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Educational and Cultural Rights

 का टॉपिक है अनुच्छेद 29 और 30 यानी Educational and cultural rights. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले आप से एक छोटी सी गुजारिश यदि आपने अभी तक मेरे चैनल को subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ इसको subscribe कर लीजिए और बेल icon को भी प्रेस कर दीजिए, आते हैं पॉइन्ट पर. दोस्तों भारत के संविधान में अल्पसंख्यकों के धार्मिक और साँस्कृतिक हितों की रक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की गयी है. संविधान का अनुच्छेद 29 कहता है कि राज्य किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय पर कोई संस्कृति नहीं थोपेगा सिवाय इसके स्वयम के. The state shall not impose upon it any culture other than it's own Article 29(1). दोस्तों ,संविधान के अनुच्छेद 30 के अनुसार अल्पसंख्यक समुदाय को अपनी इच्छानुसार शिक्षण संस्थाओं को खोलने और उन्हें संचालित करने की स्वतंत्रता होगी. राज्य द्वारा शिक्षण संस्थाओं को सहायता प्रदान करने की क्रिया में अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं के प्रति कोई भेदभाव नहीं होगा. अनुच्छेद 30(1A) के अनुसार यदि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान की सम्पत्ति का राज्य द्वारा अधिग्रहण किया जाता है तो पूर्ण मुआवजा का भुगतान करना होगा. दोस्तों यहाँ य़ह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जा रहा है. प्रथम भाव है धार्मिक अल्पसंख्यक और दूसरा भाव है भाषाई अल्पसंख्यक. भारत में राज्यों का पुनर्गठन 1956 में भाषाई आधार पर हुआ था यही कारण है कि अल्पसंख्यक का निर्धारण प्रान्तीय आधार पर किया जाना चाहिए न कि सम्पूर्ण देश को एक इकाई मानते हुए. अल्पसंख्यक एक सापेक्ष शब्द है जिसका भाव है कि किसी प्रांत में किसी धार्मिक समुदाय या भाषा समुदाय की संख्या उस प्रांत की पूरी जनसंख्या के 50%से भी कम है. दोस्तों भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को और मजबूती तब मिली जब 42वें संविधान संशोधन 1976 के माध्यम से संविधान के प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष यानी Secular शब्द अलग से जोड़ा गया. अल्पसंख्यकों के रक्षा कवच के रूप में बहुत ही विस्तृत रूप से संविधान के अनुच्छेद 25 लेकर 30 तक तमाम प्रावधानों की व्यवस्था की गयी है. सावधान रहने की आवश्यकता य़ह है कि यदि धर्म निरपेक्षता के नाम पर कोई अल्पसंख्यक समुदाय संवैधानिक प्रावधानों से बाहर जाकर मांग करता है या जिस पार्टी की सरकार है वह राजनैतिक कारणों से सीमा से बाहर जाकर अनुचित मांगों को स्वीकार करती है तो वह उसी साम्प्रदायिकता का बीज़ बो रही है जिसकी भारी कीमत देश को चुकानी पड़ी है. यही कारण है कि देश के महान संविधान निर्माताओं ने साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व और रोजगार में साम्प्रदायिक आरक्षण को संविधान में कोई जगह नहीं दी. दोस्तों यदि सरकार किसी सार्वजनिक पद पर किसी व्यक्ति की नियुक्ति को सही ठहराती है उसके योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि इस आधार पर कि वह धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग का है तो य़ह संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार अनुच्छेद 16(2) का उल्लंघन होगा. ऐसा कोई कदम अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा करने के स्थान पर बहुसंख्यक या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को उनके संविधान प्रदत्त  न्यायोचित अधिकारों से वंचित करेगा. दोस्तों, धर्मनिरपेक्षता या अल्पसंख्यक अधिकारों के नाम पर किसी वर्ग विशेष को अनुचित लाभ पहुँचाना या अनावश्यक प्राथमिकता देना वास्तव में राष्ट्रीय एकता से समझौता करने जैसा है क्योंकि बहुसंख्यकों का भरोसा बनाए रखना भी सरकार की जिम्मेदारी है. हाँ अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं में 50% सीटें अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित की जा सकती हैं . किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय की य़ह जिम्मेदारी है कि वह सुनिश्चत करे कि इसके भाषा और संस्कृति को समुचित संरक्षण प्राप्त हो सके और साथ ही अल्पसंख्यक बच्चों को अच्छी शिक्षा सुलभ हो सके.  दोस्तों सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यकों द्वारा शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और संचलन के लिए कुछ समान्य सिद्धांतों को संक्षेपित किया है. प्रथम, संस्थापकों को एक प्रबंधक निकाय यानी Managing Body को चुनने का अधिकार होगा जो संस्थाओं के प्रबंधन और संचालन के लिए जिम्मेदार होगा.  दूसरा, संस्थापकों को य़ह अधिकार होगा कि वे अध्यापकों, प्रवक्ताओं, हेड मास्टर्स, प्रधानाचार्यों, समेत  अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति करे और किसी भी प्रकार के कर्तव्य के प्रति लापरवाही के विरुद्ध उचित कार्यवाई करे. तीसरा, योग्य छात्रों के प्रवेश की व्यवस्था हो और एक तर्कसंगत शुल्क ही लिया जाय. चौथा, संस्थाओं की सम्पत्तियों का प्रयोग संस्थाओं के हित में हो. दोस्तों, अनुसंधान 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को जो अधिकार दिए गए हैं उसका एक मात्र उद्देश्य है उन्हें बहुसंख्यकों के साथ समानता के स्तर पर खड़े करना. पर इसका कदापि उद्देश्य य़ह नहीं है कि उन्हें कोई अनुचित लाभ पहुँचाया जाय. अल्पसंख्यकों के पक्ष में उल्टा भेदभाव यानी Reverse Discrimination के लिए संविधान में कोई स्थान नहीं है. राष्ट्रीय हितों, राष्ट्रीय सुरक्षा, समाज कल्याण, लोक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य, स्वच्छता, टैक्स इत्यादि पर लागू होने वाले देश के समान्य कानून अल्पसंख्यक संस्थाओं पर भी समानता के आधार पर लागू होंगे. दोस्तों, शिक्षण संस्थाओं को खोलने और संचालन का अधिकार सरकार द्वारा लागू कानूनी उपायों के अधीन हैं ताकि संस्थानों का शैक्षणिक चरित्र, उनका स्तर, और शैक्षणिक उत्कृष्टता को बनाए रखा जा सके. शासन द्वारा ऐसे शिक्षण संस्थाओं की निगरानी की जा सकती है ताकि प्रशासनिक दक्षता को सुनिश्चित किया जा सके. छात्रों और अध्यापकों के कल्याण, अध्यापकों और कर्मचारियों की नियुक्ति हेतु योग्यता और अन्य सेवा शर्तों का निर्धारण, शोषण के विरुद्ध, विभिन्न स्तरों के पाठ्यक्रम इत्यादि के लिए सरकार कानून बना सकती है. ऐसे कानूनों से अनुच्छेद 30 का उल्लंघन नहीं होगा. दोस्तों, सरकार द्वारा निर्धारित योग्यता और अन्य सेवा शर्तों के अधीन गैर सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओ को एक तर्कसंगत प्रक्रिया के अंतर्गत अध्यापकों/प्रवक्ताओं की नियुक्ति की स्वतंत्रता होगी. अल्पसंख्यकों के अधिकार सम्पूर्ण नहीं हैं और राष्ट्र के व्यापक हित में बनाए गए कानूनों के अधीन हैं. दोस्तों, हमारे संविधान के प्रस्तावना का मुख्य उद्देश्य है देश की एकता और अखण्डता को बनाए रखना और यही कारण है कि संविधान सभी अल्पसंख्यक समुदायों को धार्मिक और साँस्कृतिक सुरक्षा देता है ताकि उन्हें न्याय, विचारों, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और अराधना की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो सके. यदि कोई अल्पसंख्यक समुदाय और अधिक पाने के लिए शोर करता है जितना संविधान दे रहा है तो य़ह एक संकीर्ण और अलगाववादी मानसिकता होगी और भारत कभी भी एक राष्ट्र यानी Nation का स्वरुप नहीं ले पाएगा. साम्प्रदायिकता का जहर स्वतंत्रता की नींव हिला देगा. धर्मनिरपेक्षता की महान भावना तब आहत हो जाएगी जब सरकार बहुसंख्यक समुदाय के कानूनी अधिकारों का दमन करती है ताकि एक आक्रमक अल्पसंख्यक समुदाय का तुष्टीकरण किया जा सके. दोस्तों वीडियो समाप्त हुआ. मेरे चैनल को subscribe करेंगे तो मुझे आपका support मिलेगा. मिलते हैं next वीडियो में. नमस्कार धन्यवाद 

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