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PMLA or Prevention of Money Laundering Act 2002

 PMLA क्या है. य़ह कब और क्यों अस्तित्व में आया. इसका मूल उद्देश्य क्या था और सबसे बड़ा प्रश्न क्या PMLA वास्तव में पैर नहीं सर के बल खड़ा है. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले आप से एक छोटी सी गुजारिश यदि आपने अभी तक मेरे चैनल को subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ इसको subscribe कर लीजिए और बेल icon को प्रेस कर दीजिए. आते हैं पॉइन्ट पर. दोस्तों जब 2002 में PMLA यानी Prevention of Money Laundering Act  बनाया गया तो इसका उद्देश्य था उस काले धन को पकड़ना जो अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर Drug Trafficking यानी जो नशे के कारोबार से उत्पन्न हो रहा है और इस मात्रा में कि विश्व अर्थव्यवस्था को सीधे चोट पहुंचा रहा है. अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर य़ह भावना व्यापक रूप ले रही थी कि जिस स्तर पर ड्रग्स यानी नशीले पदार्थों का कारोबार काला धन पैदा कर रहा है और वैध अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनता जा रहा है कि उससे कई देशों की एकता और संप्रभुता को खतरा पहुंच रहा है.  दोस्तों आइए जानते हैं कि इसकी पृष्ठभूमि क्या है. संयुक्तराष्ट्र संघ ने नशीले ड्रग्स के अंतरराष्ट्रीय कारोबार को गंभीरता से लेते हुए 1988 में नशीले और Psychotropic पदार्थों के अवैध कारोबार के विरुद्ध एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया. सभी देशों से आग्रह किया गया कि वे ड्रग्स अपराध और उससे संबंधित अन्य गतिविधियों से उत्पन्न काले धन की लाउंडरिंग की रोकथाम के लिए तत्काल कड़े कदम उठाएं. इसके परिणामस्वरूप विश्व के सात औद्योगिक देशों ने जुलाई 1989 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक सम्मेलन आयोजित किया और काले धन को सफेद बनाने की समस्या का परीक्षण करने और इस गंभीर खतरे से निबटने के लिए एक Financial Action Task Force यानी  FATF का गठन किया. दोस्तों 1990 में संयुक्तराष्ट्र साधारण सभा ने Political Declaration  and Global  Programme of Action नाम से प्रस्ताव पारित करके सभी सदस्य देशों से अपेक्षा की गई कि वे नशीले पदार्थों के कारोबार से उत्पन्न काले धन को सफेद बनाए जाने
पर प्रभावी तौर पर रोकथाम के लिए कड़े कानून बनायें. दोस्तों संयुक्तराष्ट्र संघ के इस प्रस्ताव को ठोस रूप देने के उद्देश्य से भारत सरकार ने Financial Action Task Force की सिफारिशों का प्रयोग ऐसा कानून बनाने के लिए किया जिससे प्रभावकारी तरीकों से ड्रग्स मनी यानी नशीले पदार्थों के कारोबार से उत्पन्न काले धन को सफेद बनाने से रोका जा सके. चूँकि नशीले पदार्थों का कारोबार सीमा पार से चलायी जाने वाली गतिविधि है तो संयुक्तराष्ट्र संघ ने 10 जून 1998 को सदस्य देशों का एक विशेष सत्र बुलाया विषय था Countering Drug Problem Together यानी मिलकर सामना करते हैं ड्रग्स की समस्या का और काले धन को सफेद बनाने के कारोबार के विरुद्ध प्रभावी संग्राम की तात्कालिक आवश्यकता पर एक और घोषणा पत्र जारी किया. संयुक्तराष्ट्र संघ की घोषणा को ध्यान मे रखकर भारतीय संसद ने सन 2002 में Prevention of Money Laundering Act 2002 यानी PMLA पास किया पर य़ह लागू किया गया 2005 में. दोस्तों य़ह जानना जरूरी था कि वह क्या परिस्थितियाँ थीं और किस उद्देश्य के लिए काले धन के विरुद्ध मूल कानून बनाया गया था. आप को य़ह स्पष्ट हो गया होगा कि इस कानून का मूल उद्देश्य था ड्रग मनी को रोकना यानी नशीले पदार्थों के कारोबार से उत्पन्न काले धन को सफेद करने से रोकना. ध्यान देने की बात य़ह है कि PMLA 2002 में IPC के अंतर्गत आने वाले कुछ अपराधों को भी शामिल किया गया है और इसके साथ Narcotics Drug and Psychotropic Substances Act 1985 को भी. दोस्तों संयुक्तराष्ट्र घोषणा पत्र और Financial Action Task Force का उद्देश्य था ड्रग मनी यानी नशीले पदार्थों के कारोबार से उत्पन्न काले धन की रोकथाम. परन्तु भारत में इस कड़े कानून PMLA को संशोधनों के माध्यम से एक अलग चरित्र दे दिया गया. दोस्तों मनी लाउंडरिंग का सीधा अर्थ है काले कारनामों से हासिल धन को सफेद करना या उसे वैध रूप देना. लेकिन भारत का मनी लॉन्डरिंग कानून PMLA मूल रूप से लागू होता नशीले पदार्थों के कारोबार से प्राप्त उस काले धन पर  जिसे सफेद करने का प्रयास किया जा रहा है. समय समय पर लाए गए संशोधनों के माध्यम से कई सारे दूसरे अपराधों को भी PMLA में शामिल कर लिया गया जिनका ड्रग्स के काले कारोबार से कोई लेना देना नहीं है. परिणाम स्वरूप PMLA कानून का मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट गया. आश्चर्य की बात है कि जिस संयुक्तराष्ट्र संघ के प्रस्ताव के आधार पर भारत में PMLA कानून बनाया गया उस प्रस्ताव में भी सिर्फ नशीली दवाओं के कारोबार से प्राप्त धन की लाउंडरिंग की बात की गयी है. सबसे बड़ी बात यह है कि ड्रग मनी लॉन्डरिंग को एक अति गंभीर आर्थिक अपराध के रूप में देखा गया जो विश्व अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए खतरा बन चुका था और चिंता तो यहां तक व्यक्त की गयी य़ह कला धन कई देशों की संप्रभुता के लिए खतरा बन चुका है. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर य़ह जरूरी समझा गया कि ड्रग मनी लॉन्डरिंग जैसे अपराध से निबटने के लिए कड़े कानून की जरूरत है. अब य़ह स्पष्ट हो जाता है कि PMLA का मूल उद्देश्य ही है अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर फैले नशीले पदार्थों के कारोबार से प्राप्त काले धन को सफेद बनाने के अपराध पर नियंत्रण. दोस्तों संविधान का अनुच्छेद 253 भारतीय संसद को य़ह ताकत देता है कि वह अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों को लागू करने के लिए जरूरी कानून बनाए और उसी के तहत भारतीय संसद ने PMLA कानून बनाया. संविधान की धारा 253 य़ह भी कहती है कि यदि किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते को लागू करने के लिए देश की संसद कोई कानून बनाती है तो उसका विषय वस्तु भी वही होना चाहिए जो अंतर्राष्ट्रीय समझौते का है. प्रश्न उठता है कि जब नशीली दवाओं की तस्करी से संबंधित अन्तर्राष्ट्रीय समझौते के अन्तर्गत PMLA को बनाया गया तो इसमें ड्रग मनी लाउंडरिंग ही होना चाहिए था फिर उसमें कई दूसरे अपराध क्यों शामिल किए गए जिनमें से कई तो पहले से IPC की सूची में हैं या उनके लिए अलग से कानून है. यहां तक कि सातवीं अनुसूची के 13th आइटम में साफ़ तौर पर लिखा है कि भारत अंतरराष्ट्रीय समझौतों में भाग लेगा और वहाँ लिए गए निर्णयों को लागू करेगा. ऐसी अवस्था में PMLA के अन्तर्गत सिर्फ Drug मानी लाउंडरिंग ही होना चाहिए. आश्चर्य की बात है कि देश में PMLA कानून मुख्यतः उन अपराधों  पर लागू किया जा रहा है जो बाद में संशोधनों के माध्यम से जोड़े गए हैं और मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट गया. दोस्तों PMLA कानून बनाया गया था उन खतरनाक अपराधियों के लिए जो Drug के काले धंधे में शामिल थे इसलिए इस कानून के प्रावधान भी अत्यंत कठोर बनाए गए हैं. और अब ये कठोर कानूनी प्रावधान दूसरे अनुसूचित अपराधों पर लागू किए जा रहे हैं तो प्रश्न उठता है कि य़ह कहाँ तक उचित है. प्रश्न य़ह भी उठता है कि जिन दूसरे अनुसूचित अपराधों के लिए PMLA कानून को लागू किया जा रहा है क्या उससे उस स्तर का काला धन उत्पन्न हो रहा है जिससे विश्व अर्थव्यवस्था की स्थिरता का ख़तरा हो और कई देशों की संप्रभुता दांव पर हो. दोस्तों 1988 में  Prevention of Corruption Act बनाया गया जिसका उद्देश्य था सरकारी अधिकारियों में भ्रष्टाचार की रोकथाम और 2009 में इस कानून को अनुसूचित अपराधों में शामिल कर दिया गया. आज PMLA  पूरी कठोरता के साथ लोकसेवकों यानी Public Servants पर लागू किया जा रहा है. बड़ा प्रश्न य़ह है कि भ्रष्टाचार का आरोपी लोकसेवक  यानी Public Servant और नशीली दवाओं की तस्करी करने वाला खतरनाक अपराधी दोनों PMLA की नज़र में समान हैं. क्या दोनों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए. इस कानून का सबसे काला पक्ष य़ह है कि अभियुक्त को स्वतः दोषी मान लिया जाता है जब तक कि वह निर्दोष साबित न हो जाय. आम तौर अन्य आपराधिक कानूनों में अभियुक्त तब तक निर्दोष है जब तक कि दोषी सिद्ध न हो जाय. यही वजह है तमाम मामलों में अभियुक्त को संदेह का लाभ मिल जाता है लेकिन PMLA मामले में कानून का सिर नीचे और पैर ऊपर है. दोस्तों PMLA का सेक्शन 45 कहता है कि अभियुक्त को तभी जमानत मिल सकती है यदि माननीय जज सन्तुष्ट हैं कि अभियुक्त निर्दोष है .ऐसा सोचना किस जज के लिए आसान होगा. यही कारण है कि नीचे से लेकर ऊपर तक सभी न्यायालयों में अभियुक्त की जमानत की अर्जी खारिज हो जाती है परिणामस्वरुप अभियुक्त लंबे समय तक जेल में सड़ता रहेगा. दोस्तों PMLA के अंतर्गत जमानत के प्रावधान को 2018 में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने निकेश ताराचंद vs भारत सरकार मामले में अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन का दोषी पाया और इसे असंवैधानिक करार दे दिया परन्तु सरकार ने कुछ संशोधनों के साथ जमानत के प्रावधान को फिर से बहाल कर दिया जिसे बाद में तीन जजों की बेंच ने मदनलाल चौधरी vs भारत सरकार मामले में संविधान सम्मत ठहराया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि य़ह प्रावधान तर्कसंगत है और PMLA के उद्देश्य से सीधे तौर पर सम्बंधित है. समस्या य़ह है कि PMLA बनाया ही गया था नशीले पदार्थों के कारोबार से उत्पन्न काले धन को सफेद बनाने यानी मनी लाउंडरिंग की रोकथाम के लिए ताकि अर्थव्यवस्था को अस्थिरता से बचाया जा सके. आज बहुत साधारण मामलों में ऐसे कठोर कानून का प्रयोग किया जा रहा है. य़ह एक गंभीर और विचारणीय प्रश्न है. दोस्तों लोकतन्त्र में न्यायालय आम लोंगों की अन्तिम उम्मींद होते हैं या कह सकते हैं य़ह आम लोंगों की उम्मीदों की अन्तिम चौखट होते हैं. लोकतन्त्र भी तभी तक जिंदा रहेगा जब तक लोंगों का भरोसा देश की न्याय व्यवस्था में बना रहेगा. 

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