी बख्तियार खिलजी नाम के लुटेरे द्वारा नालंदा महा विहार को लूटकर जला दिए किसी भी घटना का उल्लेख नहीं किया है. आश्चर्य की बात य़ह है कि अजंता allora और सांची के स्तूप जैसे प्रसिद्ध बौद्ध स्थल कभी भी विदेशी आक्रमणकारियों के निशाने पर नहीं रहे. जाने माने भारतीय इतिहासकार जादू नाथ सरकार और RC मजुमदार ने भी कहीं भी बख्तियार खिलजी द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय को लुटे जाने और जलाकर नष्ट किए जाने की घटना का उल्लेख नहीं किया है. दोस्तों तरह-तरह की कहानियाँ बनाई गयीं ताकि हिन्दू समाज के हिंसक चेहरे पर पर्दा डाला जा सके. दोस्तों सच्चाई तो य़ह है कि य़ह वह काल था जब ब्राह्मणवाद का पुनरुत्थान हो रहा था और बौद्ध धर्म पर हमले प्रारम्भ हो गए थे. सम्राट अशोक के शासन काल के दौरान भारत में बौद्ध धर्म का व्यापक विस्तार हुआ परिणामस्वरुप सामाजिक समानता की भावना को प्रबलता मिली और हिन्दू कर्म कांडों में लोंगों की आस्था कमजोर हुई और उसमें गिरावट आने लगी जिसका सीधा प्रभाव मन्दिरों में आने वाले चढ़ावा पर पड़ा यानी पुजारियों और मन्दिरों की कमाई कम हुई. कट्टरपंथी ब्राह्मण बौद्ध धर्म से बुरी तरह नाराज थे साथ में उनके अन्दर
भारत में बौद्ध धर्म के प्रसार का भय व्याप्त हो गया था. यही कारण था कि सम्राट अशोक के पौत्र Brihdrath को उसके ही सेनापति पुष्य मित्र सुंग ने उसकी हत्या कर दी और उसके स्थान पर स्वयम राजा बन गया. पुष्य मित्र सुंग एक कट्टरपंथी ब्राह्मण था और उसने राजा बनते ही बड़े पैमाने पर बौद्ध स्थलों, बौद्ध विहारों एवं मठों को नष्ट करने के साथ साथ बौद्ध भिक्षुओं की हत्याएँ की. जितने भी विश्वस्त श्रोत हैं उनके अनुसार कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने बदले की भावना से नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट किया तथा लाखों पुस्तकों और पांडुलिपियों के विशाल संग्रह को जलाकर नष्ट कर दिया ताकि वैचारिक स्तर पर ब्राह्मण व्यवस्था को चुनौती न दी जा सके. तीन महीनों तक पुस्तकालय का जलते रहना य़ह सिद्ध करता है कि आग एक बार नहीं बार बार लगाई गयी ताकि बौद्ध धर्म के बौद्धिक आधार को ही सम्पूर्णतया समाप्त किया जा सके.तमाम विद्वानों का मानना है कि बख्तियार खिलजी की कहानी को गढ़ा गया ताकि भारत में बौद्ध धर्म और बौद्ध विचारधारा के क्रूरतापूर्ण दमन की कहानी पर पर्दा डाला जा सके. इसके लिए मनगढंत और हास्यास्पद कहानियों का सहारा लिया गया. जैसे एक अपने अभियान के दौरान बख्तियार खिलजी गम्भीर रूप से बीमार पड़ गया और किसी दवा से कोई लाभ नहीं हुआ तब एक बौद्ध भिक्षु की दवा से उसकी जान बच गयी पर वह इस बार पर नाराज हो गया कि भिक्षुओं के पास उसके हाकिमों से ज्यादा ज्ञान कैसे है इसलिए क्रुद्ध होकर उसने नालंदा पुस्तकालय में आग लगा दी. दुसरी कहानी य़ह है कि बौद्ध धर्म के विस्तार को उसने इस्लाम के विरुद्ध माना इसलिए नालंदा विश्वविद्यालय में आग लगा दी और बौद्ध भिक्षुओं का संहार करा दिया. इस तरह की हास्यास्पद कहानियाँ गढ़ी गयीं ताकि हत्या और दमन के काले कारनामों पर पर्दा डाला जा सके. दोस्तों मैंने कोशिश की है तर्क और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर विश्व प्रसिद्ध नालंदा महा विहार के विध्वंस के पीछे की सच्चाई तक पहुँचने की. हर समाज में कुछ ही कट्टरपंथी होते हैं और वे समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते. प्रगति शील manovichar के लोंगों की संख्या अधिक होती है पर वे उतने मुखर नहीं होते. चलते चलते एक प्रश्न जब बौद्ध धर्म भारत में पैदा हुआ और यहीं से निकलकर चीन श्रीलंका कोरिया जापान जैसे अनेक देशों में फैला और आज भी फल फूल रहा है तब य़ह बौद्ध धर्म भारत में ही कैसे खत्म हो गया.
मिलते हैं next वीडियो में. मेरे चैनल को subscribe करेंगे तो मुझे आपका support मिलेगा. नमस्कार धन्यवाद
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें