यह एक दुर्भाग्य की बात है कि आज देश में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से कहीं अधिक कोचिंग सेण्टर हैं. भारत के कुछ शहर तो पहचानें ही जाते हैं कोचिंग सेंटर की वजह से,उदाहरण के तौर पर राजस्थान का कोटा शहर. यहाँ के कोचिंग centers के बारे में आम धारणा है कि उनमें पढ़ाई करके
JEE/NEET जैसे कठिन परिक्षाओं को पास कर पाना आसान हो जाएगा. दोस्तों, कभी यहाँ की कोचिंग centers के शानदार प्रदर्शन के लिए जाना जाने वाला कोटा शहर आज कल कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को लेकर ज्यादा चर्चा में है. छात्रों की बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं ने अभिभावकों के साथ साथ पूरे देश को झकझोर दिया है. देस में एक नयी बहस खड़ी हो गई है और य़ह है महत्वाकांक्षाओं और उपलब्ध अवसरों के बीच की बढ़ती खाई. जानी-मानी सर्वे संस्था लोकनीति-csds ने कोटा में छात्रों के बढ़ते हुए आत्महत्या की घटनाओं के मद्देनज़र एक विस्तृत सर्वे किया और य़ह जानने-समझने की कोशिश की कोटा आने वाले छात्रों को किस तरह के मानसिक दबाव से गुजरना पड़ता है. सर्वे के अनुसार अभिभावकों का दबाव, शैक्षणिक तनाव, अर्थिक समस्याएँ इत्यादि छात्रों पर भारी पड़ रहे हैं. 2021 में भारत में आत्महत्या से जान गंवाने वालों में सारे लोंगों में 8%छात्र हैं. नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार छात्रों की बढ़ती आत्महत्या के पीछे अनेक कारण हैं पर main कारण है शैक्षणिक दबाव. कोटा शहर जो कि देश का सबसे जाना माना और सबसे बड़ा केन्द्र हैं jee/NEET जैसी परीक्षाओं के कोचिंग संस्थानों का, वहाँ इस साल अब तक 25 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं जो राजस्थान के इस छोटे से शहर की अब तक की सबसे बड़ी संख्या है. अत्यधिक चिन्ता की बात तो यह है कोटा में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों में 7%ऐसे छात्र हैं जो कम से कम एक बार आत्महत्या का प्रयास कर चुके हैं.य़ह सबकुछ निकल कर आया है लोकनीति - CSDS के सर्वे में जिसका उद्देश्य था य़ह जानना कि छात्रों की चिन्ताओं का कितना असर उनके मानसिक स्वास्थ्य यानी
Mental Health पर पड़ रहा है. सर्वे के अनुसार कोटा में छात्रों को अलग अलग तरह के दबाव का सामना करना पड़ रहा है. बहुत से छात्र सोचते हैं कि JEE/NEET परीक्षा निकालना उनके लिए बेहद जरूरी है एक बेहतर जिंदगी पाने के लिए. यही वजह है कि वे कठिन परिश्रम करते हैं. इस बात का डर कि शायद परीक्षा न निकल पाए इसका सीधा असर उनके मानसिक स्थिति पर पड़ता है. यही वजह है करीब 20% छात्र परीक्षा में अच्छा न कर पाने के भय से ग्रसित हैं. कभी-कभी तो ऐसे छात्रों की संख्या 30% से भी ज्यादा हो जाती है. 20% छात्रों ने माना कि वे भी कभी-कभी ऐसा सोचते हैं. छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालने वालों में उनके करीबियों की बड़ी भूमिका है. कोटा में रहने वाले 10% छात्रों पर उनके पेरेंट्स का दबाव उनकी चिन्ताओं का मुख्य कारण है. 25% छात्र य़ह मानते हैं कि उनके साथ भी ऐसा अक्सर होता है. खास बात यह है कि पैरेंट्स के दबाव का सामना करने वालों में लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा है. ऐसे छात्र भी काफी दबाव में होते हैं जिनके परिवार या रिश्तेदारों में से कोई उनसे पहले कोटा में रह चुका हो. 9%छात्रों ने इस तरह के दबाव की बात स्वीकार की जबकि 29% छात्रों ने माना कि उनके साथ भी ऐसा अक्सर होता है. जिन छात्रों के कोई भी करीबी रिश्तेदार कोटा में नहीं रहे हैं उनमें से 6% छात्र इस तरह का दबाव झेलते हैं जबकि करीब 25% छात्रों के साथ कभी-कभी ऐसा होता है.
दोस्तों आर्थिक समस्याएँ या Financial problems भी कोटा में रह रहे छात्रों के ऊपर मानसिक दबाव का एक प्रमुख कारण है. सर्वे के अनुसार 6% छात्रों ने आर्थिक समस्या को मानसिक दबाव का प्रमुख कारण माना जबकि 25% स्टूडेंट्स ने स्वीकार किया कि उन्हें भी कभी-कभी इस दबाव से गुजरना पड़ता है. टफ competition यानी कठिन प्रतियोगिता के कारण भी काफी छात्रों को मानसिक दबाव से गुजरना पड़ता है. 4% स्टूडेंट्स ने कठिन प्रतियोगिता या टफ Competition को मानसिक दबाव का बहुत बड़ा कारण माना वहीँ 20% छात्रों ने टफ Competition की वजह से कभी-कभी मानसिक तनाव महसूस करने की बात स्वीकार की. इन तमाम तरह के मानसिक दबावों के बीच छात्र महसूस करते हैं कि उनके घर के लोग उनकी समस्याओं को नहीं समझ पा रहे हैं. यही वजह है वे अकेलेपन या फिर डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं. कोटा में रहने वाले छात्रों में 53% छात्र अकेलेपन का शिकार हैं. तमाम तरह के मानसिक दबाव छात्रों पर भारी पड़ रहे हैं और क़रीब क़रीब 46% छात्र अक्सर किसी न किसी दबाव से जरूर गुजरते हैं जबकी 12% छात्र अक्सर ही मानसिक दबावों का शिकार होते हैं.
दोस्तों, जानने-समझने की कोशिश करते हैं कि क्या करते हैं छात्र जब वे अत्यधिक मानसिक दबाव से गुजर रहे होते हैं.
छात्र मानसिक दबाव से निबटने के लिए अपने अपने तरीकों का इस्तेमाल करते हैं. 46% छात्रों ने बताया कि जब वे किसी भी तरह के मानसिक दबाव से गुजर रहे होते हैं तब वे अपने परिवार के लोगों या करीबी दोस्तों से बात करते हैं. इससे यह बात सिद्ध होती है कि फॅमिली और फ्रेंड्स सबसे बड़े माध्यम हैं मानसिक दबाव से बाहर आने के लिए. करीब 40% छात्र मानसिक दबाव की चरम स्थिति में ऑनलाइन वीडियो या टेलीविजन देखते हैं, म्यूजिक सुनना पसन्द करते हैं या फिर बस आराम करते हैं. 30% छात्र मानसिक तनाव से बाहर आने के लिए घूमने निकल जाते हैं, Exercise करते हैं या फिर मेडिटेशन करते हैं. क़रीब क़रीब आधे छात्र ऐसे हैं जो तनाव के वक़्त सो जाना पसन्द करते हैं. इससे भी भयावह conditions तो य़ह है कि करीब 16% छात्र नींद की गोलियों का सहारा लेते हैं मानसिक दबाव की चरम स्थिति से बाहर आने के लिए. कुछ छात्र तो मानसिक दबाव की स्थिति से निकलने के लिए हानिकारक रास्ता चुन लेते हैं जैसे 13% छात्र तनाव की स्थिति में फिर से पढ़ने बैठ जाते हैं जो तुरन्त के लिए लाभकारी हो सकता है पर Long term में नुकसानदेह साबित होगा. गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रहे छात्रों में 5% छात्र स्मोकिंग जबकि 2% स्टूडेंट्स शराब का सहारा लेने की गलती करते हैं.
दोस्तों, अब बात करेंगे कि तनाव का मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है ? सर्वे की पूरी रिपोर्ट को देख कर ऐसा लगता है कि छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए कोटा कोई बहुत अनुकूल जगह नहीं है. 30% छात्रों ने बताया कि जब से उन्होंने कोटा में कोचिंग शुरू की है तब से उनके मानसिक स्वास्थ्य यानी Mental Health पर बुरा प्रभाव पड़ा है. 40% छात्र कोटा आने के बाद एक विशेष थकान का अनुभव करते हैं जिनमें 45% लड़कियाँ हैं. 30% छात्रों ने साफ़ कहा कि वे ज्यादा नर्वस feel करते हैं, अकेलेपन की समस्या के साथ साथ मूडी और Depressed महसूस कर रहे हैं.
कोटा में jee/NEET की तैयारियों में लगे 29% छात्रों ने बढ़ते हुए गुस्से की प्रवृत्ति की शिकायत की जबकि 26% छात्रों का कहना था कि उन्हें कई तरह के शारीरिक दर्द के लक्षण दिखते हैं. कोटा शिफ्ट होने के बाद 20% से ज्यादा छात्रों ने निराशा या फ्रस्ट्रेशन, उदासी या डर जैसी मानसिक समस्याओं से ग्रसित होने की शिकायत की. चिन्ता की बात य़ह है कि लड़कों की तुलना में लड़कियों में इस तरह के लक्षण ज्यादा पाए गए.
जब स्टूडेंट्स से पूछा गया कि उन्हें कभी डॉक्टर से Consult करने की जरूरत महसूस हुई तो जवाब में सिर्फ 3% छात्रों ने माना कि उन्होंने मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल से Consult किया. 48% छात्रों ने मानसिक अवसाद में होने के बाद भी डाक्टर से मिलने की जरूरत नहीं समझी. य़ह हमें संकेत देता है कि ऐसे प्रयास होने चाहिए कि मानसिक स्ट्रेस की अवस्था में स्टूडेंट्स बिना किसी संकोच के डॉक्टर से मिलें और उचित इलाज कराएँ.
आज जरूरत है एक ऐसी व्यवस्था बनाने की जिससे मानसिक दबाव का सामना कर रहे छात्र आसानी से बिना किसी झिझक डॉक्टर के पास जाकर उचित counselling ले सकें ताकि आत्महत्या की प्रवृति से बच सकें. जो छात्र किसी भी तरह का मानसिक दबाव महसूस कर रहे हैं वे 24×7 इस हेल्पलाइन पर सम्पर्क कर सकते हैं.
Kiran - 1800-599-0019
Aasara - 9820466726
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