के संविधान के अनुसार भारत एक धर्म निरपेक्ष है यानी सेकुलर राष्ट्र है जिसका अर्थ य़ह हुआ कि राज्य सभी धर्मों के प्रति तटस्थ और निष्पक्ष रहेगा. एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र की मान्यता होती है कि राज्य की भूमिका मानवीय और सांसारिक मामलों तक ही सीमित होगी और इसका इश्वरीय संबंधों से कोई लेना देना नहीं है. व्यक्ति का इश्वर से सम्बन्ध उसके व्यक्तिगत विश्वास का विषय है. राज्य की दृष्टि में सभी धर्मों का स्थान समान है और राज्य लोंगों के धार्मिक अधिकारों, उनकी आस्था और अराधना में किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा. संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 सभी धर्मों के प्रति राज्य की निष्पक्षता को सुनिश्चित करते हैं. दोस्तों संविधान का अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को अन्तःकरण की स्वतंत्रता के साथ-साथ अपने धर्म मानने, पालन करने और उसके प्रचार की स्वतंत्रता प्रदान करता है यानी Freedom of conscience and right to profes, practice and propagate his religion. अन्तः करण की स्वतंत्रता का अर्थ हुआ कि ईश्वर से अपने संबंधों को अपनी इच्छानुसार निर्धारित करना. Right to profes का अर्थ हुआ कि सभी को अपने धार्मिक आस्था और विश्वास को खुले रूप में स्वीकार करने और व्यक्त करने का अधिकार. Right to practice यानी धर्म के अभ्यास का अर्थ हुआ कि सभी लोंगों को अपने धार्मिक उपासना, अनुष्ठानों और समारोहों का पालन करने एवं धार्मिक आस्था और विचारों का प्रदर्शन करने का अधिकार होगा. Right to Propagate का अर्थ हुआ कि सभी को अपने धार्मिक श्रद्धा, विश्वास और धार्मिक विचारों के प्रचार प्रसार का अधिकार होगा. दोस्तों धर्म की स्वतंत्रता बलपूर्वक धर्मांतरण का अधिकार नहीं देता. बलपूर्वक धर्मांतरण व्यक्ति के अन्तःकरण की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होगा. य़ह स्पष्ट है कि अनुच्छेद 25 सिर्फ धार्मिक आस्था का ही नहीं बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों की स्वतंत्रता का अधिकार देता है. दोस्तों अनुच्छेद 25 द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार भी अन्य मौलिक अधिकारों के समान ही तार्किक प्रतिबंधों के अधीन हैं. लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु तर्कसंगत प्रतिबंध राज्य द्वारा लागू किए जा सकते हैं. इसका उद्देश्य य़ह है कि धार्मिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग अपराध एवं समाज विरोधी कार्यों के लिये न किया जाए जैसे भ्रूण हत्या इत्यादी. दोस्तों धर्मो से जुड़ी हुई बहुत सारी गतिविधियां जैसे आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक या धर्म निरपेक्ष गतिविधियां जो वास्तव में अन्तःकरण की स्वतंत्रता के विरुद्ध हों उनपर राज्य द्वारा तर्कसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. समाज सुधार के लिए उठाए गए कदमों की सुरक्षा के लिए राज्य धार्मिक स्वतंत्रता पर तर्कसंगत प्रतिबंध लगा सकता है. जैसे हिन्दू धार्मिक स्थलों को आम जनता के लिए खोलना. कुछ तर्कसंगत प्रतिबंधों को छोड़कर भारत में किसी भी व्यक्ति को किसी भी धर्म में आस्था रखने का ही अधिकार नहीं है बल्कि उस आस्था के आधार पर अनुष्ठानों का पालन करने का भी अधिकार है. इसके अलावा किसी भी व्यक्ति को अपने धार्मिक विचारों को दूसरों तक पहुँचाने का भी अधिकार अनुच्छेद 25 देता है. दोस्तों संविधान के अनुच्छेद 26 के अनुसार सभी धार्मिक समूहों को धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों को स्थापित करने और उन्हें चलाने का अधिकार है. धार्मिक समूहों को धार्मिक प्रबंधन का अधिकार है. अनुच्छेद 26 के अंतर्गत धार्मिक समूहों को चल और अचल संपत्तियों को खरीदने का अधिकार है और ऐसी सम्पत्तियों को विधि के अनुसार संचालित करने का अधिकार है. विशेष बात यह है कि य़ह गारण्टी सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही नहीं बल्कि विदेशियों को भी उपलब्ध है. दोस्तों संविधान के अनुच्छेद 28 के अनुसार राज्य द्वारा वित्त पोषित किसी भी शैक्षणिक संस्थान में किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती. परन्तु य़ह प्रतिबंध उन शिक्षण संस्थाओं पर लागू नहीं होगा जो सरकार द्वारा संचालित तो हैं पर उनकी स्थापना किसी एंडोमेंट या ट्रस्ट द्वारा धार्मिक शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से की गई हो . सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त या सरकार द्वारा वित्त पोषित किसी भी शिक्षण संस्थान में शिक्षा प्राप्त कर रहे व्यक्ति पर उसकी ईच्छा के विरुद्ध किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा थोपी नहीं जा सकती. यदि व्यक्ति नाबालिग है तो उसके अभिभावक की अनुमति आवश्यक है. इसका विस्तृत अर्थ य़ह हुआ कि सरकार द्वारा पूरी तरह से वित्त पोषित शिक्षण संस्थाओं में किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती. ट्रस्ट या एंडोमेंट के अंतर्गत स्थापित पर सरकार द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा प्रदान करने की अनुमति है. सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त और सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं धार्मिक शिक्षा स्वैच्छिक आधार पर प्रदान की जा सकती है. दोस्तों भारतीय संविधान सभी धर्मों और धार्मिक सम्प्रदायों का उनके धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार सभी मूल संस्कारों एवं अनुष्ठानों को मानने और मनाने की पूरी स्वतंत्रता देता है इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा परन्तु न्यायालय को य़ह सुनिश्चित करने का अधिकार होगा कि कौन से संस्कार और अनुष्ठान किसी धार्मिक सिद्धांत के मूल में हैं. यदि न्यायालय की दृष्टि में कोई धार्मिक संस्कार और अनुष्ठान सार्वजनिक स्वास्थ्य और नैतिकता को ठेस पहुंचाते हैं या उस धर्म के मूल अभ्यास का हिस्सा नहीं है या वे देश के किसी सामाजिक आर्थिक या राजनैतिक नियंत्रण के किसी कानून का उल्लंघन करते हों न्यायालय को सकारात्मक हस्तक्षेप का पूरा अधिकार होगा. दोस्तों इस बात को स्पष्ट करना आवश्यक है कि धर्म निरपेक्ष या सेकुलर शब्द के कई अर्थ हैं लेकिन सबसे प्रचलित अर्थ है कि जिसका सम्बन्ध सांसारिक विषयों से हो न कि धार्मिक या आध्यात्मिक. धर्म निरपेक्षता के संशयपूर्ण अर्थ के कारण विद्वानों में इसको लेकर दुविधा पैदा हुई और कुछ स्वार्थी तत्वों ने इसका अनुचित लाभ लेना शुरू कर दिया. बाद में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने तमाम दुविधाओं को विराम देते हुए अपने एक महत्तवपूर्ण निर्णय में य़ह स्पष्ट किया कि पहला, भारत में धर्म निरपेक्षता का अर्थ य़ह है कि धार्मिक विषयों पर राज्य की भूमिका तटस्थ होगी पर इसका कदापि य़ह अर्थ नहीं है कि राज्य धर्म या धार्मिक विषयों के विरुद्ध है. दूसरा, प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता है. धर्मनिष्ठता और धर्म निरपेक्षता परस्पर विरोधी नहीं हैं. तीसरा, संविधान की प्रस्तावना में संशयपूर्ण शब्द सेकुलर किसी भी परिस्थिति में अनुच्छेद 25 से लेकर अनुच्छेद 30 और अनुच्छेद 351 के अंतर्गत प्रदत्त प्रावधानों की अवहेलना नहीं कर सकता. चौथा, यदि धर्म का प्रयोग राजनैतिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है या धर्म के नाम पर वोट देने की अपील की जाती है तो य़ह धर्म निरपेक्ष लोकतंत्र के विरुद्ध होगा. राजनीति और धर्म को मिश्रित नहीं किया जा सकता. अन्त में, इस भावार्थ में धर्म निरपेक्षता को भारतीय संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा माना जाता है. दोस्तों अनुच्छेद 25 के अंतर्गत Propagate यानी प्रचार शब्द का कुछ धार्मिक समुदायों ने य़ह अर्थ लगाया कि धर्मांतरण कराना उनका मौलिक अधिकार है माध्यम कोई हो. इसी आधार पर मध्य प्रदेश और ओडिशा सरकारों द्वारा लाए गए कानूनों जिसके अन्तर्गत बल प्रयोग, धोखा, फुसलाना ,और प्रलोभन के माध्यम से धर्मांतरण को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया. कुछ धार्मिक समुदायों द्वारा दोनों कानूनों का व्यापक विरोध किया गया और दोनों कानूनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने आपत्तियों को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25(1) के अन्तर्गत Propagate यानी प्रचार का अर्थ य़ह हुआ कि कोई भी व्यक्ति अपने धर्म और धार्मिक सिद्धांतों का प्रचार प्रसार कर सकता है परन्तु य़ह अनुच्छेद किसी को धर्मांतरण कराने का अधिकार नहीं देता क्योंकि वही अनुच्छेद प्रत्येक व्यक्ति को अन्तःकरण की स्वतंत्रता का अधिकार देता है. दूसरा, अन्तःकरण की स्वतंत्रता का अधिकार का अर्थ य़ह हुआ कि सभी व्यक्तियों को स्वेच्छा से अपनी आस्था चुनने का अधिकार है साथ ही बलप्रयोग, धोखा, फुसलाना ,प्रलोभन द्वारा धर्मांतरित न होने की स्वतंत्रता है. हाँ स्वेच्छा से कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म को स्वीकार करने के लिए स्वतन्त्र है. धर्मांतरण में किसी भी प्रकार का भय, या प्रलोभन सहमति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है. तीसरा, यदि य़ह मान भी लिया जाय कि धर्म विशेष को अपने सिद्धांतों के प्रचार प्रसार का अधिकार है और इसमें धर्मांतरण भी शामिल है तो राज्य को हस्तक्षेप करने का अधिकार और कर्तव्य दोनों है यदि धर्मांतरण की गतिविधियों से लोक व्यवस्था, नैतिकता, ज़न स्वास्थ्य को ठेस पहुँचती हो. ऐसा इसलिए कि अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रदत्त स्वतंत्रता लोक व्यवस्था, नैतिकता, और सार्वजनिक स्वास्थ्य की सीमाओं के अधीन है. चौथा, यदि धर्मांतरण के अधिकार को स्वीकार कर भी लिया जाय तो क्या होगा जब सभी धार्मिक समुदाय अभियान चलाने लग जाएं एक दूसरे के लोंगों का धर्मांतरण कराने में अपन अपने तरीकों से बल प्रयोग, धोखा, फुसलाना और प्रलोभन के माध्यम से. निश्चित रूप से लोक शान्ति पूरी तरह से भंग हो जाएगी. यही कारण है कि राज्य को संविधान य़ह शक्ति देता है कि धर्मांतरण या धर्मांतरण के प्रयास को प्रतिबन्धित किया जाय और दण्डित किया जाय यदि इसमें किसी भी प्रकार से बलप्रयोग, धोखा, फुसलाना और प्रलोभन शामिल है. यही मध्य प्रदेश और ओडिशा के कानूनों में दिया गया है. इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश और ओडिशा के कानूनों को संवैधानिक करार दिया. दोस्तों उम्मीद है आपको Right to Religion clear हो गया होगा. मेरे चैनल को subscribe करेंगे तो मुझे आपका support मिलेगा. मिलते हैं next वीडियो में. नमस्कार धन्यवाद
कई दशकों से जारी इजराइल-फ़िलीस्तीन युद्ध में एक ऐसा भी वक़्त आया जब दोनों के बीच शांति की नयी उम्मीदें सामने आयीं. दोस्तों बात 1992 की है जब इजराइल के प्रधानमंत्री यीजाक राबिन ने फ़िलीस्तीन के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाया और फ़िलीस्तीनी नेता यासर अराफात ने भी आगे बढ़कर उस शानदार पहल का स्वागत किया. दोनों ही नेता अपने अपने मुद्दे सुलझाने के लिए सामने आए. इजराइली प्रधानमंत्री यीजाक राबिन ने माना कि फ़िलीस्तीनी मुक्ति संगठन PLO कोई आतंकवादी संगठन नहीं है बल्कि वे अपना देश चाहते हैं और इसका सम्मान किया जाना चाहिए. फ़िलीस्तीनी नेता यासर अराफात ने भी सकारात्मक रवैय्या अपनाते हुए इजराइल के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार भी किया और मान्यता भी दी. दोस्तों आज बात करेंगे 30 साल पहले हुए ओस्लो समझौते की जो फ़िलीस्तीनियों के लिए शान्ति की अन्तिम उम्मींद लेकर आया था पर य़ह फ़िलीस्तीनयों की आशाओं की अन्तिम किरण इजराइली आन्तरिक राजनीति का शिकार हो गयी. उसका परिणाम य़ह हुआ कि वह खूनी संघर्ष जो 1993 में ही खत्म हो जाना चाहिए था वह आज भी उसी निर्दयता के साथ जारी है. ...
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