भारत के संविधान में प्रदत्त अल्पसंख्यकों के विशेष अधिकारों की. किस तरह से धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों को विशेष संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से सुरक्षा प्रदान की गयी है. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले आप से एक छोटी सी गुजारिश यदि आपने अभी तक मेरे चैनल को subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ इसको subscribe कर लीजिए और बेल icon को प्रेस कर दीजिए. आते हैं पॉइन्ट पर. दोस्तों सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में समानता और न्याय के दो आदर्श भारतीय संविधान के आधार स्तम्भ हैं. भारत का संविधान धर्म जाति जन्मस्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को प्रतिबन्धित करता है. यही कारण था कि भारत के संविधान में साम्प्रदायिकता के आधार पर किसी भी प्रकार के प्रतिनिधित्व को स्थान नहीं दिया गया फिर चाहे वह विधायिका हो या कार्यपालिका. दोस्तों समता और न्याय के संवैधानिक शब्द कहीं खोखले नारे साबित न हों इसलिए ऐसे प्रावधान बनाए गए जो वास्तव में समाज के सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोंगों के उत्थान की दिशा में ठोस कदम साबित हों. जब तक सामाजिक Samatalikaran की दिशा में ठोस प्रयास नहीं किए जाएंगे तब तक देश का लोकतांत्रिक सफर सिर्फ अधूरा ही नहीं बल्कि अर्थहीन होगा. इन बातों को ध्यान में रखकर भारत के संविधान में कुछ स्थायी और कुछ अस्थायी प्रावधान किए गए हैं ताकि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोंगों को राष्ट्र के शेष लोंगों के साथ बराबरी के स्तर पर खड़ा किया जा सके.इसके साथ ही कुछ ऐसे प्रावधान भी बनाए गए हैं जो संख्यात्मक दृष्टि से अल्पसंख्यकों के साँस्कृतिक, भाषाई एवं अन्य अधिकारों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान कर सके. ऐसे कई संवैधानिक रक्षा कवच यानी Safeguards के प्रावधान किए गए हैं जिससे बहुसंख्यक समुदाय संवैधानिक व्यवस्था का दुरुपयोग करके अल्पसंख्यक अधिकारों का दमन न कर सके. दोस्तों कई बार कई प्रबुद्ध अल्पसंख्यक नेताओं द्वारा आशंका व्यक्त की गयी थी कि स्वतन्त्र भारत में अल्पसंख्यकों को शायद वह आनुपातिक प्रतिनिधित्व न प्राप्त हो सके जिसका उन्हें अधिकार है. पर यदि पिछले 75 वर्षों के इतिहास पर दृष्टि डाली जाय तो स्पष्ट हो जायेगा कि साधारण प्रतिनिधित्व तो छोड़िए अल्पसंख्यक समुदाय से देश के सर्वोच्च पद जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, जज, मंत्री ,राजदूत और तमाम अन्य वरिष्ठ पदों पर नियुक्त हुए हैं. य़ह भारत के लोकतांत्रिक व्यवस्था की विशेष विशेषता है जिसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इस तरह की आशंकाएँ निर्मूल साबित हुई हैं कि स्वतन्त्र भारत में अल्पसंख्यकों को वह अधिकार नहीं मिल पाएगा जिसके वे अधिकारी हैं. दोस्तों भारतीय संविधान सभी तरह के अल्पसंख्यकों चाहे धार्मिक अल्पसंख्यक हों, भाषाई अल्पसंख्यक हों या साँस्कृतिक अल्पसंख्यक हों, सभी के धार्मिक साँस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकारों के रक्षा कवच यानी Safeguards के प्रावधान संविधान में किए गए हैं. इनमें कुछ तो संविधान में स्थायी व्यवस्था के रूप में उपलब्ध हैं वहीँ कुछ प्रावधान अस्थायी व्यवस्था के रूप में उपलब्ध हैं और वे तभी तक प्रभावकारी रहेंगे जब तक समाज के पिछड़े वर्गों के लोग शेष समाज के साथ बराबरी से न खड़े हो जाएं. दोस्तों जहाँ तक संविधान के अन्दर अल्पसंख्यकों के स्थायी अधिकारों की बात है देखा जाय तो हर व्यक्ति को उपलब्ध धार्मिक अधिकार समान ही हैं और वे सभी को समान रूप से उपलब्ध हैं इसमें अल्पसंख्यकों के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं है. भारत का संविधान एक धर्म निरपेक्ष संविधान है और वह किसी धर्म विशेष के उत्थान के लिए कार्य नहीं कर सकता. दोस्तों यदि भारतीय समाज के किसी वर्ग की अपनी अलग भाषा, लिपि या संस्कृति है तो उस वर्ग के लोगों का Article 29(1) के अन्तर्गत उसे संरक्षित रखने का
मौलिक अधिकार है . इसका अर्थ य़ह हुआ कि यदि कोई साँस्कृतिक और भाषाई अल्पसंख्यक अपनी भाषा और संस्कृति को संरक्षित करना चाहता है तो राज्य को य़ह अधिकार नहीं होगा कि वह कानून बनाकर उसके ऊपर कोई भाषा और संस्कृति थोपे. मतलब बहुत साफ़ है कि बहुमत की भाषा और संस्कृति को अल्पसंख्यकों के ऊपर थोपा नहीं जा सकता. यदि ऐसा कोई कानून बनाया जाता है तो वह असंवैधानिक होगा. संविधान का Article 29(A) न सिर्फ धार्मिक अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करता है बल्कि भाषाई अल्पसंख्यकों को भी वही सुरक्षा प्रदान करता है. हिन्दी भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में बढ़ावा देना या अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का प्रयोग अल्पसंख्यकों को उनके भाषाई सुरक्षा से बंचित नहीं कर सकता अनुच्छेद 29 ,30.दोस्तों संविधान सभी प्रान्तीय सरकारों को निर्देश देता है कि अल्पसंख्यक बच्चों को उनकी मातृभाषा में ही प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए उपयुक्त सुविधाएँ उपलब्ध कराएँ. भारत का संविधान Article 350 A के अंतर्गत राष्ट्रपति को य़ह शक्ति प्रदान करता है कि वह प्रान्तीय सरकारों को इस सम्बन्ध में उचित दिशानिर्देश जारी करें. यही नहीं संविधान के Article 350B के अंतर्गत राष्ट्रपति एक विशेष अधिकारी नियुक्त कर सकते हैं जो भारतीय भाषाई अल्पसंख्यकों को प्रदत्त संवैधानिक सुरक्षा के मामलों की जांच करेंगे और राष्ट्रपति को अवगत कराएंगे. इसके अलावा संसद 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम पारित किया ताकि संघ और राज्यों के कानूनों में संविधान द्वारा प्रदत्त सुरक्षा पर नजर रखी जा सके. दोस्तों संविधान के Article 29(2) के अन्तर्गत किसी भी नागरिक को सरकार द्वारा संचालित या सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थान में धर्म, नस्ल, जाति, भाषा या इनमें से किसी के भी आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता. इसका सीधा अर्थ य़ह है कि किसी के साथ भी धर्म नस्ल जाति भाषा इत्यादि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता विशेष तौर संघ सरकार द्वारा नियंत्रित और सहायताप्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के विषय पर. दोस्तों संविधान का Article 30(1) सभी प्रकार के अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थाएं खोलने और उनके संचालन का मौलिक अधिकार देता है. संविधान का Article 29(1) अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा एवं लिपि को संरक्षित करने का मौलिक अधिकार देता है. अल्पसंख्यकों को उनकी पसन्द के अलावा दूसरे शैक्षणिक संस्थानों में जाने के लिए मज़बूर नहीं किया जा सकता. दोस्तों संविधान के 44वें संशोधन 1978 के माध्यम से Article 31 यानी सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया पर अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित शिक्षण संस्थाओं के पक्ष में विशेष व्यवस्था दी गई. जहाँ एक तरफ बहुमत समाज द्वारा नियंत्रित या संचालित किसी सम्पत्ति या शिक्षण संस्था का सरकार द्वारा अधिग्रहण किए जाने की स्थिति में उनके पास उचित मुआवजा पाने का कोई मौलिक अधिकार नहीं होगा वहीँ पर अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा स्थापित शिक्षा संस्थान का अधिग्रहण बिना उचित मुआवजा के नहीं हो सकता. संविधान के Article 30(1A) के अनुसार सरकारी मुआवजा इतना पर्याप्त होना चाहिए ताकि अल्पसंख्यकों के अस्तित्व के अधिकार को किसी भी प्रकार की हानि न हो. दोस्तों संविधान के Article 30(2) के अनुसार शैक्षणिक संस्थाओं को सरकारी सहायता प्रदान करने के विषय पर धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं के प्रति कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने समय समय पर अपने निर्णयों के माध्यम से अनेक बिन्दुओं को स्पष्ट किया है.जैसे सभी प्रकार के अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने के अधिकार के साथ-साथ अपने समुदाय के बच्चों को अपनी भाषा में शिक्षा प्रदान करने का अधिकार है. दोस्तों हालांकि देश की राष्ट्रीय भाषा हिंदी है और संविधान के Article 351 के अन्तर्गत राज्यों को हिन्दी भाषा को बढ़ावा देने का निर्देश है फिर भी इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जा सकता जिससे संविधान के Article 29 और 30 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो. दोस्तों संविधान के Article 45 में प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाए जाने की बात की गयी है परन्तु इसका अर्थ य़ह नहीं हुआ कि प्राथमिक शिक्षा सिर्फ सरकार द्वारा नियंत्रित, सहायता प्राप्त, या मान्यता प्राप्त स्कूलों द्वारा ही प्रदान किया जायेगा. ऐसा करना भाषाई अल्पसंख्यकों के उस मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा जिसके अन्तर्गत उन्हें अपने समुदाय द्वारा संचालित स्कूलों में जाने का मौलिक अधिकार है. दोस्तों शिक्षण संस्थाओं को सरकारी सहायता प्राप्त करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है मतलब शिक्षण संस्थाएं सरकारी सहायता प्राप्त करने का दावा नहीं कर सकतीं. चूंकि सरकारें तमाम शिक्षण संस्थाओं को सहायता प्रदान करती हैं और समय-समय पर कुछ शर्तें भी लागू करती हैं पर सरकारी शर्तें ऐसी नहीं होनी चाहिए जो व्यवहारिक रूप से धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को Article 30(1)के अन्तर्गत प्राप्त मौलिक अधिकारों से वंचित कर दे. मौलिक अधिकारों से समझौता करके सरकारी सहायता प्राप्त करना किसी भी प्रकार उचित नहीं होगा. दोस्तों प्रत्येक भाषा और धार्मिक समुदाय को शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने और उन्हें संचालित करने का संवैधानिक अधिकार है पर सरकार द्वारा प्रदत्त मान्यता प्राप्त करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है. सरकार मान्यता प्रदान करने के एवज में कुछ शर्तें लागू कर सकती है जैसे अध्यापकों की योग्यता, पाठ्यक्रम इत्यादी पर ऐसी शर्ते नहीं थोपी जा सकतीं जिसके परिणामस्वरूप Article 30(1) में प्रदत्त मौलिक अधिकारों से अल्पसंख्यक समुदाय वंचित हो जाय. Article 30(1) के अन्तर्गत शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने का अधिकार उतना प्रभावी नहीं होगा यदि सरकार द्वारा ऐसे शिक्षण संस्थाओं को मान्यता प्रदान न किया जाए. सरकार तर्कसंगत शर्तें लागू कर सकती है पर ऐसी शर्तें नहीं लागू कर सकती जिससे शिक्षण संस्थाओं का संचालन ही कठिन हो जाय उदाहरण के लिए मान्यता प्रदान करने के एवज में सरकार शर्त लगाती है कि संस्था विद्यार्थियों से कोई फीस नहीं लेगी. अब प्रश्न उठता है कि यदि संस्था फीस नहीं लेगी तो संस्था चलेगी कैसे. इस वित्तीय हानि की भरपाई कैसे होगी. तात्पर्य य़ह है कि सरकार कोई ऐसी शर्त नहीं लागू कर सकती जिससे Article 30(1) के अंतर्गत प्रदत्त मौलिक अधिकता अर्थहीन हो जाएं. हाँ यहां य़ह स्पष्ट करना जरूरी है कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान राज्य सरकार के शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अधीन हैं ताकि अध्ययन अध्यापन का समुचित स्तर बना रहे. दोस्तों संविधान के Article 16(2) के अन्तर्गत सरकारी नियोजन में धर्म नस्ल और जाति के आधार पर किसी भी व्यक्ति के साथ कोई भेदभाव नहीं हो सकता. दोस्तों अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों पर मैंने विस्तार से चर्चा की ताकि आपको य़ह टॉपिक स्पष्ट हो जाय. मिलते हैं next वीडियो में किसी और टॉपिक पर. मेरे चैनल को subscribe करेंगे तो मुझे आपका support मिलेगा.नमस्कार धन्यवाद
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