सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

चाबहार समझौता

 भारत और ईरान के बीच 13 मई 2024 ek हुआ समझौता जिसके अंतर्गत अगले 10 वर्षों तक भारत चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के साथ साथ इसका संचालन भी करेगा. ईरान के sistan-बलूचिस्तान प्रान्त में स्थित देश के विभाजन के पहले भारत के ठीक दरवाजे पर था. य़ह वह स्थान है जहां पर हिंदुस्तानी ऊर्दू  बड़े अच्छे से बोली और समझी जाती है. यही वह जगह है जहाँ कभी पंचतंत्र को उसके फ़ारसी अनुवाद में बड़े चाव से पढ़ा जाता था. दोस्तों भारत की स्वतंत्रता के बाद और ईरान के 1979 की इस्लामिक क्रान्ति के पहले दोनों देशों के सम्बन्ध बहुत मधुर नहीं रहे. कारण था ईरान के शाह का अमेरिका की तरफ विशेष झुकाव और भारत की गुट निरपेक्ष नीति. वैसे 1970 के दशक में ही ईरान के शाह ने चाबहार बन्दरगाह को विकसित की आवश्यकता पर विचार व्यक्त किया इसका मुख्य कारण था यहां का अनुकूल मौसम और गर्म जल का बन्दरगाह होने के साथ साथ य़ह हिंद महासागर में ईरान का इकलौता प्रवेश द्वार है. विशेष बात यह है कि भू - रणनीति दृष्टिकोण यानी Geo-Stratgic Point of view से महत्तवपूर्ण ओमान की खाड़ी और Harmuj जलसन्धि के बीचो बीच स्थित है. दोस्तों भारत और ईरान के बीच संबंधों में एक मधुर अध्याय तब जुड़ा जब 1994 में पाकिस्तान द्वारा समर्थित इस्लामिक सहयोग संगठन प्रायोजित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार पारिषद के प्रस्ताव को ईरान ने रोक दिया. उसी समय दोनों देशों के बीच चाबहार पर बातचीत की शुरुआत हुई. इसके पहले 1993 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के ईरान दौरे ने दोनों देशों के बीच नए संबंधों की आधारशिला रखी थी. दोस्तों इसी बीच ईरान ने चाबहार बन्दरगाह को विकसित करने बात शुरू तो की पर बहुत कुछ नहीं हो पाया. 2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ईरान का दौरा किया और 2003 में ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद ख़टामी ने भारत का दौरा किया. ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद ख़टामी 2003 के गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि थे यानी  Chief Guest थे. ईरानी राष्ट्रपति के इसी दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच चाबहार समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. इस समझौते के अनुसार भारत से चाबहार तक एक समुद्री मार्ग यानी Sea लिंक का निर्माण किया जाना था और चाबहार से ईरानी राष्ट्रीय रेल रोड को जोड़ा जाना था जिसके परिणामस्वरुप भारत मध्य एशिया होते हुए यूरोप से सीधे जुड़ जाता. ईरान ने भारत को एक रेल्वे सम्पर्क या Railway Link बनाने के लिए आमंत्रित किया जो चाबहार को बाम शहर से जोड़ता हो. उल्लेखनीय है कि बाम शहर से अफ़गानिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को जोड़ने वाला सम्पर्क मार्ग बनाया जा सकता है. International North South Transport Corridore यानी INSTC के माध्यम से भारत ईरान होते हुए रूस से जुड़ जाता. आप को बताता चलूँ कि INSTC एक समुद्री, रेल,और सड़क राजमार्ग है जो भारत, ईरान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप के परिवहन को सुगम बनाते हुए इस क्षेत्र में व्यापार और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देता. दोस्तों चाबहार मामले पर भारत और ईरान के बीच वार्तालाप में अफ़गानिस्तान हमेशा शामिल रहा है. 2003 के भारत ईरान संयुक्त घोषणा में य़ह स्पष्ट रूप से कहा गया कि अफगानिस्तान मामले पर भारत और ईरान ने हमेशा सहयोग किया है. दोनों देशों ने जोर दिया कि अफ़गानिस्तान में बड़े स्तर पर पुनर्वास कार्यक्रम और निर्माण कार्य करने की आवश्यकता है जिसमें वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों का निर्माण भी शामिल है जो ईरान को अफ़गानिस्तान से जोड़ता हो. दोस्तों भारत और ईरान के बीच व्यापार का इतिहास बहुत पुराना है. दोनों देशों के बीच Bandar-अब्बास  बन्दरगाह से सैकड़ों साल से व्यापार होता आया है. चाबहार  का महत्व है इसकी भौगोलिक स्थिति,पाकिस्तान को ध्यान में रखते हुए. पाकिस्तान ने हमेशा अफगानिस्तान से गुजरने वाले भारतीय व्यापार का कड़ा विरोध किया है, इसी वजह से ईरान के Zaranj शाह से गुजरने वाले चाबहार मार्ग का भारत के लिए महत्व बढ़ जाता है. 2005 में भारत ने व्यापार को बढ़ाने के लिए Zaranj-Delaram मार्ग का जोखिम भरा निर्माण कार्य शुरू किया जिसे मार्ग- 6006 भी कहा जाता है. य़ह राजमार्ग ईरान सीमा को पार करके अफ़गानिस्तान को जोड़ता है. इस व्यापारिक मार्ग के महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस राजमार्ग पर कार्य करने वाले 130 से ज्यादा कर्मचारी विभिन्न हमलों में मारे जा चुके हैं.रणनीतिक महत्व के अलावा चाबहार का सपना सच होने से युद्ध की विभीषिका से ग्रस्त अफ़गानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारी मदद मिलेगी. चाबहार परियोजना समय के साथ बहुत सारी अड़चनों का सामना कर रही है. अमेरिकी प्रतिबंधों के साथ-साथ ईरान से संबंध तोड़ने का दबाव और इस क्षेत्र में चीन की धूर्ततापूर्ण राजनैतिक-व्यापारिक चालों ने इस परियोजना पर समय समय पर ग्रहण लगाये है.2012 में अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने साफ़ कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश लगाने के लिए ईरान को विश्व समुदाय से अलग थलग करना जरूरी हो गया है और इस सम्बंध में वे भारत सहित अनेक देशों से बातेँ कर रही हैं. दोस्तों अमेरिका द्वारा विरोध जताने के बाद भी चाबहार पर भारत आगे बढ़ता रहा. हिन्द महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों की बीच भारत ने 2012 में अफगानिस्तान के लिए 1 लाख टन गेहूं चाबहार बन्दरगाह से भेजा. 2013 में ग्वादर बन्दरगाह को विकसित करने की चीन की घोषणा के बाद भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री ने ईरान जाकर त्रय पक्षीय साझेदारी के अंतर्गत चाबहार पोर्ट को और बेहतर बनाने यानी Upgrade करने की घोषणा की. दोस्तों 2016 में प्रधानमंत्री मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति Rauhani और अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ घानी के साथ मिलकर एक महत्तवपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए और 500 मिलियन डॉलर के निवेश की घोषणा की. इसके अंतर्गत शाहिद Behesti टर्मिनल और Zahedan के लिए एक रेल्वे लाइन का निर्माण कराने की घोषणा की परन्तु 2018 में अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंधों की घोषणा कर दी. दोस्तों मोदी सरकार ने अफगानिस्तान को सहायता पहुँचाने  के उद्देश्य से अमेरिकी प्रतिबंधों में चाबहार पर कुछ गुंजाईश हासिल करने में सफलता प्राप्त की पर दूसरे मामलों पर अमेरिका के सामने झुकना पड़ा और अंततः 2019 में ईरान से तेल आयात बन्द करना पड़ा. ईरान ने भी भारत को अगस्त 2020 में Zahedan rail परियोजना से बाहर कर दिया और इसपर अकेले ही काम करने का निर्णय लिया. ईरान के इस निर्णय का कारण था प्रतिबंधों के दबाव में परियोजना पर भारत की धीमी गति या सुस्ती. दोस्तों 2021 में तालिबान द्वारा अफ़गानिस्तान पर पूर्ण कब्जा स्थापित करने के बाद नीतिगत परिवर्तन हुआ. इन सबके बावजूद भी भारत ने चाबहार बन्दरगाह से अफ़गानिस्तान को मानवीय आधार पर सहायता जारी रखी. भारत ने 20 लाख टन से ज्यादा गेहूं और कई दुसरी सामग्री के अलावा ईरान को 42000 लीटर के करीब कीटनाशक की आपूर्ति की. दोस्तों 13 मई 2024 को भारत की तरफ से Indian Port Global Ltd और ईरान की ओर से Maritime Organisations of Iran ने चाबहार बन्दरगाह के प्रबंधन और विकास के लिए 10 वर्षों के समझौते पर हस्ताक्षर किए. भारत की तरफ से 120 मिलियन डॉलर के निवेश के वादे के साथ 250 मिलियन डॉलर का लोन परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए. चाबहार परियोजना को तेजी से आगे बढ़ाने के पीछे का लक्ष्य है 32 घाटों के निर्माण के साथ 82 मिलियन टन कार्गो  प्रतिवर्ष. दोस्तों अमेरिका के स्टेट Department ने साफ़ धमकी दी है कि चाबहार परियोजना से जुड़ी भारतीय कंपनियों के विरुद्ध प्रतिबंध लगाए जायेंगे. बावजूद इसके भारत अपनी प्रतिबद्धता पर अडिग है. समय बतायेगा कि चाबहार परियोजना दशकों से चल रहा प्रयास कितना फलीभूत हो पाता है. 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ओस्लो समझौता

कई दशकों से जारी इजराइल-फ़िलीस्तीन युद्ध में एक ऐसा भी वक़्त आया जब दोनों के बीच शांति की नयी उम्मीदें सामने आयीं.  दोस्तों बात 1992 की है जब इजराइल के प्रधानमंत्री यीजाक राबिन ने फ़िलीस्तीन के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाया और फ़िलीस्तीनी नेता यासर अराफात ने भी आगे बढ़कर उस शानदार पहल का स्वागत किया. दोनों ही नेता अपने अपने मुद्दे सुलझाने के लिए सामने आए. इजराइली प्रधानमंत्री यीजाक राबिन ने माना कि  फ़िलीस्तीनी मुक्ति संगठन PLO कोई आतंकवादी संगठन नहीं है बल्कि वे अपना देश चाहते हैं और इसका सम्मान किया जाना चाहिए.  फ़िलीस्तीनी नेता यासर अराफात ने भी सकारात्मक रवैय्या अपनाते हुए इजराइल के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार भी किया और मान्यता भी दी.  दोस्तों आज बात करेंगे 30 साल पहले हुए ओस्लो समझौते की जो फ़िलीस्तीनियों के लिए शान्ति की अन्तिम उम्मींद लेकर आया था पर य़ह फ़िलीस्तीनयों की आशाओं की अन्तिम किरण इजराइली आन्तरिक राजनीति का शिकार हो गयी. उसका परिणाम य़ह हुआ कि वह खूनी संघर्ष जो 1993 में ही खत्म हो जाना चाहिए था वह आज भी उसी निर्दयता के साथ जारी है.  ...

अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और इसका विश्लेषण

संविधान  के अनुच्छेद 370 को खत्म करने के सरकार के फैसले चुनौती दी गई थी सुप्रीम कोर्ट में इस 11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के 5 अगस्त 2019 के आदेश को सही ठहराया. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या असर भारतीय संघीय व्यवस्था पर पड़ेगा. फैसले के महत्तवपूर्ण पक्ष क्या हैं. केन्द्र राज्य संबंधों का इस पर क्या प्रभाव पड़ेगा. राष्ट्रपति शासन के दौरान राष्ट्रपति की क्या भूमिका होगी. जम्मू और कश्मीर को पूर्ण राज्य के दर्जे के संबंध में फैसले में क्या है.  दोस्तों केन्द्र सरकार ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू और कश्मीर से संबंधित संविधान की धारा 370 को समाप्त करने की घोषणा की थी. इस फैसले के खिलाफ 23 याचिकाएं दायर की गयी थीं. जिन पर सुप्रीम कोर्ट में 16 दिन तक सुनवाई चली और सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर 2023 को सुनवाई पूरी करने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था. इस संवैधानिक पीठ मे चीफ जस्टिस श्री DY Chandrachurn के अलावा चार और Judges थे Justice SK कौल, जस्टिस संजीव खन्ना  जस्टिस BR Gawai, जस्टिस सूर्यकांत. गृह मंत्री अमित शाह ने 5 अगस्त 2019 को राज्यसभा में जम्म...

क्या होता है Optical फाइबर, कैसे काम करता है य़ह

 ज़न संचार के क्षेत्र में विज्ञान की तरक्की ने आश्चर्यजनक रूप से से आम लोगों के जीवन में क्रान्ति पैदा कर दिया है.आज मोबाइल फोन आम लोंगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. इसके बगैर शायद एक कदम भी चलना मुश्किल है. Corona महामारी के दौरान हम सभी ने देखा कि वह एक चीज जिसने हम सभी को आपस में जोड़कर रखा था वह था इन्टरनेट. आज हाई स्पीड इन्टरनेट की वजह से वीडियो चैट कर सकते हैं, ऑनलाइन payment कर सकते हैं, Classes attend कर सकते हैं  और तो और मीटिंग्स कर सकते हैं. दोस्तों कभी सोचा है ये सब कैसे सम्भव हो पाता है. य़ह सबकुछ सम्भव हो पाता है Optical फाइबर से. य़ह Optical फाइबर वास्तव में है क्या. अखिरकार यह काम कैसे करता है. कैसे सम्भव हो पाता है य़ह सबकुछ.  Optical फाइबर वास्तव में बहुत ही महीन बेलनाकार काँच यानी ग्लास के धागे होते हैं. इनकी गोलाई हमारे आपके एक साधारण बाल के बराबर होती है. ये काँच के धागे आश्चर्यजनक रूप से शब्दों को, चित्रों को, वीडियो, टेलीफोन कॉल या कोई ऐसी चीज जिन्हें डिजिटल सूचना में Encode किया जा सकता है, को लंबी दूरी तक भेज सकते हैं वह भी...