आज का टॉपिक है संविधान के अनुच्छेद 368 की जो संसद को संविधान संशोधन का अधिकार देता है. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले आप से एक छोटी सी गुजारिश यदि आपने अभी तक मेरे चैनल को subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ इसको subscribe कर लीजिए और बेल icon को प्रेस कर दीजिए. आते हैं पॉइन्ट पर. दोस्तों संविधान संशोधन पर चर्चा के दौरान संविधान सभा में प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा था कि संविधान इतना कठोर नहीं होना चाहिए कि राष्ट्रीय विकास और परिवर्तनशील आवश्यकताओं का समायोजन न कर सके. डॉ अम्बेडकर ने कहा कि जो लोग संविधान से सन्तुष्ट नहीं हैं उन्हें सिर्फ दो तिहाई बहुमत हासिल करना है और यदि वे देश की संसद में दो तिहाई बहुमत नहीं प्राप्त कर सकते तो इसका मतलब साफ़ है कि देश की जनता उनके इरादों में उनके साथ नहीं है. दोस्तों आम तौर पर संघीय व्यवस्था में संविधान संशोधन की जिम्मेदारी किसी विशेष संस्था को दी जाती है न कि संसद को या संविधान संशोधन के लिए एक कठिन प्रक्रिया का पालन करना होता है ताकि संघीय संसद की इच्छानुसार संघ और राज्यों के बीच सम्बन्ध प्रभावित न हों. दोस्तों भारत के संविधान निर्माता संसद की सर्वोच्चता को स्थापित करने के पक्ष में थे ताकि राष्ट्र त्वरित प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सके. इसलिए उन्होंने उन प्रावधानों के संशोधन के लिए सरल माध्यम चुना जो देश के संघीय व्यवस्था को प्रभावित न करते हों. इसके लिए दो तरह की व्यवस्था की गयी, प्रथम संविधान के प्रावधानों का परिवर्तन संविधान संशोधन नहीं समझा जायेगा और इन संवैधानिक परिवर्तनों को संघीय विधायिका यानी संसद साधारण बहुमत या साधारण विधायी प्रक्रिया के अन्तर्गत कर सकती है. दूसरा संविधान के कई दूसरे प्रावधानों के परिवर्तन के लिए संविधान की धारा 368 के अन्तर्गत प्रदत्त संविधान संशोधन की प्रक्रिया का पालन करना होगा. परन्तु कुछ मामलों में संविधान संशोधन की प्रक्रिया उन प्रावधानों की प्रकृति के ऊपर निर्भर करेगी जिनका संशोधन प्रस्तावित है. दोस्तों संविधान के अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत सभी प्रकार के संवैधानिक संशोधनों को संसद द्वारा दो तिहाई बहुमत से पारित करना पर्याप्त है पर ऐसे संशोधन जो देश के संघीय ढांचे को प्रभावित करते हों उनके लिए यह आवश्यक होगा कि कम से कम देश के आधे राज्य विधायिकाओं यानी State Legislature का अनुमोदन हो और उसके बाद ही विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है. ध्यान देने की बात य़ह है कि भारत में संसद ही किसी संविधान संशोधन के लिए सक्षम संस्था है और यहां संविधान संशोधन के लिए किसी विशेष संस्था का प्रावधान नहीं है. दोस्तों संविधान संशोधनों के उद्देश्य से किसी विधेयक को संसद के दोनों सदनों यानी लोकसभा या राज्यसभा में से किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है. सदन के अन्दर चर्चा के बाद विधेयक दोनों सदनों यानी लोकसभा या राज्यसभा से विशेष बहुमत से पारित हो जाता है तो इसे राष्ट्रपति के पास उनकी सहमती प्राप्त करने के लिए प्रस्तुत किया जाता है.विधेयक पर राष्ट्रपति का हस्ताक्षर होते ही विधेयक कानून बन जाता है और संविधान संशोधन की प्रक्रिया पूरी हो जाती है. दोस्तों ये विशेष बहुमत क्या है. विशेष बहुमत का तात्पर्य है कि लोकसभा और राज्यसभा में अलग अलग सदन की पूरी सदस्य संख्या के आधे से अधिक यानी 50%से ज्यादा और सदन में उपस्थित और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से कम न हो. यानी 50% of total membership of the house and not less than two- third of the members present and voting . दोस्तों अनुच्छेद 368(2) के अनुसार यदि प्रस्तावित संशोधन देश के संघीय व्यवस्था से सम्बंधित प्रावधानों को प्रभावित करता है जैसे राष्ट्रपति का चुनाव article 54,55. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट Article 241, संघ और राज्यों की कार्यकारी शक्तियाँ Article 73,162. संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का विभाजन. सातवीं अनुसूची की सूचियां. संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व Article 80,81 और स्वयं अनुच्छेद 368 इत्यादी. तो देश के कम से कम आधी राज्य विधानसभाओं द्वारा या जहाँ दो सदन हों वहाँ दोनों सदनों द्वारा प्रस्तावित संशोधन विधेयक का अनुमोदन आवश्यक है उसके बाद ही य़ह विधेयक राष्ट्रपति की सहमती के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है. दोस्तों 97th संविधान संशोधन 2011 जिसके अन्तर्गत अनुच्छेद 243 ZH से लेकर 243 ZT जोड़े गए थे, को गुजरात हाई कोर्ट ने इस आधार पर असंवैधानिक करार दे दिया कि इस संशोधन को अनुच्छेद 368(2) के अनुसार कम से कम आधे राज्य विधायिकाओं का अनुमोदन यानी Ratification प्राप्त नहीं था. वहीँ 99th संविधान संशोधन विधेयक 2014 और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति अधिनियम 2014 को संवैधानिक ठहराया गया क्योंकि इन दोनों विधेयकों को आधे राज्य विधायिकाओं का अनुमोदन प्राप्त था. दोस्तों हमारे संविधान में संशोधन प्रक्रिया
कठोरता और लचीलेपन का अद्भुत मिश्रण है. जहाँ एक तरफ विशेष बहुमत या संशोधन की विशेष प्रक्रिया इसे कठोर की श्रेणी में रखती है फिर भी य़ह प्रक्रिया इतनी जटिल नहीं है यदि अमेरिका या कई अन्य देशों के संविधान का तुलनात्मक अध्ययन करें. दोस्तों हमारी संसद देश की साधारण विधायिका है पर संविधान इसी संसद को Constituent Power यानी घटक शक्तियाँ भी प्रदान करता है और संविधान संशोधन के लिए अलग से कोई संस्था या निकाय नहीं है. हाँ संसद के Constituent Powers अनुच्छेद 368 के विशेष प्रक्रिया के प्रावधान के अधीन हैं. दोस्तों हमारे देश में संविधान संशोधन की प्रक्रिया में राज्य विधायिकाओं की कोई भूमिका नहीं है.अनुच्छेद 368 के अनुसार संसद के दोनों सदनों में से किसी भी सदन में विधेयक प्रस्तुत करके संविधान संशोधन की प्रक्रिया को आरम्भ किया जा सकता है. दोस्तों संविधान के अनुच्छेद 108 के अनुसार यदि किसी साधारण विधेयक को पारित करने के विषय पर संसद के दोनों सदनों में असहमति हो और गतिरोध पैदा हो जाय तो दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाकर गतिरोध खत्म किया जा सकता है परन्तु संसद के संयुक्त अधिवेशन का प्रावधान संविधान संशोधन विधेयक पर लागू नहीं है. अनुच्छेद 368(2) के अनुसार संविधान संशोधन विधेयक दोनों सदनों में अलग अलग विशेष बहुमत और विशेष प्रक्रिया के माध्यम से ही पारित किया जा सकता है. तात्पर्य य़ह है कि सदनों के संयुक्त अधिवेशन यानी Joint Session का प्रावधान सिर्फ साधारण विधेयक पर उपलब्ध है. संविधान संशोधन विधेयक के लिये राष्ट्रपति के पूर्व अनुमति की भी कोई आवश्यकता नहीं है. दोस्तों अनुच्छेद 111 के अंतर्गत जब साधारण विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित होकर राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है उनकी सहमति प्राप्त करने के लिए तो राष्ट्रपति के सामने दो विकल्प हैं प्रथम विकल्प य़ह है कि वह विधेयक पर हस्ताक्षर कर दें और वह विधेयक कानून बन जायेगा. राष्ट्रपति के सामने दूसरा विकल्प है कि वह अपनी सहमति देने से इन्कार कर दें यानी वह Assent को Withhold करने की घोषणा कर सकते हैं. इस अवस्था में विधेयक कानून नहीं बन सकता. दोस्तों जहाँ तक बात है संविधान संशोधन विधेयक की तो यहाँ राष्ट्रपति को वह स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है. यदि संविधान संशोधन विधेयक दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित होकर राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तो राष्ट्रपति को सहमति देने की अनिवार्यता होगी, उन्हें हस्ताक्षर करना पड़ेगा अर्थात संविधान संशोधन विधेयक को सहमति देने के लिए राष्ट्रपति बाध्य हैं. दरअसल संविधान के 24वें संशोधन 1971 में राष्ट्रपति के वीटो पावर को समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर Shall give his assent अनुच्छेद 368(2) में जोड़ा गया. दोस्तों देश के संविधान विशेषज्ञों के बीच एक विवाद खड़ा हो गया कि क्या अनुच्छेद 368 के अंतर्गत बनाए गए कानून अनुच्छेद 13(2) के अनुरूप होने चाहिए. गोलक नाथ फैसला, 24वां संविधान संशोधन और फिर Keshwanand भारती Judgement और संविधान के Basic feature यानी मूल ढांचा इत्यादि पर अगले वीडियो में बात करेंगे. मिलते हैं next वीडियो में. मेरे चैनल को subscribe करेंगे तो मुझे आपका support मिलेगा. नमस्कार धन्यवाद.
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