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फ़रवरी, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Article 17

 संविधान की धारा 17 के अन्दर अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया है यानी Abolition  of untouchability. दोस्तों आगे बढ़ने से पहले आप से एक छोटी सी गुजारिश यदि आपने अभी तक मेरे चैनल को subscribe नहीं किया है तो प्लीज़ इसको subscribe कर लीजिए और बेल icon को प्रेस कर दीजिए. आते हैं पॉइन्ट पर. दोस्तों संविधान का अनुच्छेद 17 कहता है कि Untouchability is abolished, and it's practice in any form is forbidden.The enforcement of any disability arising out of untouchability shall be an offence punishable in accordance with law.यानी अस्पृश्यता को समाप्त किया जाता है और किसी भी रूप मे इसका अभ्यास प्रतिबंधित है. अस्पृश्यता से उत्पन्न किसी भी प्रकार की अपंगता को थोपना विधि के अनुसार दण्डनीय होगा. दोस्तों, भारत के महान संविधान निर्माताओं द्वारा भारतीय समाज को अतार्किक,  परंपरागत अंधविश्वासों एवं अनुष्ठानिक मान्यताओं से मुक्त कराने की दूर दृष्टि को अभिव्यक्ति मिली भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के रूप में. संविधान निर्माताओं को य़ह स्पष्ट था कि देश के लोकतन्त्र और विधि के शासन की व्...

Article 16, Constitution of India

  संविधान के अनुच्छेद 16 का सम्बन्ध है सरकारी पदों पर नियोजन और नियुक्ति से. Article 16 क्लॉज वन स्पष्ट कहता है कि There shall be equality of opportunity for all citizens in the matters relating to employment and appointment for any office under the state.यानी सभी नागरिकों के लिए सरकारी पदों पर नियोजन या नियुक्ति के मामलों में अवसरों की समानता होगी यानी सभी को समान अवसर मिलेंगे. उदाहरण के लिए IAS की परीक्षा में सभी Graduates सम्मिलित हो सकते हैं. अनुच्छेद 16 का क्लॉज टू कहता है कि No citizen shall on the ground only of religion,race,caste,sex, descent and placs of birth or any of them  be ineligible for....... यानी कोई भी नागरिक किसी भी सरकारी पद के लिए सिर्फ धर्म, वर्ण, जाति,लिंग vansh और जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता. दोस्तों अनुच्छेद 16(1) स्पष्ट कहता है कि Matters relating to employment and appointments यानी नियोजन और नियुक्ति के मामलों में. इसमें नियुक्ति से पहले और नियुक्ति के बाद की स्थितियां भी शामिल हैं जो कि पूरे नियोजन ...

Article 15 , Constitution of India

 संविधान के अनुच्छेद  15 के अनुसार धर्म, वर्ण, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर कोई भेदभाव प्रतिबंधित है. क्लॉज वन स्पष्ट कहता है कि राज्य किसी भी नागरिक के विरुद्ध सिर्फ धर्म,वर्ण, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं कर सकता. अनुच्छेद 15 के क्लॉज टू के अनुसार सिर्फ धर्म, वर्ण, जाति, लिंग, और जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक पर किसी भी तरह की अयोग्यता, देनदारी, प्रतिबंध और शर्तें थोपी नहीं जा सकतीं.  किसी भी नागरिक को दुकानों, सार्वजनिक रेस्तरां, होटलों, एवं मनोरंजन के सार्वजनिक स्थानों जैसे सिनेमा घरों में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता. धर्म, वर्ण, जाति, लिंग, और जन्मस्थान के आधार पर किसी भी व्यक्ति को कुओं, टंकियों, स्नान घाटों, सड़कों, लोक समागम के स्थानों पर आने जाने या प्रयोग करने से नहीं रोका जा सकता यदि ये सभी स्थान या तो आम जनता के प्रयोग के लिए समर्पित हैं या इन स्थानों का रख-रखाव पूरा या आधा राज्य द्वारा प्रदत्त धन यानी फंड द्वारा किया जाता है . क्लॉज थ्री के अनुसार य़ह अनुच्छेद किसी भी तरह राज्य को महिलाओं और बच्चों के पक्ष में कोई...

संविधान का अनुच्छेद 14 ,समानता का अधिकार

 संविधान की धारा 14 का जिसके अंतर्गत सभी को समानता का अधिकार प्राप्त है यानी Equality before law and Equal protection of law. य़ह है विधि के समक्ष समानता का अधिकार और विधि का समान संरक्षण. य़ह टॉपिक Prelims और Mains दोनों के लिए Important है. दोस्तों, Political Science की भाषा में देश को राज्य कहते हैं और जिन्हें हम राज्य कहते हैं उन्हें प्रान्त कहा जाता है. इस लेख में जहां भी राज्य शब्द आए तो उसका आशय होगा देश. तो राज्य शब्द का प्रयोग देश के लिए है. संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार The state shall not deny to any person the Equality before the law and the equal protection of law within the territory of India. यानी राज्य भारत के इस भूमि क्षेत्र में किसी को भी विधि के समक्ष समानता और विधि के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा. दोस्तों इसमें दो भाव हैं पहला विधि के समक्ष समानता और दूसरा है विधि का समान संरक्षण. वैसे देखने पर एक जैसे लग सकते हैं पर ये हैं बिलकुल अलग. विधि के समक्ष समानता एक नकारात्मक भाव उत्पन्न करता है जैसे धर्म जाति पंथ के आधार पर किसी भी व्यक्ति के पक्ष म...

Prerogative Writs क्या होती हैं

 Prerogative Writs क्या होती हैं .ये कितने प्रकार की होती हैं और संविधान का Article 32  कैसे लोंगों के Fundamental Rights का रक्षा कवच है. Fundamental Rights का सिर्फ संविधान का हिस्सा होना ही काफी नहीं है. यह तब तक एक खोखली घोषणा से ज्यादा कुछ भी नहीं है जब तक इसे प्रभावकारी तरीके से लागू करने के शक्तिशाली माध्यम न  हों. तमाम देशों का अनुभव इस बात की पुष्टि करता है कि इन अधिकारों के अस्तित्व की वास्तविकता का परीक्षण सिर्फ कोर्ट में ही हो सकता है लेकिन इसके लिए जरूरी है कि न्यायपालिका पूरी तरह निष्पक्ष हो और स्वतन्त्र हो साथ ही उसके पास ऐसे माध्यम मौजूद हों जो उन्हें Fundamental Rights को  प्रभावशाली ढंग से लागू कराने की ताकत देते हों. ब्रिटिश और अमेरिकन लीगल सिस्टम में ये माध्यम Writs के रूप में मौजूद हैं. भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त Fundamental Rights को प्रभावकारी बनाने के लिये विशेष व्यवस्था की गयी है. Fundamental Rights सिर्फ सरकार के विरुद्ध ही नहीं बल्कि विधायिका यानी Legislature के विरूद्ध भी लोंगों को उपलब्ध हैं. संविधान की धारा 13 के अनुसार यद...