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अनुच्छेद 21,भारतीय संविधान

संविधान का अनुच्छेद 21 सभी व्यक्तियों को जीवन जीने और निजी स्वतंत्रता के अधिकार को सुरक्षा प्रदान करता है .अनुच्छेद 21 के अनुसार No person shall be deprived of his life or personal liberty except according to the procedure established by law. यानी किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता सिवाय विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के. दोस्तों सीधे तौर पर इसका अर्थ य़ह हुआ कि बिना किसी कानूनी आधार के कोई भी सरकारी संस्था या अधिकारी किसी भी व्यक्ति के वैयक्तिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं कर सकते. आशय यह है कि किसी भी व्यक्ति के साथ दैहिक ज़ोर जबरदस्ती यानी Physical coercion 
नहीं किया जा सकता जब तक कि इस कदम का कोई न्यायिक औचित्य न हो. जब कभी भी राज्य या राज्य के अधिकारी या एजेंट किसी व्यक्ति को उसके निजी स्वतंत्रता से वंचित करते हैं तो उनका य़ह कदम तभी सही ठहराया जा सकता है जब इस कदम का कोई वैधिक आधार हो और विधि द्वारा निर्धारित 
प्रक्रिया का सख्ती और ईमानदारी से पालन किया गया हो. यहाँ पर य़ह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अनुच्छेद 21 में विधि शब्द का अर्थ है वैध रूप से निर्मित कानून जो उचित, निष्पक्ष और तर्कसंगत हो. दोस्तों ब्रिटिश संविधान के तर्ज़ पर ही भारत का संविधान भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत उपलब्ध Habeas Corpus Writ के माध्यम से सुरक्षित करता है. कोई भी गिरफ्तार व्यक्ति Habeas Corpus Writ के माध्यम से अपनी गिरफ्तारी के विरुद्ध न्यायालय से गिरफ्तारी के कानूनी आधार के परीक्षण की प्रार्थना कर सकता है और यदि न्यायालय को उस व्यक्ति की गिरफ्तारी का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं मिलता तो न्यायालय उसे रिहा करने का आदेश दे सकती है. यदि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के पर्याप्त वैधानिक कारण उपलब्ध हैं पर विधि द्वारा स्थापित शर्तों का अनुपालन कड़ाई से नहीं किया गया है तो इस अवस्था में भी न्यायालय उस व्यक्ति की रिहाई का आदेश जारी कर सकती है. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अनेक अवसरों पर टिप्पणी की है कि जो य़ह सोचते हैं कि दूसरों को उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करना उनकी दृष्टि में उनका कर्तव्य है तो उन्हें पूरी सख्ती और ईमानदारी से कानून के प्रकार और नियमों का पालन करना चाहिए. दोस्तों किसी भी देश में लोंगों को Absolute यानी असीमित स्वतंत्रता प्रदान नहीं किया जा सकता .ब्रिटिश शासन व्यवस्था में संसद में बैठे ज़न प्रतिनिधि मिलकर सामुहिक हितों, राज्य की सुरक्षा और समय की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए य़ह सुनिश्चत करते हैं कि लोंगों के अधिकारों की क्या सीमा होनी चाहिए और कहां तक उनमें कटौती उचित है. इसी सिद्धांत को अपनाते हुए भारत ने जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अधीन रखा. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रक्रिया का निहितार्थ है निष्पक्ष प्रक्रिया यानी Fair Proceedure और इस प्रकार अनुच्छेद 21 को मनमाने-पूर्ण विधि निर्माण के विरुद्ध रक्षा कवच के रूप में स्थापित किया गया है. दोस्तों इस परिवर्तन का भी अपना एक इतिहास है. 1978 तक सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि में संविधान में ऐसी कोई गारण्टी नहीं थी जो विधायिका को लोंगों की वैयक्तिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करने से रोक सकती हो या प्रतिबंधित करती हो. इसका अर्थ य़ह हुआ कि यदि योग्य विधायिका ऐसा कोई कानून बनाती है जो विशेष परिस्थितियों में और विशेष तरीके से किसी व्यक्ति को उसके वैयक्तिक स्वतंत्रता से वंचित करती है तो उस कानून की वैधता को इस आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती कि य़ह कानून अतार्किक,अन्यायपूर्ण और अनुचित है. अमेरिका के Due Process क्लॉज के अन्तर्गत कोर्ट ने ऐसे किसी भी कानून को असंवैधानिक घोषित करने का अधिकार अपने पास रखा है जो  किसी व्यक्ति को उसके वैयक्तिक स्वतंत्रता से वंचित करता है और जो कि कोर्ट की धारणा के आधार पर Due Process के अनुसार तार्किक और निष्पक्ष नहीं है. लेकिन इंग्लैंड में य़ह सम्भव नहीं है क्योंकि वहाँ कोर्ट के पास य़ह शक्ति नहीं है कि वह संसद द्वारा पारित कानून को अवैध घोषित कर दे. इंग्लैंड में वैयक्तिक स्वतंत्रता का अस्तित्व उतना ही है जिसकी अनुमति संसद देती है या स्वतंत्रता की सीमा का निर्धारण संसद में बैठे ज़न प्रतिनिधि करते हैं. दोस्तों AK Gopalan vs State of Madras 1950 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से य़ह विचार प्रतिपादित किया कि चूँकि हमारे संविधान ने विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया यानी Proceedure established by law को अपनाया है इसलिए संविधान के अनुच्छेद 21 में अमेरिका के Due Process के स्थान पर इंग्लैंड के वैयक्तिक स्वतंत्रता की अवधारणा को प्राथमिकता दी गयी है. AK Gopalan VS State of Madras के मामले में अल्पमत का विचार था कि संविधान की इस व्याख्या का परिणाम य़ह होगा कि सबसे महत्त्वपूर्ण मौलिक अधिकार जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता को विधायिका कि दया दृष्टि पर छोड़ देना. इस बात पर भी जोर दिया गया है कि भारत के संविधान में वैयक्तिक स्वतंत्रता के रक्षा कवच के रूप में अनुच्छेद 21 के अलावा कोई और प्रावधान नहीं है. जैसे प्राकृतिक विधि Natural Law और सामान्य विधि Common Law परिणामस्वरूप यदि योग्य विधायिका लोंगों की वैयक्तिक स्वतंत्रता का हनन करती है  या उसमें कटौती करती है तो पीड़ित लोंगों के पास राहत का कोई रास्ता नहीं होगा. दोस्तों भारत के संवैधानिक विधि का जो सफर Gopalan VS State of Madras से प्रारंभ हुआ था वह 1978 के मेनका गांधी बनाम भारत सरकार में पूरा हो गया. गोपालन केस का अल्पमत मेनका केस में बहुमत में परिवर्तित हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने निर्णय को पलटते हुए बहुत ही स्पष्टता के साथ कहा कि अनुच्छेद 19 और  अनुच्छेद 21 वाटर टाइट compartment नहीं हैं यानी एक दूसरे से बिलकुल ही अलग नहीं हैं. अनुच्छेद 21 में अंतर्निहित वैयक्तिक स्वतंत्रता व्यापक है जिसमें बहुत सारे अधिकार समाहित हैं इनमें से कुछ अधिकारों को अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत अतिरिक्त सुरक्षा मिली हुई है. इसलिए अनुच्छेद 19 और 21 आपस में Overlapping हैं यानी इनमें परस्परता है. दोस्तों अनुच्छेद 21 में आने वाले कानूनों को अनुच्छेद 19 की आवश्यकताओं को भी पूरा करना होगा. यदि राज्य किसी व्यक्ति को उसके निजी स्वतंत्रता से वंचित करने के लिए कोई कानून बनाता है तो इसकी प्रक्रिया का भी स्पष्ट निर्धारण होना चाहिए जो कि अतार्किक, अनुचित और मनमाना पूर्ण नहीं हो सकता .दोस्तों जब किसी की वैयक्तिक स्वतंत्रता को वंचित करने वाले कानून की वैधता का परीक्षण करने के लिए तार्किकता को आधार बनाया जाता है तो ऐसा कानून असंवैधानिक होगा यदि य़ह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है. उदाहरण के लिए यदि किसी का पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया जाता है और उस व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया जाता है या उस आदेश के प्रति अपना विरोध दर्ज कराने का भी अवसर नहीं दिया जाता. दोस्तों गोपालन मामले से लेकर मेनका मामले तक आने में Judicial Exploration यानी न्यायिक अन्वेषण एक चक्र पूरा करता है. मेनका केस का ही अभी तक न्यायालयों द्वारा पालन किया जा रहा है .दोस्तों सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में सिर्फ जीवन जीना या पशु अस्तित्व ही नहीं है बल्कि सही अर्थों में यह मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार है. इसमें निलम्बन के दौरान निम्नतम निर्वाह भत्ता और इसके दूसरे पक्ष शामिल हैं जो मानव जीवन को अर्थपूर्ण, सम्पूर्ण और जीने योग्य बनाते हैं. इसमें बहुत सारे अधिकार और मामले आ जाते हैं. दोस्तों संविधान का अनुच्छेद 21 लोंगों को जीवन जीने का अधिकार देता है पर मरने का अधिकार नहीं देता. भारत में सहायता प्राप्त आत्महत्या यानी Assisted Suicide और ईच्छामृत्यु यानी Active Euthanasia की अनुमति कानून नहीं देता यानी य़ह गैरकानूनी है. सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने ज्ञान कौर मामले में स्पष्ट किया कि भारत में Assisted Suicide और Euthanasia यानी ईच्छामृत्यु 
दोनों ही विधि सम्मत नहीं हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा रामचंद्रन शानबाग मामले में कहा कि हमारे देश में ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जिसके अन्तर्गत Permanent Vegetative State (PVS) यानी कोमा में पड़े व्यक्ति जो स्वयं कोई निर्णय लेने में असमर्थ है से लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा लिया जाय. सुप्रीम कोर्ट ने Passive Euthanasia पर कुछ प्रक्रिया का निर्धारण किया है जो तब तक कानून का काम करेगा जब तक संसद इस विषय पर कोई कानून नहीं बनाती. दोस्तों Fair ट्रायल यानी निष्पक्ष सुनवाई का अर्थ य़ह हुआ कि ऐसी सुनवाई जिसमें अभियुक्त, गवाह , या वह कारण जिसके लिए ट्रायल चल रहा है के विरुद्ध न तो कोई पक्षपात हो न ही कोई पूर्वाग्रह हो. यदि किसी गवाह को धमकी दी जाती है या उसे गलत प्रमाण देने के लिए बाध्य किया जाता है तो य़ह Fair ट्रायल में नहीं आयेगा. यदि Fair ट्रायल नहीं हुआ है, अपराधी बरी भी हो गया है और यदि सुनवाई में कहीं कोई दोष पाया जाता है तो भी सुप्रीम कोर्ट दोबारा ट्रायल का आदेश दे सकती है. दोस्तों किसी व्यक्ति का नार्को विश्लेषण परीक्षण या BEAP परीक्षण वह भी बातचीत के माध्यम से किया जाता है तो य़ह निजता यानी Privacy की निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन होगा. किसी को भी नार्को परीक्षण के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. यदि य़ह परीक्षण बलपूर्वक किया जाता है तो य़ह मानसिक निजता यानी  Mental Privacy में हस्तक्षेप होगा. दोस्तों Counter Insurgency Operations यानी विद्रोह के विरूद्ध जवाबी कार्रवाई में कम पढ़े लिखे, मामूली हथियारों के साथ नौजवानों को तैनात करना उनके जीवन को खतरे में डालने के समान है. इसको जीविकोपार्जन के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता. दोस्तों खाप पंचायतों द्वारा Honour Killing या अन्य अत्याचार का आदेश जारी किया जाता है विशेष रूप से उन लड़के लड़कियों के विरुद्ध जो भिन्न जाति और धर्म के होने के बावजूद विवाह करना चाहते हैं या कर चुके हैं. य़ह पूरी तरह से निजता के अधिकार का उल्लंघन है. य़ह गैरकानूनी है और इसे समाप्त किए जाने की जरूरत है. दोस्तों पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु विधि द्वारा शासित सभ्य समाज के लिए घृणित अपराध है. संविधान के अनुच्छेद 21 और 22(1) में प्रदत्त अधिकारों का सावधानी पूर्वक सुरक्षा की आवश्यकता है. जाँच या पूछताछ के दौरान या अन्यथा किसी भी प्रकार की यातना, क्रूरतापूर्ण या अमानवीय व्यवहार अनुच्छेद 21 का उल्लंघन माना जायेगा. दोस्तों Due Process और विधि का शासन मानवाधिकार सुरक्षा से सीधे जुड़े हुए हैं. ये अधिकार तभी सुरक्षित रह सकते हैं जब नागरिकों को न्यायालय जाने का रास्ता सुगम हो. निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार चाहे वह अभियुक्त को 
 या अभियोजक को न दे पाना कानून के Due Process का उल्लंघन होगा. निष्पक्ष सुनवाई के लिए आवश्यक है कि न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक जल्दबाजी न हो, पक्षपात न हो या सबकुछ पहले से ही सुनिश्चित न हो. दोस्तों मृत्युदंड के मामले में अनावश्यक विलंब होने की अवस्था में सुप्रीम कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने विचार व्यक्त किया कि मृत्युदंड देने में विलंब का कारण कितना भी गंभीर क्यों न हो पर य़ह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है. मृत्युदंड देने में अनावश्यक, असामान्य और अतार्किक विलंब वास्तव में यातना के समान है और इस आधार पर मृत्युदंड का आजीवन कारावास में परिवर्तन न्यायोचित है. सुप्रीम कोर्ट का य़ह भी मत था कि विलंब के प्रकार के बारे में कोई व्यापक दिशा निर्देश जारी करना सम्भव नहीं है, इसका परीक्षण अलग अलग मामलों के आधार पर ही किया जा सकता है. शत्रुघ्न चौहान मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा को कम करते हुए  लिखा कि मृत्युदंड में लंबी देरी का अभियुक्त पर अमानवीय प्रभाव पड़ता है. ऐसा विलंब जो अभियुक्त के नियंत्रण से बाहर हो मृत्युदंड की सजा को कम करने का उचित आधार है. दोस्तों जीवन को अर्थपूर्ण और जीने योग्य बनाने के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या करते हुए बहुत सारे अधिकार निकाले हैं जैसे जीविकोपार्जन का अधिकार, बंधुआ मजदूरी के विरुद्ध अधिकार, पर्यावरण का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, निजता का अधिकार, कानूनी सहायता का अधिकार, इत्यादी करीब 30 से ज्यादा. दोस्तों अप्राकृतिक अपराधों जैसे होमो Sexuality की वैधानिकता को 2009 में IPC के सेक्शन 377 के अंतर्गत दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई . 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने IPC के सेक्शन 377 जो दो बालिगों के बीच सहमति के आधार पर निजी यौन संबंधों का अपराधीकरण करता है, को संविधान की धारा 14,15,और 21 का उल्लंघन माना. हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने सुरेश कुमार कौशल vs नाज़ फाउंडेशन मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए कहा कि 150 साल पुराना सेक्शन 377 असंवैधानिक नहीं है. दोस्तों 86वां संविधान संशोधन 2002 के माध्यम से अनुच्छेद 21A जोड़ा गया जिसके अनुसार राज्य छह से लेकर 14 वर्षं के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगा. शिक्षा सिर्फ निःशुल्क और अनिवार्य ही नहीं होनी चाहिए बल्कि गुणवत्तापूर्ण होनी चाहिए. शिक्षा प्रदान करने में आर्थिक, सामाजिक एवं साँस्कृतिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. संविधान की धारा 21A के अंतर्गत निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रत्येक बच्चे का मौलिक अधिकार बन चुका है.  राज्य की जिम्मेदारी है कि वह 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराए. हाल के अपने एक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 21A के अंतर्गत निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा और Right to education Act 2009 दोनों को सभी स्कूलों पर लागू किया जाना चाहिए. इनमें गैर सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक स्कूल और गैर अल्पसंख्यक स्कूल शामिल नहीं हैं. 

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