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Justice KN Wanchoo, A judge without a law degree.

 बात करेंगे एक ऐसे शख्स की जो बिना किसी लॉ की डिग्री के या कानून की बिना किसी औपचारिक पढ़ाई के ही हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के Judge ही नहीं बल्कि भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी Chief Justice of India की अत्यंत प्रतिष्ठापूर्ण स्थान को प्राप्त किया. इसकी भी बात करेंगे कि ऐसा कैसे सम्भव हो पाया. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले आप से एक छोटी सी गुजारिश यदि आपने अभी तक मेरे चैनल को subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ इसको subscribe कर लीजिए और बेल icon को भी press कर दीजिए. दोस्तों हम बात कर रहे हैं भारत के दसवें मुख्य न्यायाधीश श्रीमान कैलाश नाथ Wanchoo की. अपनी विलक्षण प्रतिभा के दम पर सफलता की एक एक सीढ़ियां चढ़ते हुए वे देश के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर बिराजमान हुए और देश के सामने एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया. सर कैलाश नाथ Wanchoo 24 अप्रैल 1967 को भारत के मुख्य न्यायाधीश बनाए गए और उन्होंने इस पद को 24 फरवरी 1968 तक सुशोभित किया. दोस्तों जस्टिस Wanchoo एक करिअर नौकरशाह थे यानी अंग्रेजों के ज़माने के ICS ऑफिसर. दोस्तों 1924 में ICS की परीक्षा पास करने वाले कैलाश नाथ Wanchoo का जन्म 25 फरवरी 1903 को आज के मध्यप्रदेश के मंदसौर में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा मध्यप्रदेश से प्राप्त करने के बाद उन्होंने कानपुर के पंडित पृथ्वी नाथ हाई स्कूल से स्कूली शिक्षा प्राप्त की उसके बाद Muir सेंट्रल कॉलेज इलाहाबाद से Graduation किया. 1924 में  ICS परीक्षा पास करने के बाद कैलाश नाथ Wanchoo दो वर्षों की ट्रेनिंग के लिए Batham कॉलेज ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय गए. दोस्तों इंग्लैंड में अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद Wanchoo भारत वापस आए और यूनाइटेड Provinces यानी आज के उत्तर प्रदेश में असिस्टैंट Magistrate और कलेक्टर के रूप में तैनात किए गए. अपनी कार्यकुशलता के आधार पर पदोन्नति की सीढ़ियां चढ़ते हुए 1937 में Wanchoo सेशन और जिला जज बने. 1947 में कैलाश नाथ Wanchoo को इलाहाबाद हाई कोर्ट का ऐक्टिंग जज यानी अल्पकालिक जज बनाया गया और 10 महीने के अंतराल के बाद ही उन्हें स्थायी जज यानी Permanent Judge बना दिया गया. दोस्तों कैलाश नाथ Wanchoo ने सफलता का सफर जारी रखा और दो फरवरी 1951 को उन्हें राजस्थान हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश यानी Chief Justice नियुक्त किया गया. इस समय राजस्थान पार्ट B प्रान्त था. राज्यों के पुनर्गठन के बाद 1956 में राजस्थान को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त होने बाद कैलाश नाथ Wanchoo राजस्थान हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद पर बरकरार रहे. दोस्तों जस्टिस कैलाश नाथ Wanchoo के करिअर में एक ब़ड़ा मोड़ तब आया जब ग्यारह अगस्त 1958 को उन्हें भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया. सुप्रीम कोर्ट के कई महत्तवपूर्ण फैसलों पर अपना हस्ताक्षर अंकित करने वाले जस्टिस Wanchoo के जीवन में एक शानदार अवसर तब आया जब सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस के सुब्बाराव ने 11 अप्रैल 1967 को अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी. दरअसल सुब्बाराव राष्ट्रपति का चुनाव लड़ना चाहते थे और इसी क्रम में उन्होंने देश के मुख्य न्यायाधीश के पद से इस्तीफा दे दिया. अचानक से मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो जाने के कारण 24 अप्रैल 1967 को जस्टिस कैलाश नाथ Wanchoo को सुप्रीम कोर्ट का चीफ़ जस्टिस यानी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया. 10 महीने की सेवा के उपरान्त 24 फरवरी 1968 को जस्टिस कैलाश नाथ Wanchoo सेवा निवृत्त हो गए यानी रिटायर हो गए. दोस्तों कैसे और क्यों एक प्रशासनिक अधिकारी जिसके पास कानून की कोई डिग्री न हो यानी उसने कानून की औपचारिक पढ़ाई न की हो फिर भी न्यायाधीश ही नहीं बल्कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद पर बिराजमान हो सका. दरअसल जो ICS अधिकारी डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर बनते थे वे ही न्यायिक मजिस्ट्रेट यानी Judicial Magistrate भी होते थे. उस समय प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था एकीकृत थी, ये दोनों अलग नहीं थे. मतलब Executive Magistrate और Judicial Magistrate एक ही हुआ करते थे वे अलग नहीं होते थे. हाई कोर्ट के जजों के 50% से ज्यादा पद ICS अफसरों से भरे जाते थे और बाकी पदों पर हाई कोर्ट के अधिवक्ताओं की नियुक्ति की जाती थी. यही कारण था कि कानून की डिग्री न होते हुए भी जस्टिस Wanchoo हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के Judge बने और देश के मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्त हुए. अपने ज्ञान के आधार पर जस्टिस Wanchoo डिग्री न होते हुए भी देश की सर्वोच्च न्यायिक पद पर आसीन हुए. दोस्तों जस्टिस Wanchoo कई महत्त्वपूर्ण फैसलों में अपनी अलग और स्पष्ट राय के लिए याद किए जाते हैं. दोस्तों गोलक नाथ VS स्टेट ऑफ पंजाब मामले में जस्टिस Wanchoo ने बहुमत के फैसले से स्पष्ट रूप से अलग अनुच्छेद 368 के  अंतर्गत संविधान संशोधन जिसमें पार्ट थ्री के अंतर्गत Fundamental Rights भी शामिल हैं, के लिए संसद के अधिकार को अन्तिम और संविधान सम्मत करार दिया. गोलक नाथ मामले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सुब्बाराव ने भारतीय न्याय व्यवस्था में एक नयी अवधारणा Prospective Overrulling पेश किया पर जस्टिस Wanchoo ने स्पष्ट रूप से इसके विरोध में अपनी राय व्यक्त करते हुए Prospective Overrulling के सिद्धांत को खारिज किया. दोस्तों आइए पहले य़ह जानने की कोशिश करते हैं कि Prospective Overrulling का अर्थ क्या है. Prospective Overrulling यानी सम्भावित अधिनिर्णय पहली बार अमेरिका के न्यायिक व्यवस्था में आया उसके बाद दुनियाँ के अनेक देशों ने इसे अपनाया. भारत में गोलक नाथ vs स्टेट ऑफ पंजाब मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसके पक्ष में निर्णय दिया. दोस्तों prospective Overrulling के सिद्धान्त का आधार य़ह है कि न्यायालय के निर्णय का प्रभाव भविष्य में होने वाले घटनाओं पर लागू होगा यानी उस निर्णय का सम्भावित संचालन होगा और य़ह निर्णय पूर्व में किये गये किसी लेन देन को प्रभावित नहीं करेगा. परन्तु Prospective Overrulling के सिद्धांत को लागू करने के लिए कुछ शर्तों का पालन किया जाना जरूरी है जैसे य़ह उन्हीं मामलों में लागू किया जा सकता है जिसका सम्बन्ध संविधान की व्याख्या से है. Prospective Overrulling को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही लागू कर सकती है और सुप्रीम कोर्ट Prospective Overrulling के पक्षों में न्याय के दृष्टिगत आवश्यक संशोधन कर सकती है. Prospective Overrulling भारतीय न्याय शास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है इसके अंतर्गत किसी कानून को असंवैधानिक करार दिए जाने से पिछले लेन देन प्रभावित नहीं होंगे और न ही सार्वजनिक हितों की हानि होगी. दोस्तों सुप्रीम कोर्ट के कई महत्त्वपूर्ण फैसलों में जस्टिस Wanchoo ने अपनी स्पष्ट और अलग राय रखी. जनरल मैनेजर सदर्न रेल्वे vs Rangachari मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण को संवैधानिक करार देते हुए इसे अनुच्छेद 16(4A) के अनुरूप ठहराया जबकि जस्टिस Wanchoo ने इस निर्णय से असहमति व्यक्त करते हुए इसे अनुच्छेद 16 द्वारा प्रदत्त अवसरों की समानता के अधिकार का उल्लंघन करार दिया साथ ही आरक्षण को प्रशासनिक दक्षता के विरुद्ध बताया. दोस्तों जस्टिस Wanchoo 24 फरवरी 1968 को रिटायर होने के बाद कई कमेटियों और आयोगों के प्रमुख रहे अपना राष्ट्र सेवा में अपना अतुल्य योगदान दिया. दोस्तों य़ह कहानी थी एक ऐसे व्यक्ति की जो कानून की डिग्री न होते हुए भी अपने ज्ञान और प्रतिभा के दम पर भारत के सर्वोच्च न्यायिक पद पर आसीन हुए. मिलते हैं next वीडियो में किसी और टॉपिक पर. मेरे चैनल को subscribe करेंगे तो मुझे आपका support मिलेगा. नमस्कार धन्यवाद. 

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